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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished318 pages

१३८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४०

Page 149Permalink

१३८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४०
व्यूढोरस्कं महाबाहुं पृथुवक्त्रं नराधिप।
अग्निजिह्वं स्रुचं तुण्डं चन्द्रार्कनयनं महत्॥ १२
पूर्तेष्टधर्मश्रवणं दिव्यं तं सामनिःस्वनम्।
प्राग्वंशकायं हविर्नासं कुशदर्भतनूरुहम्॥ १३
सर्वं वेदमयं तच्च पुण्यसूक्तमहासटम्।
नक्षत्रताराहारं च प्रलयावर्तभूषणम्॥ १४
इत्थं कृत्वा तु वाराहं प्रविवेश वृषाकपिः।
रसातलं नृपश्रेष्ठ सनकाद्यैरभिष्टुतः॥ १५
प्रविश्य च हिरण्याक्षं युद्धे जित्वा वृषाकपिः।
दंष्ट्राग्रेण ततः पृथ्वीं समुद्धृत्य रसातलात्॥ १६
स्तूयमानोऽमरगणैः स्थापयामास पूर्ववत्।
संस्थाप्य पर्वतान् सर्वान् यथास्थानमकल्पयत्॥ १७
विहाय रूपं वाराहं तीर्थे कोकेतिविश्रुते।
वैष्णवानां हितार्थाय क्षेत्रं तद्गुह्यमुत्तमम्॥ १८
ब्रह्मरूपं समास्थाय पुनः सृष्टिं चकार सः।
विष्णुः पाति जगत्सर्वमेवम्भूतो युगे युगे।
हन्ति चान्ते जगत्सर्वं रुद्ररूपी जनार्दनः॥ १९
वेदान्तवेद्यस्य हरेर्वृषाकपेः कथामिमां यश्च शृणोति मानवः।
दृढां मतिं यज्ञतनौ विवेश्य वै विहाय पापं च नरो हरिं व्रजेत्॥ २०
मुखमण्डल स्थूल और छाती चौड़ी थी, भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं, अग्नि ही जिह्वा और स्रुक् (स्रुवा) ही थुथुन थी। चन्द्रमा और सूर्य विशाल नेत्र थे, पूर्त (बावली आदि खुदवाना) और इष्ट-धर्म (यज्ञ-यागादि) उनके कान थे, साम ही स्वर था। प्राग्वंश (पत्नीशाला या यजमान-गृह) ही शरीर था, हवि ही नासिका था, कुश-दर्भ ही रोमावलियाँ थे। इस प्रकार उनका सम्पूर्ण शरीर वेदमय था, पवित्र वैदिक सूक्त ही उनके बड़े-बड़े अयाल थे। नक्षत्र और तारे उनके हार थे तथा प्रलयकालीन आवर्त (भँवरें) ही उनके लिये भूषणका काम दे रहे थे॥ १०-१४ १/२ ॥
नृपश्रेष्ठ! भगवान् विष्णुने ऐसे वाराहरूपको धारणकर रसातलमें प्रवेश किया। उस समय सनकादि योगीजन उनकी स्तुति करते थे। वहाँ जाकर भगवान्ने युद्धमें हिरण्याक्षको मारकर उसपर विजय पायी और अपनी दाढ़ोंके अग्रभागसे पृथ्वीको उठाकर वे रसातलसे ऊपर ले आये। फिर देवगण उनकी स्तुति करने लगे और उन्होंने पूर्ववत् पृथ्वीको स्थापित किया। पृथ्वीको स्थिर करनेके पश्चात् उसपर यथास्थान पर्वतोंका संनिवेश किया। तदनन्तर वैष्णवोंके हितके लिये कोकामुख तीर्थमें वाराहरूपका त्याग किया। वह वाराह-क्षेत्र उत्तम एवं गुह्य तीर्थ है। फिर ब्रह्माजीका रूप धारणकर उन्होंने सृष्टि-रचना की। इस प्रकार भगवान् विष्णु युग-युगमें अवतार लेकर सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करते हैं। फिर वे जनार्दन रुद्ररूप धारणकर अन्तकालमें समस्त लोकोंका संहार करते हैं॥ १५-१९॥
जो मनुष्य वेदान्तवेद्य भगवान् विष्णुकी इस कथाको श्रवण करता है, वह भगवान् यज्ञमूर्तिमें अपनी सुदृढ़ बुद्धि लगाकर समस्त पापोंसे मुक्त हो, उन भगवान् हरिको ही प्राप्त करता है॥ २०॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे वाराहप्रादुर्भावो नाम एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'वाराहावतार' नामक उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३९॥
चालीसवाँ अध्याय
नृसिंहावतार; हिरण्यकशिपुकी वरदान-प्राप्ति और उससे सताये हुए देवोंद्वारा भगवान्‌की स्तुति
मार्कण्डेय उवाच
वाराहः कथितो ह्येवं प्रादुर्भावो हरेस्तव।
साम्प्रतं नारसिंहं तु प्रवक्ष्यामि निबोध मे॥ १
मार्कण्डेयजी बोले-राजन्! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् विष्णुके वराह-अवतारका वर्णन किया। अब 'नृसिंहावतार' का वर्णन करूँगा; सुनो॥ १॥
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अध्याय ४० ] नृसिंहावतार; हिरण्यकशिपुकी वरदान-प्राप्ति १३९
दितेः पुत्रो महानासीद्धिरण्यकशिपुः पुरा। | पूर्वकालमें दितिका पुत्र हिरण्यकशिपु महान् प्रतापी
तपस्तेपे निराहारो बहुवर्षसहस्रकम्॥ २ | हुआ। उसने अनेक सहस्र वर्षोंतक निराहार रहते हुए
तपतस्तस्य संतुष्टो ब्रह्मा तं प्राह दानवम्। | तपस्या की। उसकी तपस्यासे संतुष्ट हो ब्रह्माजीने उस
वरं वरय दैत्येन्द्र यस्ते मनसि वर्तते॥ ३ | दानवसे कहा—'दैत्येन्द्र! तुम्हारे मनको जो प्रिय लगे,
इत्युक्तो ब्रह्मणा दैत्यो हिरण्यकशिपुः पुरा। | वही वर माँग लो।' दैत्य हिरण्यकशिपुने ब्रह्माजीके इस
उवाच नत्वा देवेशं ब्रह्माणं विनयान्वितः॥ ४ | प्रकार कहनेपर उन देवेश्वरसे विनयपूर्वक प्रणाम करके
| कहा॥ २-४॥
हिरण्यकशिपुरुवाच |
यदि त्वं वरदानाय प्रवृत्तो भगवन्मम। | हिरण्यकशिपु बोला—ब्रह्मन्! भगवन्! यदि आप
यद्यद्वृणोम्यहं ब्रह्मांस्तत्तन्मे दातुमर्हसि॥ ५ | मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं जो-जो माँगता हूँ,
न शुष्केण न चार्द्रेण न जलेन न वह्निना। | वह सब देनेकी कृपा करें। मैं न सूखी वस्तुसे मरूँ न
न काष्ठेन न कीटेन पाषाणेन न वायुना॥ ६ | गीलीसे; न जलसे न आगसे; न काठसे न कीड़ेसे और
नायुधेन न शूलेन न शैलेन न मानुषैः। | न पत्थर या हवासे ही मेरी मृत्यु हो। न शूल अथवा
न सुरैरसुरैर्वापि न गन्धर्वैर्न राक्षसैः॥ ७ | किसी और शस्त्रसे न पर्वतसे; न मनुष्योंसे न देवता,
न किन्नरैर्न यक्षैस्तु विद्याधरभुजंगमैः। | असुर, गन्धर्व अथवा राक्षसोंसे ही मरूँ। न किंनरोंसे न
न वानरैर्मृगैर्वापि नैव मातृगणैरपि॥ ८ | यक्ष, विद्याधर अथवा भुजंगोंसे; न वानर तथा अन्य
नाभ्यन्तरे न बाह्ये तु नान्यैर्मरणहेतुभिः। | पशुओंसे और न दुर्गा आदि मातृगणोंसे ही मेरी मृत्यु
न दिने न च नक्तं मे त्वत्प्रसादाद् भवेन्मृतिः॥ ९ | हो। मैं न घरके भीतर मरूँ न बाहर; न दिनमें मरूँ न
इति वै देवदेवेशं वरं त्वत्तो वृणोम्यहम्। | रातमें तथा आपकी कृपासे मृत्युके हेतुभूत अन्य कारणोंसे
| भी मेरी मृत्यु न हो। देवदेवेश्वर! मैं आपसे यही वर
मार्कण्डेय उवाच | माँगता हूँ॥ ५-९ १/२॥
इत्युक्तो दैत्यराजेन ब्रह्मा तं प्राह पार्थिव॥ १० | मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! दैत्यराज
तपसा तव तुष्टोऽहं महता तु वरानिमान्। | हिरण्यकशिपुके यों कहनेपर ब्रह्माजीने उससे कहा—
दुर्लभानपि दैत्येन्द्र ददामि परमाद्भुतान्॥ ११ | 'दैत्येन्द्र! तुम्हारे महान् तपसे संतुष्ट होकर मैं इन परम
अन्येषां नेदृशं दत्तं न तैरित्थं तपः कृतम्। | अद्भुत वरोंको दुर्लभ होनेपर भी तुम्हें दे रहा हूँ। दूसरे
त्वत्प्रार्थितं मया दत्तं सर्वं ते चास्तु दैत्यप॥ १२ | किसीको मैंने ऐसा वर नहीं दिया है और न दूसरोंने
गच्छ भुङ्क्ष्व महाबाहो तपसामूर्जितं फलम्। | ऐसी तपस्या ही की है। दैत्यपते! तुम्हारे माँगे हुए सभी
इत्येवं दैत्यराजस्य हिरण्यकशिपोः पुरा॥ १३ | वर मैंने तुम्हें दे दिये; वे सब तुम्हें प्राप्त हों। महाबाहो!
दत्त्वा वरान् ययौ ब्रह्मा ब्रह्मलोकमनुत्तमम्। | अब जाओ और अपने तपके बढ़े हुए उत्कृष्ट फलको
सोऽपि लब्धवरो दैत्यो बलवान् बलदर्पितः॥ १४ | भोगो।' इस प्रकार पूर्वकालमें दैत्यराज हिरण्यकशिपुको
देवान् सिंहान् रणे जित्वा दिवः प्राच्यावयद् भुवि। | अभीष्ट वर देकर ब्रह्माजी अपने परम उत्तम लोकको
दिवि राज्यं स्वयं चक्रे सर्वशक्तिसमन्वितम्॥ १५ | चले गये। उस बलवान् दैत्यने भी वर पाकर बलसे
| उन्मत्त हो श्रेष्ठ देवताओंको युद्धमें जीतकर उन्हें स्वर्गसे
| पृथ्वीपर गिरा दिया तथा वह स्वयं स्वर्गलोकमें रहकर
| वहाँका सर्वशक्तिसम्पन्न राज्य भोगने लगा॥ १०-१५॥
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