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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished318 pages

१३४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३८

Page 145Permalink

१३४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३८

[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत मूल]
नमस्ते विश्वरूपाय सर्वदेवमयाय च।
मधुकैटभनाशाय केशवाय नमो नमः॥ ४
दैत्यैः पराजिता देव वयं युद्धे बलान्वितैः।
जयोपायं हि नो ब्रूहि करुणाकर ते नमः॥ ५
मार्कण्डेय उवाच
इति स्तुतो तदा देवैर्देवदेवो जनार्दनः।
तानब्रवीद्धरिर्देवांस्तेषामेवाग्रतः स्थितः॥ ६
श्रीभगवानुवाच
गत्वा तत्र सुराः सर्वे संधिं कुरुत दानवैः।
मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिम्॥ ७
सर्वौषधीः समानीय प्रक्षिप्याब्धौ त्वरान्विताः।
दानवैः सहिता भूत्वा मथ्नध्वं क्षीरसागरम्॥ ८
अहं च तत्र साहाय्यं करिष्यामि दिवौकसः।
भविष्यत्यमृतं तत्र तत्पानाद्बलवत्तराः॥ ९
भविष्यन्ति क्षणाद्देवा अमृतस्य प्रभावतः।
यूयं सर्वे महाभागास्तेजिष्ठा रणविक्रमाः॥ १०
इन्द्राद्यास्तु महोत्साहास्तल्लब्ध्वामृतमुत्तमम्।
ततो हि दानवाञ्जेतुं समर्था नात्र संशयः॥ ११
इत्युक्ता देवदेवेन देवाः सर्वे जगत्पतिम्।
प्रणम्यागत्य निलयं संधिं कृत्वाथ दानवैः॥ १२
क्षीराब्धेर्मन्थने सर्वे चक्रुरुद्योगमुत्तमम्।
बलिना चोद्धृतो राजन् मन्दराख्यो महागिरिः॥ १३
क्षीराब्धौ क्षेपितश्चैव तेनैकेन नृपोत्तम।
सर्वौषधींश्च प्रक्षिप्य देवदैत्यैः पयोनिधौ॥ १४
वासुकिश्चागतस्तत्र राजन्नारायणाज्ञया।
सर्वदेवहितार्थाय विष्णुश्च स्वयमागतः॥ १५
तत्र विष्णुं समासाद्य ततः सर्वे सुरासुराः।
सर्वे ते मैत्रभावेन क्षीराब्धेस्तटमाश्रिताः॥ १६
मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वाथ वासुकिम्।
ततो मथितुमारब्धं नृपते तरसामृतम्॥ १७


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]
सम्पूर्ण विश्व और सारे देवता जिनके स्वरूप हैं, उन
मधुकैटभनाशक केशवको बारंबार प्रणाम है। करुणाकर!
भगवन्! हम सभी देवता बलवान् दैत्योंद्वारा युद्धमें हरा
दिये गये हैं, हमें विजय प्राप्त करनेका कोई उपाय
बतलाइये; आपको नमस्कार है॥ ३-५॥
**मार्कण्डेयजी बोले—**देवताओंद्वारा इस प्रकार स्तवन
किये जानेपर देवदेव भगवान् जनार्दनने उनके समक्ष
प्रकट होकर कहा॥ ६॥
**श्रीभगवान् बोले—**देवगण! तुम सब लोग वहाँ
(समुद्र-तटपर) जाकर दानवोंके साथ संधि कर लो
और मन्दराचलको मथानी बनाकर वासुकि नागसे रस्सीका
काम लो। फिर शीघ्रतापूर्वक समस्त ओषधियोंको
लाकर समुद्रमें डालो और दानवोंके साथ मिलकर ही
क्षीरसागरका मन्थ्न करो। देवताओ! इस कार्यमें मैं भी
तुम लोगोंकी सहायता करूँगा। समुद्रसे अमृत प्रकट
होगा, जिसको पान करके उसके प्रभावसे देवता क्षणभरमें
ही अत्यन्त बलशाली हो जायेंगे। महाभागो! उस उत्तम
अमृतको प्राप्तकर इन्द्रादि तुम सभी देवता अत्यन्त
तेजस्वी, रणमें पराक्रम दिखानेवाले और महान् उत्साहसे
सम्पन्न हो जाओगे। तदनन्तर तुम लोग दानवोंको जीतनेमें
समर्थ हो सकोगे—इसमें संशय नहीं है॥ ७-११॥
देवदेव भगवान्‌के द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर
सभी देवता उन जगदीशवरको प्रणाम करके अपने
स्थानपर आये और दानवोंके साथ संधि करके क्षीरसागरके
मन्थनके लिये उत्तम उद्योग करने लगे। राजन्! बलिने
अकेले ही 'मन्दर' नामक महान् पर्वतको उखाड़कर
समुद्रमें डाल दिया तथा नृपोत्तम! देवता और दैत्योंने
समस्त ओषधियोंको लाकर समुद्रमें डाला। राजन्!
भगवान् नारायणकी आज्ञासे वासुकि नाग वहाँ आये
और समस्त देवताओंका हित-साधन करनेके लिये
स्वयं भगवान् विष्णु भी वहाँ पधारे॥ १२-१५॥
तदनन्तर सभी देवता और असुरगण वहाँ
भगवान् विष्णुके पास आये और सब लोग
मित्रभावसे एकत्र होकर क्षीरसागरके तटपर उपस्थित
हुए। नृप! उस समय मन्दराचलको मथानी और
वासुकि नागको रस्सी बनाकर अमृत निकालनेके
उद्देश्यसे अत्यन्त वेगपूर्वक समुद्रका मन्थन आरम्भ


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