एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)
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Read in contextइस प्रकार जो पुरुष केवल भोग की ओर दौड़ लगा रहा है और सब कुछ भोगने का मद जिसके
भीतर जम जाताहै वह पाप-धर्म के भय तथा लोक-लाज से डर कर, जिसे लोक में पाप-
कर्म कह कर पुकारा गया है और जिसे सब बुरा मानते हैं और जो पाप के मार्ग हैं उन
पर सब कुछ त्याग कर दौड़ेगा ही दौड़ेगा। ऐसा क्यों? क्योंकि उस पापी मनुष्य के
विवेक शक्ति पर परदा पड़ गया है और इस परदे के कारण उसका विवेक मारा जा चुकाहै।
विवेक नष्ट न हो इसके लिए यह ही उपाय है जिस से मनुष्य सचेत हो सके कि
वह मन को सर्वथा वश में करे। पर जो वश में न करके मन के वश में होकर चलेगा
वह तो पाप का मार्ग कभी नहीं छोड़ सकता क्योंकि पाप तो मन ही कराता है? जिसे मन कहेगा!
वह तो वो सब कुछ करेगा चाहे वो पाप कर्म हों और फिर उस मन को यह भी ज्ञान
नहीं रहता कि, जिसे लोग पाप कहते हैं वह मन ही सब कुछ करा रहा है। तब
तो वो पाप कर्मों में ही सुख का अनुभव करने लगता है और जब पाप में आनन्द आने लगे, तो
वो कभी निष्पाप बन नहीं सकता है... ऐ मन तू तो उस परम-पिता परमेश्वर का केवल
चिन्तन कर, जो कि सब का रचने वाला आधार व प्रभु, सब को जन्म देकर सब का पालन करने
वाला स्वामी।
सो वो प्रभु सब का उपकार तथा कल्याण ही करता है, अतः तू ही अपने
कल्याण की इच्छा कर और इस पाप के दल-दल रूपी पंक से निकल कर विवेक रूपी
जल घट से उस पाप रूपी मैल को धो कर पवित्र हो, इस ही कार्य रूप में अपनी
सारी शक्ति को तू नियोजित कर दे, तेरा कभी अनिष्ट नहीं होगा।
भोगों की लोलुपता मनुष्य केवल मात्र सुख के ही लिए करता है, जिसे भोगों
का सुखसमझा जाताहै यह सुख भ्रम मात्र होता, केवल न होने का आभास ही होता
इस प्रकार के झूठे सुख में जो मनुष्य सब कुछ भूल कर बैठता है और सब कुछ गंवा
कर बैठ कर रोता पश्चाताप ही करता, पर पश्चाताप से तो बिगड़ा हुआ समय तो
वापिस लौटाया नहीं जाता, न ही सुख मिलता, जो पश्चाताप मन करा रहा था
इसलिए पश्चाताप की ओर न जाकर मन को वश करके जन्म-मरण से मुक्ति
पाकर आनन्द प्राप्त किया जावे जिस से आवा गमन के संकट से छूट मुक्ति
रूपी परम शान्ति मिले, जो मुक्ति पाकरसदा सब सुखों का ही भोग करे,
सब प्रकार के दुःखों से छूटे।
जब तक मन में मोह है, तब तक माया मनुष्य को सब तरह रूप दिखा कर
भुलावे में डाल कर भरमाती ही रहेगी, जो भरम गया उसे शान्ति का मार्ग कभी
प्राप्त हो ही नहीं सकता। भरम से जो बच गया, सो सब कुछ शान्ति का प्राप्त कर लेगा।
जब तकयह मनुष्य मोह रूपी जाल में फंसा, तब तक किसी तरह भी यह बच ही नहीं
सकता। मोह का जाल ऐसा दृढ़ होता है कि ज्ञानी-विज्ञानी भी इस में फंस कर
गिरते हैं, जिन्हें भी मोह का जाल अपने में जकड़ ले; सांसारिक वासना और मोह से
ही तो सब कुछ है, जो कुछ भी इस संसार में।
जो कुछ किया गया अथवा जो हो सकता है सब माया के प्रभाव काम-क्रोध के
कारण व लोभ लालच तथा वासना रूपी लहरों तथा तृष्णाओं के कारण ही मनुष्य करता
ही रहता जिसपर वासना का जोर न चले, वह ही इन सबपे विजय प्राप्त कर सकताहै।
पर वासना मनुष्य को सब ओर से घेरकर सदा अपने वश में रखती, जिस से छूट पाना
ही मुश्कील।
जिसे ज्ञान हुआ, विद्या पढ़ी, पर वासना से मन को न हटाया तोसब कुछ
का व्यर्थ ही हुआ... ऐ मन तूउस सब माया रूपी सांसारिक बन्धन से छूट, मन जिस
रूप बना उस परमात्मा को पा सकता है उस परमात्मा के ज्ञान को मन रूपी जल
से धो कर साफ कर ले जिससे, तू मुक्त हो कर उस परम पद को पा सके जो तेरा पद,
ज्ञान का रूप है, जब तू उस ज्ञान स्वरूप प्रभु को जाने, तभी मुक्ति का मार्ग पा
सकता है मेरे मन!
जिसे मुक्ति मार्ग चाहिए वो सब से पहले अपनी वासनाओं का त्याग करे
जो वासना सब तरह की इच्छाओं का घर तथा वासना ही मुख्य कारण है; न तो वो ज्ञान
प्राप्त करसकता है, न ज्ञान रूपी सत्य परमात्मा को ही पा सकता क्योंकि वासना व
सांसारिक वासना रूपी वासनाएं ही तो ज्ञान रूपी दीप को बुझाती हैं। ज्ञान का
परमात्मा रूपी दीपक यदि जलता रहे तथा बुझने न पावे, तोमुक्ति का ज्ञान
प्राप्त हुवाजिससे यह जीवात्मा उस प्रभु व ज्ञान के प्रकाश द्वारा सत्य को
जान कर सत्य में ही लय पावे। सत्य परमात्मा समस्त सृष्टि रूपी माया का रचयिता है,
पल-भर समस्त संसार को, पलक के झपकने में समाप्त कर सकता अथवा निर्माण करा
देता है, सो उस सत्य स्वरूप को जान कर उसपरमपिता परमात्मा की शरण को प्राप्त हो
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