मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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Read in context१५६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
३
माई मै तो गोविन्द सो अटकी ।
चकित भए है दृग दोऊ मेरे, लखि शोभा नटकी ।
शोभा अग अग प्रति भूषण, बनमाला तट की ।
मोर मुकुट कटि किकिन राजै, दुति दामिनी पटकी ।
रमित भई हां सावरे के सग लोग कहै भटकी ।
छुटि लाज कुल कानि लोग डर, रह्यो न घर हटकी ।
मीराँ प्रभु के संग फिरैगी, कुजा कुजा लटकी ।
बिनु गोपाल लाल के सजवनी, को जानै घटकी ।।२४४।।†
उपर्युक्त पद को प्रामाणिक मान लेने पर अभिव्यक्ति विचारणीय
हो जाती है। पद मे परम्परानुगत टेक नही है। केवल 'मीराँ' नाम
मात्र का प्रयोग किसी अन्य पद मे नही मिलता। टेक के बाद और
एक पक्ति अन्य कुछ पदो मे भी मिलती है, परन्तु ऐसे पदो की
प्रामाणिकता संदिग्ध ही है।
४
पग घूँघरू बाध मीराँ नाची रे ।
मै तो मेरे नारायण की, आपही हो गई दासी रे ।
लोग कहै मीराँ भई बावरी, न्यात कहै कुलनासी रे ।
विष का प्याला राणा जी भेज्या पीवत मीराँ दासी रे ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सहज मिले अविनासी रे ।।२४५।।
उपर्युक्त पद की भाषा पर खडी बोली की छाप विशेष
स्पष्ट दिखती है। “सहज मिले अविनासी' जैसी अभिव्यक्ति
विचारणीय है। सम्भवत इसको संतमत का ही प्रभाव कहा जा सकता
है। संतमत से प्रभावित पदो “साँवरे रग राची” जैसे पद से इस पद का
बहुत साम्य है। विभिन्न पदो के सम्मिश्रण से एक स्वतन्त्र पद का बन
जाना असम्भव नही प्रतीत होता तथापि यह कहना असम्भव हे कि
कौन पद किस रूप मे प्रामाणिक है।