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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव

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DevanagariRajasthanipublished365 pages

Page 213 of 365

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Page 213

समर्पण द्योतक पद १५५
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
मेरे मन राम नाम बसी ।
तेरे कारण स्याम सुन्दर, सकल जोगा हांसी ।
कोई कहै मीराँ भई बावरी, कोई कहे कुलनासी ।
कोई कहै मीराँ दीप आगरी, नाम पिया सूं रासी ।
खाड धार भक्ति की न्यांरी, काटी है जम फासी ॥२४२॥
पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है। कठिन सघर्ष के साथ
ही साथ मीराँ को गहरा समर्थन भी प्राप्त हुआ। 'कुलनासी' और
'दीप आगरी' जैसे विशेषण साथ ही साथ मिले। वृन्दावन पहुँचने पर
भी ये दोनों विरोधी धाराये अक्षुण्ण रही, यही ऐसे पदो से सुस्पष्ट
होता है।
२
हमारे मन राधा स्याम बसी।
कोई कहै मीराँ भई बावरी, कोई कहै कुलनासी।
खोल के घूँघट प्यार के गाती, हरि ढिग नाचत गासी।
वृन्दावन की कुजगलिन मे, भाल तिलक उर लसी।
विष को प्याला राणा जी ने भेज्या, पीवत मीराँ हासी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भक्ति मार्ग मे फंसी ॥२४३॥
दोनो पदों की अन्तर्भावना एक ही है,तथापि प्रथम पद का भाव-
गाम्भीर्य दूसरे पद मे नही। दूसरे पद की भाषा पर खडी बोली का भी
प्रभाव भी विचारणीय है। पूर्वापर संगति, विचार-गाम्भीर्य और भाषा
की शुद्धता के दृष्टिकोण से भी प्रथम पद प्रामाणिकता के अधिक
निकट पडता सिद्ध होता है।