Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished318 pages

२६८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६२

Page 279Permalink

२६८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६२
धर्मशास्त्रमिदं यस्तु हारीतमुखनिस्सृतम्।
श्रुत्वा च कुरुते धर्मं स याति परमां गतिम्॥ १६
मुखजस्य तु यत्कर्म कर्म यद्वाहुजस्य तु।
ऊरुजस्य तु यत्कर्म पादजस्य तथा नृप॥ १७
स्वं स्वं कर्म प्रकुर्वाणा विप्राद्या यान्ति सद्गतिम्।
अन्यथा वर्तमानो हि सद्यः पतति यात्यधः॥ १८
यस्य येऽभिहिता धर्माः स तु तैस्तैः प्रतिष्ठितः।
तस्मात्स्वधर्मं कुर्वीत नित्यमेवमनापदि॥ १९
चतुर्वर्णांश्च राजेन्द्र चत्वारश्चापि चाश्रमाः।
स्वधर्मं येऽनुतिष्ठन्ति ते यान्ति परमां गतिम्॥ २०
स्वधर्मेण यथा नृणां नरसिंहः प्रतुष्यति।
वर्णधर्मानुसारेण नरसिंहं तथार्चयेत्॥ २१
उत्पन्नवैराग्यबलेन योगाद्
ध्यायेत् परं ब्रह्म सदा क्रियावान्।
सत्यात्मकं चित्सुखरूपमाद्यं
विहाय देहं पदमेति विष्णोः॥ २२
जो भी हारीत मुनिके मुखसे निर्गत इस धर्मशास्त्रका श्रवण करके इसके अनुसार आचरण करता है वह परमगतिको प्राप्त होता है। नरेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके जो-जो कर्म बताये गये हैं, उन-उन अपने-अपने वर्णोचित कर्मोंका पालन करनेवाले ब्राह्मण आदि सद्गतिको प्राप्त होते हैं; इसके विपरीत आचरण करनेवाला पुरुष तत्काल नीचे गिर जाता है। जिसके लिये जो धर्म बताये गये हैं, वह पुरुष उन्हीं धर्मोंसे प्रतिष्ठित होता है। इसलिये आपत्तिकालके अतिरिक्त सदा ही अपने धर्मका पालन करना चाहिये। राजेन्द्र! चार ही वर्ण और चार ही आश्रम हैं। जो लोग अपने वर्ण एवं आश्रमके उचित धर्मका पूर्णतया पालन करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। भगवान् नरसिंह जिस प्रकार स्वधर्मका आचरण करनेसे मनुष्यपर प्रसन्न होते हैं, वैसे दूसरे प्रकारसे नहीं; इसलिये वर्णधर्मके अनुसार भगवान् नरसिंहका पूजन करना चाहिये। जो पुरुष स्वकर्ममें तत्पर रहकर उत्पन्न हुए वैराग्यके बलसे योगाभ्यासपूर्वक सदा सच्चिदानन्दस्वरूप अनादि ब्रह्मका ध्यान करता है, वह देह त्यागकर साक्षात् श्रीविष्णुपदको प्राप्त होता है॥ १५-२२॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे योगाध्यायो नामैकषष्टितमोऽध्यायः॥ ६१॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'योगाध्याय' नामक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६१॥
बासठवाँ अध्याय
श्रीविष्णुपूजनके वैदिक मन्त्र और स्थान
श्रीमार्कण्डेय उवाच
वर्णानामाश्रमाणां च कथितं लक्षणं तव।
भूयः कथय राजेन्द्र शुश्रूषा तव का नृप॥ १
श्रीमार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! मैंने तुम्हें वर्णों और आश्रमोंका स्वरूप बताया। राजेन्द्र! अब कहो, तुम्हारे मनमें क्या सुननेकी इच्छा है॥ १॥
सहस्रानीक उवाच
स्नात्वा वेश्मनि देवेशमर्चयेदच्युतं त्विति।
त्वयोक्तं मम विप्रेन्द्र तत्कथं पूजनं भवेत्॥ २
यैर्मन्त्रैरर्च्यते विष्णुर्येषु स्थानेषु वै मुने।
तानि स्थानानि तान्मन्त्रांस्त्वमाचक्ष्व महामुने॥ ३
सहस्रानीक बोले—विप्रेन्द्र! आपने बताया कि प्रतिदिन स्नान करके अपने घरमें भगवान् अच्युतका पूजन करना चाहिये। अतः वह पूजन किस प्रकार होना चाहिये? महामुने! जिन मन्त्रोंद्वारा और जिन आधारोंमें भगवान् विष्णुकी पूजा होती है, वे आधार और वे मन्त्र आप मुझे बताइये॥ २-३॥
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth