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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम्।

उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम्।
चक्षुर्नासा च कर्णौ च धनं देहस्तथैव च॥ 37॥
दस प्रहरणीय अंग है—1. लिंग (जननेन्द्रिय), 2. उदर, 3. जिह्वा, 4. दोनों
हाथ, 5. दोनों पैर, 6. चक्षु, 7. नासिका, 8. दोनों कान, 9. धन तथा देह।
टिप्पणी—यहां चूतड़ों, टांगों और पीठ का उल्लेख नहीं हुआ। प्रायः बेतों
का प्रहार इन्हीं तीन अंगों पर किया जाता है। 'देह' से स्मृतिकार का अभीष्ट स्पष्ट
नहीं है।
लिंग, आंख, नाक, कान तथा नासिका आदि कोमल अंगों पर तो प्रहार
वर्जित होना चाहिए।
अपराधं परिज्ञाय देशकालौ च तत्त्वतः।
सारानुबन्धावालोक्य दण्डानेतान् प्रकल्पयेत्॥ 38॥
देश और काल के सन्दर्भ में अपराधी की मानसिकता तथा उसके चरित्र
आदि की समीक्षा करने के उपरान्त ही उपर्युक्त दस स्थानों पर दण्ड देने का आदेश
देना चाहिए। उदाहरणार्थ, सुशिक्षित एवं सच्चरित्र व्यक्ति द्वारा प्रयत्न करने पर भी
नौकरी न पाने से निराश तथा अपने भूखे बच्चे को बिलखता न देख सकने के
कारण चोरी करने को विवश होने पर उसके प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण ही
अपनाना चाहिए। आंख मींचकर दण्ड संहिता का पालन करना उचित नहीं।
न मित्रकारणाद्राज्ञा विपुलाद्वा धनागमात्।
उत्सृष्टव्यः साहसिकस्त्यक्तात्मा मनुरब्रवीत्॥ 39॥
मनु महाराज का यह भी स्पष्ट कथन है कि पकड़े गये चोर-डाकू के राजा का
सम्बन्धी होने पर अथवा उसके द्वारा भारी घूस का प्रस्ताव किये जाने पर, उसे
किसी भी स्थिति में छोड़ नहीं देना चाहिए। पक्षपात करने वाला राजा अथवा
राज्यकर्मचारी नरकगामी होते हैं।
यावानबध्यस्य वधे तावान् बध्यस्य मोक्षणे।
भवत्यधर्मो नृपतेर्धर्मस्तु विनियच्छतः॥ 40॥
जिस प्रकार अवध्य का वध करना और वध्य का वध न करके उसे छोड़ देने
से राजा को महापाप लगता है, उसी प्रकार विचारपूर्वक घोषित अपराधी मनोवृत्ति
के चोर डाकू के प्रति पक्षपात करने, उसके प्रति अनुग्रह दिखाने पर भी राजा पाप
का भागी होता है। जिस प्रकार निरपराध को दण्ड देना पाप है, उसी प्रकार
अपराधी को दण्ड न देना भी पाप है।
न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्वपापेष्वपि स्थितम्।
निर्वास्यं कारयेत् काममिति धर्मो व्यवस्थितः॥ 41॥
राजा को किसी भी प्रकार के छोटे-बड़े अपराध करने पर ब्राह्मण को कभी
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दण्ड नहीं देना चाहिए। राजा को अधिक-से-अधिक किल्विषी (पापकर्मा) ब्राह्मण
को अपने देश से निर्वासित कर देना चाहिए।
सर्वस्वं वा हरेद्राजा चतुर्थं वाऽवशेषयेत्।
एतेभ्योऽनुस्मरन्धर्मं प्राजापत्यमिति स्थितिः॥ 42 ॥
राजा को प्रयत्न करने पर भी न सुधरने वाले और देश से निकलने को
असहमत ब्राह्मण की सम्पत्ति छीन लेनी चाहिए अथवा उसकी सम्पत्ति का चौथा
भाग उसके निर्वाह के लिए छोड़कर शेष पर अपना अधिकार कर लेना चाहिए।
ऐसा करते समय राजा को दुखी मन से यह कहना चाहिए कि प्रजापति द्वारा विहित
धर्म की रक्षा के लिए, उसे न चाहते हुए भी ऐसा करना पड़ रहा है-देवता उसे
क्षमा करें।
ब्राह्मणस्यापराधेसु चतुर्ध्वङ्को विधीयते।
गुरुतल्पे सुरापाने स्तेयं ब्राह्मणहिंसने ॥ 43 ॥
ब्राह्मण द्वारा सुरापान, गुरुपत्नी-गमन, स्तेय तथा ब्रह्महत्या आदि निकृष्ट एवं
जघन्य कार्यों के किये जाने पर भी उसके शरीर पर इन अपराधों के सूचक चार
प्रकार के चिह्नों को अंकित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उसे अन्य किसी प्रकार
का आर्थिक अथवा शारीरिक दण्ड नहीं देना चाहिए।
गुरुतल्पे भगः कार्यः सुरापाने ध्वजः स्मृतः।
स्तेये तु श्वपदं कृत्वा शिशिपितेन पूरयेत्॥ 44 ॥
सुरापान करने वाले ब्राह्मण के मस्तक पर ध्वजा का, गुरुपत्नी-गमन करने
वाले के मस्तक पर भग का तथा चोरी करने पर कुत्ते के पद का चिह्न बनाना
चाहिए। कुरेदे हुए चिह्न के भीतर मोरपित्त-मोरपंख की राख-भर देनी चाहिए,
जिससे ऐसा चिह्न कभी मिट अथवा लुप्त न हो सके, अपितु स्थायी रूप से सबको
दीखता रहे, ताकि लोग उसका बहिष्कार करने में भूल-चूक न कर सकें।
अशिरः पुरुषः कार्यो ललाटे ब्रह्मघातिनः।
असम्भाष्यश्च कर्त्तव्यस्तन्मनोरनुशासनम् ॥ 45 ॥
ब्रह्महत्या करने वाले ब्राह्मण के मस्तक पर उसके इस पाप के सूचक
मस्तकविहीन (सिरकटे) पुरुष का चिह्न अंकित किया जाता है। महाराज मनु का
स्पष्ट निर्देश है कि इन चारों प्रकार के अपराधी ब्राह्मणों का सामाजिक बहिष्कार
कर देना चाहिए। यहां तक कि उनके साथ बातचीत भी नहीं करनी चाहिए।
राजा स्तेनेन गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता।
आचक्षाणेन तत्स्तेयमेवंकर्मास्मि शाधि माम् ॥ 46 ॥
अनेना भवति स्तेनः स्वकर्मप्रतिपादनात्।
राजा तत्स्पृशेदेनमुत्सृजेत्तु ह्यकिल्बिषम् ॥ 47 ॥
नारदस्मृति / 271

यदि चोरी करने पर चोर पश्चात्ताप की आग में जलता हुआ व मुक्तकेश
अवस्था में चारों ओर दौड़ता हुआ, उच्च स्वर में अपने पाप को सार्वजनिक रूप से
घोषित करता है और रुदन करता हुआ राजा के पास जाता है तथा दण्ड के लिए
अपने आपको प्रस्तुत करता है, तो ऐसे चोर को सुधरने का अवसर देना चाहिए।
अपने मुख से ही अपने पाप को स्वीकार करने, अपने कृत्य पर लज्जित होने, दण्ड
के लिए अपने को प्रस्तुत करने वाले के प्रति राजा को सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण
अपनाते हुए उसे क्षमा कर देना चाहिए तथा अपने हाथ के स्पर्श से उसे पवित्र बना
देना चाहिए।
टिप्पणी—राजा के हाथ का स्पर्श पतित को पवित्र बनाने वाला माना गया
है।
राजाभिर्धृतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा॥ 48॥
यदि पापाचारी व्यक्ति अपने पापों के लिए प्रायश्चित्त करते हैं, राजा के समक्ष
अपने आपको दण्ड के लिए प्रस्तुत करते हैं तथा राजा द्वारा प्रदत्त दण्ड को सहर्ष
स्वीकार करते हैं, तो वे भी पापमुक्त एवं शुद्ध होकर सन्तों के समान मरणोपरान्त
स्वर्गलोक में जाने के अधिकारी बन जाते हैं।
शासनाद्वा विमोक्षाद्वास्तेनो मुच्यति किल्बिषात्।
अशासनात्तु तद्राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम्॥ 49॥
राजा द्वारा अपने सामने उपस्थित चोर पर अनुग्रह करने, अर्थात् बिना दण्ड
दिये मुक्त करने अथवा समुचित दण्ड देने पर चोर पाप-मुक्त हो जाता है। राजा को
यह नहीं भूलना चाहिए कि चोर को दण्ड दिये बिना छोड़ देने पर, अर्थात् किसी
प्रकार का पश्चात्ताप करने पर चोर के पाप का फल स्वयं राजा को भुगतना पड़ता
है।
गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम्।
अतः प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः॥ 50॥
विवेकहीन सज्जनों के शासक तो उनके गुरुजन होते हैं और दुष्ट आततायियों
पर राजा का ही शासन रहता है। अभिप्राय यह है कि बुद्धिमान् व्यक्तियों द्वारा
अपराध हो जाने अथवा किये जाने पर गुरुओं द्वारा उन्हें समझाना पर्याप्त होता है।
वे प्रबोधन से ही अपराधवृत्ति का त्याग कर सन्मार्ग ग्रहण कर लेते हैं, परन्तु दुष्ट
व्यक्ति समझाने-बुझाने की भाषा को नहीं समझते—‘लातों के भूत बातों से नहीं
मानते’—उन्हें सन्मार्ग पर लाने का एकमात्र उपाय दण्ड ही है और यह कार्य राजा
ही कर सकता है।
इन दोनों—प्रकट सज्जनों और प्रकट दुर्जनों—के अतिरिक्त, भीतर से दुर्जन,
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