Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव

Report a copyright issue

DevanagariRajasthanipublished365 pages

About this granth

Mirabai, the sixteenth-century Krishna devotee associated with the royal house of Mewar, is one of the most loved voices of the bhakti movement. Her padas addressed to "Giridhar Gopal", in a mix of Rajasthani, Braj and Gujarati, have travelled widely in oral and devotional tradition.

This volume is the Meera Brihat Pad Sangrah (मीराँ बृहद् पदावली), whose title page names Padmavati "Shabnam" as compiler. It was published by Lok Sevak Prakashan, Banaras, and distributed by Sahitya Bhavan Ltd., Allahabad; the imprint gives Samvat 2004 and 2006. The introduction notes that almost every song bearing Mira's name used to be accepted as hers, and presents this collection as part of a newer effort to gather her authentic padas.

The songs are grouped by theme: the guru and the company of saints, love for Giridhar Gopal and descriptions of his form, the pain of separation, Mira's replies to the Rana and the poison episode, phag and Holi songs, and surrender and detachment, with a biographical section at the start. It runs to about 365 pages.

Page 203Permalink

मिलन और बधाई १४५
पाठान्तर १,
राम रतन धन पायो, मैया मै तो राम रतन धन पायो ।
खरचै ना खूटै, वाकू चोर न लुटै, दिन दिन होत सवायो ।
नीर न डूबै वाकूँ अगिन न जालै, धरनी धर्यो न समायो ।
नाँव को नाँव भजन की बतियाँ, भवसागर से तार्यो ।
मीराँ बाई प्रभु गिरधर सरणै, चरण कमल चित लायो ।
उपर्युक्त पद के दोनो पाठो से सतंमत का प्रभाव स्पष्ट हो
जाता है।
९
माई मै तो लियो रमैयो मोल ।
कोई कहै छानी¹, कोई कहै चोरी, लियो है बजता ढोल ।
कोई कहै कारो, कोई कहै गोरो, लियो है अखी खोल ।
कोई कहै हल्का, कोई कहै मँहगा, लियो है तराजू तोल ।
तनका गहना मै सब कुछ दीन्हा, दियो है बाजूबन्द खोल ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, पूरब जनम का कोल ॥२३४॥
उपर्युक्त पाठ की भाषा राजस्थानी की ओर झुकी हुई है। पद
की द्वितीय पंक्ति मे प्रयुक्त ‘चोरी’ शब्द के बदले ‘चोडे’ का भी प्रयोग
मिलता है जो अर्थ सगति के विचार से अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।
‘चोडे’ का अर्थ हे सब की जानकारी मे । शेष पद से चतुर्थ पंक्ति भिन्न
पडती है, इतना ही नही यह पंक्ति ज्यो की त्यों अन्य पदो मे भी मिल जाती
है। इसी तरह, अन्तिम पक्ति का द्वितीयाश भी ज्यो का त्यो अन्य
पदो मे प्राप्त है।
१ छिपा कर ।
०

Page 204Permalink

पाठान्तर १,
माई म्हे गोविन्द लीनी मोल।
कोई कहै सस्तो, कोई कहै महँगो, लीनी तराजू तोल।
कोई कहै घर मे, कोई कहै वन मे, राधा के सग किलोल।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आवत प्रेम के मोल।

पाठान्तर २,
माई मै तो लीयो री गोविन्दो मोल।
कोई कहै सोहग्गो कोई कहै मेहगो लियोरी तराजू तोल।
कोई कहै छानै, कोई कहै छुरकै लीयोरी बाजता ढोल।
याकूँ तो सब लोग जाणत है, लियो अमोला मोल।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, पूरब जनम के कोल।

पाठान्तर ३,
मै तो गोविन्द लीन्हा मोल।
कोई कहै महंगा, कोई कहै सस्ता, लियो तराजू तोल।
ब्रज के लोग करै सब चर्चा, लिया बजा के ढोल।
सुर नर मुनि जाको पार न पावै, ढक लिया प्रेम पटोल।
जहर पियाला राणाजी भेज्यो, पिया मै अमृत मोल।
मीराँ प्रभु के हाथ बिकानी, सर्वस दीना घोल।
'ब्रजं कै बसिया करै सब चर्चा' और 'जहर पियाला . अमृत
मोल' जैसी अभिव्यक्तियाँ इस पाठ की विशेषताएँ हैं।

Page 205Permalink

मिलन और बधाई १४७
पाठान्तर ४,
माई मै तो लियो है सावरियो मोल ।
कोई कहै सूँघो, कोई कहै मूँहगो (मै तो) लियो ह हीरा सूँ तोल ।
कोई कहै हलका, कोई कहै भारी, (मै तो) लियोरी जाखडिया१तोल
कोई कहै घटतो, कोई बढतो (मै तो) लियो है बराबर तोल ।
कोई कहै कालो, कोई कहै गोरो, (मै तो) देख्यो हे घूँघट पट खोल ।
मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, म्हारे पूरब जनमरो कोल ।
पाठान्तर ५,
माई मै तो लियो छै सांवरियो मोल ।
कोई कहै हलको, कोई कहै भारी, (मै तो) लियो छै तराजू तोल ।
कोई कहै सोगो, कोई कहै मैंगो२, (मै तो) लियो छै अमोलख मोल ।
कोइ कहै छानै, कोई कहै चोडे (मै तो) लियो छै बजता ढोल ।
कोई कहै कालो, कोई कहै गोरो (मै तो) लियो छै अखिया खोल ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, (म्हारे) पूरब जनम को कोल ।
स्पष्ट है कि उपर्युक्त सभी पाठ एक ही पद के गेय रूपान्तर मात्र
हे। यद्यपि प्रत्येक पाठ की भाषा किसी एक बोली विशेष के प्रभाव
की द्योतक है तथापि भाव सर्वथा एक ही है।
तत्कालीन समाज के साथ मीराँ के कठोर सघर्ष की भावना
सभी पाठो से व्यक्त होती है। साथ ही सभी पाठो से निन्दा-स्तुति
के प्रति उदासीन मीराँ का आत्मविश्वास और दृढ भक्ति-भाव
“मै तो लियो तराजू तोल” जैसी अभिव्यक्ति से अति स्पष्ट हो उठता है।
शुद्ध ब्रजभाषा के साथ ही साथ राजस्थानी से कुछ प्रभावित
ब्रजभाषा मे भी प्राप्त यह पद और इसके विभिन्न पाठ विशेष
विचारणीय है ।
१ तराजू, २ महँगा।

Page 206Permalink

१४८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
गुजराती में प्राप्त पद
१
मने मलिया मित्र गोपाल, नही जाऊ सासराए ।
ससार मारूँ हो सासुरो ने बैकुंठ मारो वास रे ।
लक्ष चौरासी मारो हो चुड़ोलो रे, हारे मै तो वरिया गोपाल लाल नाथ ।
सासु हमारी शुशुमना रे, सुसरी प्रेम सतोष रे ।
जेठ जुगे जुग जीव जो रे, हा रे पेलो नावलियो निरदोस ।
आपूँ तो नवरग चूंदडी रे, नही ओढूँ कामल लगार रे ।
ओढूँ प्रेम रस चूंदडी रे, हाँ रे मारा पाप निवारण करनार ।
दियरे¹ ने दीनूँ है दीकडी² रे, दोनूँ राजकुमार रे ।
एक ने सतयुग मोहि रहियो, राणा, दूजी रही ब्रह्मचार ।
एक एक नो गुरु गोविन्द जी हो रे, दूजी की है ससार रे ।
राज छाड़ौ चित्रकूट नेरे हाला, बाला गावला सोल हजार ।
अपना पिया को जाई ने कह जो, घना दहाडो³ धना वास रे ।
बेऊँ⁴ कर जोडी हो निनवरे, हा रे गुण गावे मीराबाई दास ॥२३५॥†
पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय ह। यद्यपि अभिव्यक्ति अस्पष्ट
और कही कही असगत भी है, तथापि सतमत का प्रभाव विशेष रूपम
इंगित हो जाता है।
अन्तिम पक्ति मे 'मीराबाई दास' जैसा प्रयोग इस पद की विशे-
षता है। इस प्रयोग के आधार पर पद की प्रामाणिकता और भी
सदिग्ध हो उठती है।
२
अरज करे छे मीरा राकडी, ऊंभी ऊभी अरज करे छे ।
मणिधर स्वामी म्हारे मादेर पधारी, सेवा करु दिन रातडी ।
१ देवर, २ दीकडी अशुद्ध है, शुद्ध शब्द हैडीकरी, जिसका अर्थ हैं पुत्री, ३ दिन,
४ दोनो।

Page 207Permalink

मिलन और बधाई १४९
फुलना रे तोडा,$^१$ फुलना रे गजरा,$^२$ फुलना रे हार फल पाखडी।
फुलना रे गादी फुलना रे तकिया, फुलना री पाथरी पछेडी।
पय पकवान मिठाई ने मेवा, सेवेया ने सुन्दर दहीडी।
लवग सुपारी ने एलची, तजवाला कथा पुरारी पान बीडी।
सेज बिछाऊ ने पासा मगाऊ, रमवा आवो तो जाय रातड़ी ॥२३६॥†
मीराँ के नाम पर प्रचलित इस पद के किसी भी अंश से इसका
मीराँ विरचित होना आभासित नही होता। ऐसो पदो को प्रामाणिक
सग्रह मे स्थान न देना ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है। किसी किसी
सग्रह मे निम्नाकित एक पक्ति और भी मिलती है जिसके आधार पर
पद को मीराँ का कहा जा सकता है।
'मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, वाँला राम ने जोता ठरे आखडी।
इस पक्ति से व्यक्त होती भावना का शेष पदाभिव्यक्ति से कोई
सगति नही बैठती। फिर गुजराती मे प्राप्त मीराँ के पदो की अन्तिम
पक्ति मे 'मीराँ के प्रभु गिरधर नागर' के बदले "मीराँ के प्रभु गिरधर
ना गुण' का ही प्रयोग मिलता है। ऐसी स्थिति मे उपर्युक्त पक्ति के
आधार पर भी पद की प्रामाणिकता सिद्ध नही होती।
३
अबोला सीद लोछी मारा राज, प्राण जीवन प्रभु मारा म्हांरा राज।
अमे तो तमारा तमे तो अमारा, टाली दोस दो छोरे।
अमे तो तमारी सेवा करीये, सुख लई ने दुख दो छोरे।
जेने पोतानी मासी भारी, तेनी सो विश्वास रे।
अमृत पाई ने उच्छेरिया वाँला, बिखडा घोलि घोलि शीद पावो छोरे।
१ हाथो मे पहनने का जेवर विशेष, २ हार।

Page 208Permalink

१५० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
ऊडा कुवी मे उतरिया वाला, बरत बाढी शूं जाओ छो रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल चित लाओ छो रे ॥२३७॥
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सगति का अभाव है। 'मीराँ के प्रभु
गिरधर नागर' का प्रयोग भी अन्य गुजराती पदो की परम्परा के अनु-
कूल नही पडता।
आराध्य की अप्रसन्नता के प्रति उलाहने की अभिव्यक्ति अन्य
पदो मे भी मिलती है।

Page 209Permalink

समर्पण द्योतक पद
राजस्थानी में प्राप्त पद
१
मीराँ रग लाग्यो हो नाम हरी, और रंग अटकि परी।
गिरधर गास्यां सती न होस्या, मन मोह्यो घण नामी।
जेठ बहू नही राणा जी, थे सेवक हू स्वामी।
चोरी करा नही जीव सतावा, कांई करेगी म्हाको कोई।
गज सूँ उतरि गधे नही चढ़स्या, या तो बात न होई।
चूडो तिलक दोवडो अस माला, सील वरत सिणगार।
और वस्तु रति नही मोहै भावै कोई निन्दो,
म्हो तो गोविन्द जी रा गास्या।
जिण मारग वे संत गया छै, जी' मारग म्हे जास्या।
राज करता नरक पडता, भोगी जो रै लीया।
जोग करता मुकति पहुता, जोगी जुग जुग जीया।
गिरधर धनी धनी² मेरे गिरधर, मात पिता सुत भाई।
थे थाके मै म्हाके राणा जी, यूँ कहै मीराँ बाई। ॥२३८॥
पद के अन्तिम चरण मे "गिरधर धनी, धनी मेरे गिरधर "
के बदले "गिरधर म्हांरा मै गिरधर की" अभिव्यक्ति भी मिलती है,
जो अधिक उपयुक्त प्रतीत होती है।
पाठान्तर १,
मीराँ रग लाग्यो नाव हरी, और रंग अटकि परी।
गिरधर भजस्या सती ये न होस्यां, मन मोह्यो गिरधारी।
१ वही, २ स्वामी।

Page 210Permalink

१५२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
जेठ बहू को नाती नही छै, राणा थे सेवक म्हे स्वामी।
चूडो देवडो तिलक ज माला, सील बरत सो भारी।
चोरी करा नही जीव सतावा, काई केरैलो म्हारो कोई।
गज चढ गीदड न चढा हो राणा, ये तो बाता सरी।
गिरधर धणी गोविन्द कडूं वो, साध सत म्हारा धरी।
थे थाके म्हे म्हाके हो राणा जी, यूँ कहै मीराँ खरी।
पाठान्तर २,
मीराँ लागो रग हरी, और रग सब अटक परी।
चूडो म्हारे तिलक अस माला, सील बरत सिण गारो।
और सिगार म्हारे दाय१ न आवै, यो गुर ग्यान हमारो।
कोई निन्दो कोई बिन्दो, म्हे तो गुण गोविन्द का गास्या।
जिण मारग म्हारा साध पधारे, उन मारग म्हे जास्या।
चोरी न करस्या, जीव न सतास्या, काई करसी म्हारो कोई।
गज से उतर कर खर नही चढ़स्या, ये तो बात न होई।
कही कही निम्नाकित कुछ पक्तियाँ उपर्युक्त पद के साथ और
भी मिलती है।
सती न होस्या गिरधर गास्यां, म्हारो मन मोहो घण नामी।
जेठ बहू को नातो राणो जी, हू सेवक थे स्वामी।
गिरधर कंत गिरधर धनी म्हारे, मात पिता वीर भाई।
थे थारे मै म्हारे राणा जी, यूँ कहै मीराँ बाई।
उपर्युक्त पद के तीनो ही पाठो मे मीराँ का सती होने से इन्कार
करना सुस्पष्ट हो जाता है। राजपूती परम्परा के आधार पर यह
आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। पद के ही आधार पर यह भी मालूम होता
है कि मीराँ को सती होने का आदेश करने वाले स्वय राणा ही थे।
१ पसन्द।

Page 211Permalink

समर्पण द्योतक पद १५३
इन राणा से मीराँ का क्या सम्बन्ध था, यह सर्वथा अनिश्चित है ।
बहुत सम्भव हो कि ये राणा जेठ ही रह हो । सम्भव है कि मीराँ
अपने ही प्रति 'जेठ बहू' (प्रथम पाठ मे) की अभिव्यक्ति करती हैं
अर्थात् सब मे बडी बहू ।
“यूँ कहै मीराँ बाईं” जैसी टेक भी विचारणीय है ।
सतमत का प्रभाव इस पद से भी स्पष्ट हो उठता है । “जिग
मारग म्है जास्या” जैसी अभिव्यक्ति ‘गुरु’ और उनके
प्रदर्शित मार्ग के प्रति मीराँ के विशेष अनुराग को ही सिद्ध करती है ।
२
चाला वाही देस, चाला वाही देस ।
कहो कुसम्भी सारी रगावा, कहो तो भगवा भेस ।
कहो तो मोतियन मांग भरावा, कहो तो छिटकावा केस ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सुणज्यो बिडद नरेस । ।।२३९।।
यह पद विशेष महत्वपूर्ण है । “जिन जिन भेखा म्हारो साहिब
रीझै, सोई सोई भेख धारणा”के लिये उतावली मीराँ स्वय ही यह निश्चित
नही कर पा रही हैं कि आराध्य को कौन रूप स्वीकृत होगा । “कहो तो
मोतियन भगवा भेस ।” सम्भव है कि वैष्णव और
नाथ पथ की विभिन्न परम्पराओ के कारण ही ऐसी अभिव्यक्ति हुई हो ।

Page 212Permalink

१५४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
मिश्रित भाषा में प्राप्त पद
१
म्हाने चाकर राखो जी गिरधारी लाला, चाकर राखोजी।
चाकर रहसूँ बाग लगासूँ, नित उठि दरसन पासू।
वृन्दावन की कुंज गलिन मे गोविन्द लीला गासूं।
चाकरी मे दरसनं पाऊ, सुमिरन पाऊं खरची।
भाव भगत जागिरी पाऊं, तीनो बाता सरसी।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, गल वैजन्ती माला।
वृन्दावन मे धेनु चरावै, मोहन मुरली वाला।
ऊचे ऊचे महल बनाऊं, बिच बिच राखू बारी।
सावरिया के दरसन पाऊ, पहिर कुसुम्मी सारी।
जोगी आया जोग करन कूँ, तप करने सन्यासी।
हरी भजन को साधू आए, वृन्दावन के वासी।
मीराँ के प्रभु गहिर गम्भीरा, हृदे रहो जी धीरा।
आधी रात प्रभु दरसन दीन्हो, प्रेम नदी के तीरा ॥२४०॥
इस पद की टेक “मीराँ के प्रभु गहिर गम्भीरा” सर्वथा नूतन है।
२
मैं तो थारे दामन लागी जी गोपाल।
किरपा कीजो दरसन दीजो, सुध लीजो तत्काल।
गल बैजन्ती माल बिराजै, दर्शन भई है निहाल।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, भक्तन के रखपाल। ॥२४१॥
पद की तृतीय और चतुर्थ पंक्तियों के द्वितीयार्द्ध विरोधात्मक
भावना के द्योतक हैं।

Page 213Permalink

समर्पण द्योतक पद १५५
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
मेरे मन राम नाम बसी ।
तेरे कारण स्याम सुन्दर, सकल जोगा हांसी ।
कोई कहै मीराँ भई बावरी, कोई कहे कुलनासी ।
कोई कहै मीराँ दीप आगरी, नाम पिया सूं रासी ।
खाड धार भक्ति की न्यांरी, काटी है जम फासी ॥२४२॥
पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है। कठिन सघर्ष के साथ
ही साथ मीराँ को गहरा समर्थन भी प्राप्त हुआ। 'कुलनासी' और
'दीप आगरी' जैसे विशेषण साथ ही साथ मिले। वृन्दावन पहुँचने पर
भी ये दोनों विरोधी धाराये अक्षुण्ण रही, यही ऐसे पदो से सुस्पष्ट
होता है।
२
हमारे मन राधा स्याम बसी।
कोई कहै मीराँ भई बावरी, कोई कहै कुलनासी।
खोल के घूँघट प्यार के गाती, हरि ढिग नाचत गासी।
वृन्दावन की कुजगलिन मे, भाल तिलक उर लसी।
विष को प्याला राणा जी ने भेज्या, पीवत मीराँ हासी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भक्ति मार्ग मे फंसी ॥२४३॥
दोनो पदों की अन्तर्भावना एक ही है,तथापि प्रथम पद का भाव-
गाम्भीर्य दूसरे पद मे नही। दूसरे पद की भाषा पर खडी बोली का भी
प्रभाव भी विचारणीय है। पूर्वापर संगति, विचार-गाम्भीर्य और भाषा
की शुद्धता के दृष्टिकोण से भी प्रथम पद प्रामाणिकता के अधिक
निकट पडता सिद्ध होता है।

Page 214Permalink

१५६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
३
माई मै तो गोविन्द सो अटकी ।
चकित भए है दृग दोऊ मेरे, लखि शोभा नटकी ।
शोभा अग अग प्रति भूषण, बनमाला तट की ।
मोर मुकुट कटि किकिन राजै, दुति दामिनी पटकी ।
रमित भई हां सावरे के सग लोग कहै भटकी ।
छुटि लाज कुल कानि लोग डर, रह्यो न घर हटकी ।
मीराँ प्रभु के संग फिरैगी, कुजा कुजा लटकी ।
बिनु गोपाल लाल के सजवनी, को जानै घटकी ।।२४४।।†
उपर्युक्त पद को प्रामाणिक मान लेने पर अभिव्यक्ति विचारणीय
हो जाती है। पद मे परम्परानुगत टेक नही है। केवल 'मीराँ' नाम
मात्र का प्रयोग किसी अन्य पद मे नही मिलता। टेक के बाद और
एक पक्ति अन्य कुछ पदो मे भी मिलती है, परन्तु ऐसे पदो की
प्रामाणिकता संदिग्ध ही है।
४
पग घूँघरू बाध मीराँ नाची रे ।
मै तो मेरे नारायण की, आपही हो गई दासी रे ।
लोग कहै मीराँ भई बावरी, न्यात कहै कुलनासी रे ।
विष का प्याला राणा जी भेज्या पीवत मीराँ दासी रे ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सहज मिले अविनासी रे ।।२४५।।
उपर्युक्त पद की भाषा पर खडी बोली की छाप विशेष
स्पष्ट दिखती है। “सहज मिले अविनासी' जैसी अभिव्यक्ति
विचारणीय है। सम्भवत इसको संतमत का ही प्रभाव कहा जा सकता
है। संतमत से प्रभावित पदो “साँवरे रग राची” जैसे पद से इस पद का
बहुत साम्य है। विभिन्न पदो के सम्मिश्रण से एक स्वतन्त्र पद का बन
जाना असम्भव नही प्रतीत होता तथापि यह कहना असम्भव हे कि
कौन पद किस रूप मे प्रामाणिक है।

Page 215Permalink

समर्पण द्योतक पद १५७
५
चितनन्दन आगे नाचूँगी।
नाच नाच पिय रसिक रिझाऊ, प्रेमी जन को जाचूँगी।
प्रेम प्रीति का बाध घूघरा, ‘सुरत की कछनी काढूँगी।
लोक लाज कुल की मरजादा,या मै एक न राखूँगी।
पिया के पलगा जा पोढूँगी, मीराँ हरि रग राचूँगी ॥२४६॥
पूर्व पद का पाठान्तर से प्रतीत होते इस पद पर सतमत का प्रभाव
विशेष रूपेण स्पष्ट हो जाता है। भाषा पर खड़ी बोली का प्रभाव भी
विचारणीय है। प्रथम पंक्ति मे प्रयुक्त ‘चितनन्दन’ के बदले ‘रघुनन्दन’
और द्वितीय पंक्ति मे ‘पिय’ के बदले ‘यदुनाथ जी’ शब्द का भी व्यवहार
मिलता है।
पाठान्तर १,
घूघरू बाध मीराँ नाची रे, पग घूघरूं।
लोग कहै मीराँ हो गई बावरी, सास कहै कुलनासी रे।
जहर का प्याला राणा जी भेज्या पीवत मीराँ हासी रे।
मै तो अपने नारायण की आपही हो गई दासी रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बेग मिलो अविनासी रे।
६
मै गिरिधर के घर जाऊ।
गिरिधर म्हारो साचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊं।
रैन पडे तब हि उठि धाऊ, भोर भये उठि आऊ।
रैन दिना वाके सग खेलूँ, ज्यो त्यो ताहि लुभाऊ।
जो पहिरावै सोई पहिरू, जो दे सोई खाऊं।
मेरी उन की प्रीत पुरानी, उन बिन पल न रहाऊ।
जहा बैठावै तित ही बैठूं, बेचै तो बिक जाऊ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बार बार बलि जाऊ ॥२४७॥

Page 216Permalink

१५८ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
उपर्युक्त पद मे 'म्हारो' (मेरा) और 'धारो', (आपका या
तुम्हारा) ये दो शब्द शुद्ध राजस्थानी के है, जब कि शेष पद की भाषा
ब्रजभाषा है। परशुराम जी द्वारा सग्रहीत 'पदावली' मे 'उन की',
'पुरानी' आदि के बदले 'उण की' 'पुराणी' आदि का प्रयोग मिलता है,
जिससे पद की भाषा पर राजस्थानी प्रभाव और भी स्पष्ट हो
उठता है।
७
हरि मेरे जीवन प्राण अधार।
और आसिरो नाहि न तुम बिनु, तीनूं लोक मझार।
आप बिना मोहि न सुहावं, निरख्यौ सब ससार।
मीराँ कहे मै दासी बावरी, दीज्यो मति बिसार ॥२४८॥
८
निपट बक्ट छबि अटकै मेरे नैना, निपट बक्ट छबि अटके।
देखत रूप मदन मोहन को, पियत मयूखन अटके।
वारिज भवा अलका टेढी, मनो अति सुगध रस वटके।
टेढी कटि टेढी कर मुरली, टेढी पाग लर लटके।
मीराँ प्रभु के रुप लुभानी, गिरिधर नागर नटके ॥२४९॥
९
सखी मेरो कानूड़ो कलेजे कोर।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल की झकझोर।
बिन्द्रावन की कुज गलिन मे, नाचत नन्दकिशोर।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल चितचोर। ॥२५०॥

Page 217Permalink

समर्पण द्योतक पद १५९
विभिन्न बोलियों में प्राप्त पद
१
हमरे रौरे लागिल कैसे छूटे।
जैसे हीरा हनत निहाई, तैसे हमरे रौरे बनि जाई।
जैसे सोना मिलत सोहागा, तैसे हम रौरे दिल लागा।
जैसे कमल नाल बिच पानी, तैसे हम् रौरे मन मानी।
जैसे चन्दा मिलत चकोरा, तैसे हम रौरे दिल जोरा।
जैसे मीराँ पति गिरधारी, तैसे मिलि रहू कुज बिहारी ॥२५१॥
पद की भाषा स्पष्ट रूपेण अवधी है।
२
जो तुम तोडो पिया, मै नही तोडे्।
तोरी प्रीत तोडी, कृष्ण कौन सग जोडे्।
तुम भये तरुवर, मै भई पखिया।
तुम भये सरवर, मै भई मछिया।
तुम भये गिरिवर, मै भई चारा।
तुम भये चदा, मै भई चकोरा।
तुम भये मोती प्रभुजी, हम भये धागा।
तुम भये सोना, हम भये सुहागा।
बाई मीराँ के प्रभु, ब्रज के बासी।
तुम मेरे ठाकुर, मै तेरी दासी ॥२५२॥†
भाव, भाषा दोनो के ही आधार पर पद की प्रामाणिकता संदिग्ध
है। भाषा खडी बोली है और भाव मे वह गाम्भीर्य नही है जो
तथाकथित मीराँ के पदो मे प्राय प्राप्त है। उपर्युक्त पद की
तुलना कीर्तन-मंडली के चालू पदो से की जा सकती है।

Page 218Permalink

१६० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
गुजराती में प्राप्त पद
१
मुखडानी माया लागी रे मोहन प्यारा।
मुखडु मे जोयुँ¹ तारुँ² सर्वजग थार्युँ³ खारु।
सब मारु रहूदूँ न्यारु रेयु
ससारीडु सुख एवु झाझ बाना नीर जोवुँ⁴,
तेरे तुच्छ करी करीए रे।
मीराँ बाई बलिहारी, आशा मने तकतारी,
हवेँ⁵ हुँ तो बड भागी रे† ।।२५३।।†
२
लेह लागी मने तारी, आल्याजी लेह लागी मने तारी।
काम काज मुक्युँ⁶ ने धाम ज मुक्युँ, मनमा चाहु छुँ मुरारी।
खमे छै काबली हाथ मा छे बासरी, गोकुल मा गायो चारी।
सोल सहस्त्र गोपियो ने तमे वरिया, तोय तमे बाल ब्रह्मचारी।
मीराँ कहे प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल बलिहारी ।।२५४।।†
पद की तीसरी पंक्ति की अभिव्यक्ति शेष पद से सर्वथा भिन्न
पड़ती है, “मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर” का प्रयोग भी गुजराती पदो
की परम्परा के अनुसार नही है।
३
नागर नन्दा रे बाल मुकुन्दा, छोडी छोने जनना धधा रे,
मारी नजरे रहे जो रे नागर नन्दा।
───────
१ देखा, २ तुम्हारा, ३ हो गया, ४ जैसा, ५ अब, ६ छोड दिया।

Page 219Permalink

समरंग द्योतक पद १६१
काम ने काज मने कांई नव सूझे, भूलि गई हूँ मारा घर धंधा रे।
आडु अवलुं मे तो कांई नव जोयुं, जोया जोया छे पुनम केरा चंद रे।
बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, लागी छे मोहनी मने फदा रे ॥॥२५५॥†
४
राम रमकडू १ जडियो रे रानाजी, मने राम रमकडो जडियो।
रुमझुम कर तो मारे मन्दिरे पधारियो, नही कोई याते घडियों रे।
मोटा मोटा मुनीजन मथी मथी थाक्या, कोई एक बिरला ने हाथे चुड़ियो रे।
सुनु सिखर ना रे घाटती, ऊपर अगम अगोचर नाम पडचुं रे।
बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मारु नाम सामलियां सूं जडियो रे।
॥२५६॥†
५
राम सीता पती थारी नेह लागी हो।
हो तम्ने भजी थी म्हांरी मीड भागी।
घरनो तो धन्ध रे मने नथी गमतौ।
साधु सधा ते मारी प्रीत बाधी।
काम काज छोड़िया मै तो लोक लाज मेली।
प्रेम मगन मा हू राजी।
अज्ञान मी कोठड़ी मा ऊध घनी आवै।
प्रेम प्रकाश मा हू जागी।
दुरजन लोग मारे निन्दा करे छे।
वा'ला लागे छै मानो वैरागी।
नाची कूदी मे तो भक्ति न कीधीं।
लोक नी लाज मै बहू राखी।
१ खिलौना।
११

Page 220Permalink

१६२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
ध्रुव जी ने लागी, प्रल्हाद जी ने लागी।
द्रोपदी ने सभा मा भीड भागी।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर।
जन्मो जनम नी हू त्यगी। ॥२५७॥†
पदाभिव्यक्ति मे विरोधाभास और पूर्वापर संगति का अभाव
है। कही कही अर्थ संगति भी नही बैठती। अन्तिम दो पक्तियो
की गर्वोक्ति के आधार पर पद का मीराँ विरचित होने मे
सदेह होता है।
६
सुन्दरि स्याम सरीरं म्हार दिल, सुन्दरि स्याम सरीर।
कोई ने भाव भवानी ऊपर, कोई ने वाला पीर।
गगा रे कोई ने जमुना रे कोई ने, कोई ने अडसड तीर।
कोई नी रे हस्ती कोई नी रे घोडा, कोई नी रे म्हैल मन्दीर।
मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर नागर, हरी हलधर केरा बीर ॥२५८॥†
७
नही रे बिसरु हरि अन्तर मां थी नही रे।
जल जमुना ना पाणी रे जाता शिर पर मटकी धरी।
आवतां न जाता मारग बचे अमूलख वस्तु जडी।
आवता न जाता रे वृन्दा रे बन मा चरण तमारी पड़ी रे।
पीला पीताम्बर जरकस जामा, केसर आड करी।
मोर मुकुट ने काने रे कुडल, मुख पर मुरली धरी।
बाई मीराँ कहे प्रभु गिरिधर ना गुण, विट्ठल बर ने बरी ॥२५९॥†
पदार्भिव्यक्ति मे पूर्वापर सबंध और अर्थ संगति का अभाव
है। पद की अन्तिम पंक्ति विचारणीय है। गुजराती मे प्राप्त अधिकाश

Page 221Permalink

“दासी” और “जन”
प्रयोग युक्त पद
राजस्थानी में प्राप्त पद
१
तुमर कारण सब सुख छाड़्या, अब मोहिं क्यूं तरसावौ हो ।
बिरह बिथा लागी उर अन्तर, सो तुम आप बुझावौ हो ।
अब छोड़त नाहि बणै प्रभु जी, हँसि करि तुरत बुलावौ हो ।
मीराँ दासी जनम जनम की, अग से अग लगावौ हो ॥२६०॥
इस पाठ की भाषा पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है। पद की अभि-
व्यक्ति के आधार पर ही ऐसा प्रतीत होता है कि सम्भवत पद की कुछ
पूर्व पंक्तियाँ लुप्त हो गई है। “अब छोड़त नाहिं बणै प्रभु जी” अभि-
व्यक्ति विचारणीय है।
२
थांरी हूँ रमैया मोसूं नेह निभावौ ।
थारे कारण सब सुख छोड्या, हमकूं क्यू तरसावौ ।
बिरह बिथा लागी उर अन्दर, सो तुम आय बुझावौ ।
अब छोड़या नाहि बनै प्रभु जी, हँस कर तुरत बुलावौ ।
मीराँ दासी जनम जनम की, अंग सूं अग लगावौ ॥२६१॥
उपर्युक्त दोनों पदों मे गहरा साम्य विचारणीय है।- द्वितीय पद
की भाषा राजस्थानी प्रधान है, जब कि पहले पद पर आधुनिक प्रभाव
स्पष्ट है। यह पद पूर्व पद से अधिक पूर्ण भी प्रतीत होता है।

Page 222Permalink

१६६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
३
पपइया रे पिव की बाणी न बोलं।
सुणि पावेली बिरहणी रे, थांरी राखेली पाख मरोड।
चोच कटाऊ पपइया, ऊपरि कालर लूण।
पिव मेरा मै पिव की रे, तू पिव कहैस¹ कूण।
थारा सबद सुहावणा रे, जो पिव मेल्या² आज।
चोच मढाऊ थांरी सोवनी³ रे, तू मेरे सिरताज।
प्रीतम को पतिया लिखूँ, कऊवा तू ले जाइ।
प्रीतम जू सूं यो कहै रे, थारी बिरहणी धान न खाइ।
मीराँ दासी ब्याकुली रे, पिव पिव करत बिहाई⁴।
बेगि मिलो प्रभु अन्तरजामी, तुम बिन रह्योइ न जाइ॥२६२॥
उपर्युक्त पद की कुछ पंक्तिया "प्रीतम कूँ ...... रह्योइ न
जाय" स्वतन्त्र पद के रूप मे भी प्राप्त है।
४
साजन घर आवो जी मिठबोला।
कब की ठाढ़ी पथ निहारू, था ही आया होसी भला।
आवो निसक सक मत मानो, आयौ ही सुख रहला।
तन मन वार करू न्योछावर, दीजो स्याम मोहेला।
आतुर बहुत बिलम नही करना, आया ही रग रहेला।
तेरे कारण सब रग त्यागा, काजल तिलक तमोला।
तुम देख्या बिन कल न परत है, कर धर रही कपोला।
मीराँ दासी जनम जनम की, दिल की घुन्डी खोला। ॥२६३॥
१ कहने वाला "कहै" शब्द मे 'स' लय बैठाने के लिये जोड दिया गया है।
राजस्थानी गीत-परम्परा मे प्राय ऐसा होता है। २ मिले, ३ सुन्दर, ४ बेहाल।