मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
About this granth
Mirabai, the sixteenth-century Krishna devotee associated with the royal house of Mewar, is one of the most loved voices of the bhakti movement. Her padas addressed to "Giridhar Gopal", in a mix of Rajasthani, Braj and Gujarati, have travelled widely in oral and devotional tradition.
This volume is the Meera Brihat Pad Sangrah (मीराँ बृहद् पदावली), whose title page names Padmavati "Shabnam" as compiler. It was published by Lok Sevak Prakashan, Banaras, and distributed by Sahitya Bhavan Ltd., Allahabad; the imprint gives Samvat 2004 and 2006. The introduction notes that almost every song bearing Mira's name used to be accepted as hers, and presents this collection as part of a newer effort to gather her authentic padas.
The songs are grouped by theme: the guru and the company of saints, love for Giridhar Gopal and descriptions of his form, the pain of separation, Mira's replies to the Rana and the poison episode, phag and Holi songs, and surrender and detachment, with a biographical section at the start. It runs to about 365 pages.
संघर्षाभिव्यक्ति १३१
“सूल सेज” भेजे जाने की कथा का वर्णन इस पद की विशेषता है।
सम्पूर्ण पद की शैली वर्णनात्मक है। अतः यह कहा जा सकता
है कि किसी अन्य व्यक्ति ने मीराँ की प्रशंसा मे यह पद लिखा है।
खड़ी बोली में प्राप्त पद
१
तेरा मेरा जिवडा यक कैसे होय राम।
हमने कहा सुरझावन राणा, तुम जाने मुरझाय राम।
हमने कहा निर्मोहित रहना, तुमतो जान मोहाय राम।
तेल जले तो जलती है बाती, दिवरा झलमल सोय राम।
जल गया तेल रे बुझ गई बाती, लच्चर लच्चर होय राम।
हमने कहा आंखिन का देखा, तुम कानों सुनि सोय राम।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, होनहार सो होय राम। ॥२०९॥†
पदाभिव्यक्ति मे संगति का अभाव है।
गुजराती में प्राप्त पद
१
आदि वैरागिण हुँ राणा जी मै आदि वैरागिण हुँ।
मीराँ बाघ घूघरा रे, हाथ लिये करतार।
अमोरे गिरधर आगे नाची सुँरे, गुनगाई सुँ रे गोपाल।
विषना प्याला राना मोकलियो रे, दीज्यो मीराँ के हाथ।
कर चरणामृत पी गया रे, अमोरे बासी श्री रघुनाथ ॥२१०॥†
२
आज मोरे साधु जन नो संगेरे, राणा, मारा भाग्य भला रे।
साधु जननो सग जो करिये, पिया जो चढे ते चौगुणो रंग रे।
साक्ट जन नो सग न करिये, पिया जी पाड़े भजन मे भंग रे।
१३२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
अड़सठ तीरथ सतो ने चरणे, पिया जी, कोटि काशी ने कोटि गंगरे ।
निन्दा करसे तो नरक कुंड मा जशे, पिया जी, थशे आधला अपगरे ।
मीराँ कहै गिरधर ना गुण गायो, पिया जी, सतोनी रझमा शीरसगे रे ।
॥२११॥
३
मै तो छाडी छाडी कुल की लाज, रगीलो राणा काई करसे माणा राज ।
पाव मे बाधूगी घुँघरा, हाथ मे लेऊंगी सितार ।
हरि के चरणो आगे नाचती रे, काई रीझेगो करतार ।
जहेर को प्यालो राणा जी भेज्यो, धरियो मीराँबाई हाथ ।
करि चरणामृत पी गई रे श्री ठाकुर को परसाद ।
राणा जी ये रीस करी भेज्यो, झेरी नाग असार ।
पकड गले बिच डालियो, कांई हो गयो चन्दन हार ।
मीराँ को गिरधारी मिलिया, जनम जनम भरतार ।
मै तो दासी जनम जनम की, कृष्ण कत सरदार ॥२१२॥†
४
गोविन्दो प्राणो अमारो रे, मने जग लाग्यो खारो रे । गोविन्द ।
मने मारो राम जी भावे रे, बीजो मारे नजरो न आवै रे । ,,
मीराँ बाई माँ महल मा रे, हरि संतन नो वास । ,,
कपटी थी हरि दूर बसे, मारा सतन केरी पास । ,,
राणा जी कागज मोकले रे, दो राणी मीराँ ने हाथ । ,,
साधुनी संगत छोड़ि दो, तमो वसो नी हमारे साथ । ,,
मीराँ बाई कागज मोकले रे, दीजो राणा जी ने हाथ । ,,
राज पाट तमे छोड़ी राणा जी, वसो साधु ने साथ । ,,
विष नो प्यालो राणो मोकलिया रे, पीजो मीराँ ने हाथ । ,,
अमृत जानी मीरा पी, जे ने सहाय श्री विश्वनाथ । ,,
साढ़वाला साढ़ शनगारजे रे,-जावुं सो सो रे कोश । ,,
संघर्षाभिव्यक्ति १३३
राणा जी ना देशमा मारे जलरे पीवा नो दोशं । ,,
डाबो मैल्यो मेवाड रे, मीराँ गई पश्चिम माय । ,,
सरब छोड़ी ने मीराँ नीसयो, जेयुँ भायामा मनहु न काय । ,,
सासु हमारी सुषमणा ॰रे, ससरो प्रेम सन्तोष । ,,
जेठ जगजीवन जगत मा, भारो नावलियो निर्दोष । ,,
चूँदड़ी ओढूँ त्यारो रंग चुवे रे, रग बेरंगी होय । ,,
औढूँ छुँ कालो कामलो, दूजौ दाग न लागे कोय । ,,
मीराँ हरिणी लाडली रे, रेहती संत हजूर । ,,
साधु संघाते स्नेह घणो, पेला कपटी थी दिल दूर ॥२१३॥†
उपर्युक्त पद राजस्थानी मे प्राप्त संघर्ष द्योतक विभिन्न पदो के
विभिन्न अशो का सम्मिश्रण ही प्रतीत होता है। पद के उत्तरार्द्ध से
सत मत का प्रभाव स्पष्ट है। इसी तरह की अभिव्यक्ति अन्य सत
मत प्रभावद्योतक पदो मे भी मिलती है।
५
म्हांरे सिर पर सालिग्राम, राणाजी म्हारे काई करसी ।
मीराँ सूं राणा ने कही रे, सुण मीराँ मोरी बात ।
साधो की संगत छोड़ दे रे, सखियां सब सकुचात ।
मीराँ ने सुन यो कही रे, सुन राणा जी बात ।
साध तो माई बाप हमारे, सखियां क्यूँ घबरात ।
जहर का प्याला भेजियारे, दीजो मीराँ हाथ ।
अमृत कर के पी गई रे, भली करें दीनानाथ ।
मीराँ प्याला पी लियारे, बोली दोउ कर जोर ।
तैं तो मारण की करी रे, मेरो राखणहारो और ।
आधे जोहड़ कीच है रे, आंध जोहड हौज़ ।
आंध मीराँ एकली रे, आंधे राणा की फौज ।
काम क्रोध को ड़ालकेर, सील लिए हथियार ।
१३४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
जोती मीराँ एकली रे, हारी राणा की धार।
काचगिरी का चौतरा रे, बैठे साध पचास।
जिन मे मीराँ ऐसी दमके, लख तारो मे परकास।
टाडा जब वे लादिया रे, बेगी दीन्हा जाण।
कुल की तारण अस्तरी रे, चली है पुष्कर न्हाण ॥२१४॥
पद की शैली और अभिव्यक्ति ही पद को प्रक्षिप्त सिद्ध करती
है। पद का प्रारम्भ होता है दृढ विश्वास की अभिव्यक्ति से, परन्तु
दूसरी ही पंक्ति मे भावना बदल जाती है। चार पक्तियो मे राणा
और मीराँ के बीच संवाद है। संवाद की अभिव्यक्ति विरोधमय है।
शेष पदाश से मीराँ का गहरा सघर्ष और दृढ भक्ति भावना की ही
प्रशस्त अभिव्यक्ति होती है। अन्तिम दोनो पक्तियाँ घटनाद्योतक
हैं जिनसे मालूम होता है कि “कुल की तारण अस्तरी” मीराँ पुष्कर
नहाने के लिए जा रही हैं।
── ० ──
मिलन और बधाई
राजस्थानी में प्राप्त पद
१
म्हारा ओलगिया१ घर आया जी।
तन की ताप मिटी सुख पाया, हिलमिल मगल गाया जी।
घन की धुनि सुनि मोर मगन भया, यूं मेरे आणंद आया जी।
मगन भई मिलि प्रभु आपणा सूं, मै कर दरध मिटाया जी।
चंद को देखि कमोदणि फूले, हरखि भया मेरी काया जी।
रग रग सीतल भई मेरी सजनी, हरि मेरे महल२ सिधाया जी।
सब भगतन का कारज कीन्हा, सोई प्रभु मै पाया जी।
मीराँ बिरहणी सीतल होई, दुख द्वन्द दूरी नसाया जी ॥२१५॥
२
सहेलिया साजन घर आया हो।
बहोत दिना की जोवती३, बिरहिन पिव पाया हो।
रतन करु नेछावरी, ले आरति साजू हो।
पिया का दिया सनेसड़ा४, ताहि बहोत निवाजू हो।
पांच सखी इकट्ठी भई, मिलि मगल गावै हो।
पिय की रली५ बधावणा आंनन्द अंगि न मावै६ हो।
१ परदेश रहता प्रियतम, २ अभिसार के लिये नियुक्त कक्ष विशेष के लिये
रुढ़िगत मुहावरा, ३ प्रतीक्षा करती, ४ संदेश, ५ मलगमय, ६ समाये।
१३६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
हरि सागर सू नेहरो१, नैणा बांध्यो सनेह हो।
मीराँ सखी के आंगणै, दूधां बूंठा२ मेह हो ॥२१६॥
पद पर सतमत का प्रभाव स्पष्ट है। "मीराँ सखी' का प्रयोग
सर्वथा नूतन है। अत्युक्ति न होगी यदि कहा जाय कि यही एक पद
ऐसा है जिसमे इस तरह का प्रयोग मिलता है। पद की चतुर्थ
पंक्ति की अभिव्यक्ति शेष पदाभिव्यक्ति के विरुद्ध पडती है क्योकि
उपर्युक्त पक्ति से वियोग ही लक्षित होता है। छठी पक्ति मे “प्रिय
की लीनी 'बधावणा' प्रयोग है। राजस्थानी की परम्परा पर दृष्टि
रखते “प्रिय का रली बधावणां" पाठ ही शुद्ध ठहरता है।
३
रामजी पधारे धनि आज री घरी।
आज री घरी वो भाव री भरा।
गुरु रामानद अर माधवाचारन, नीमानन्द बिसर स्याम हरी।
आजि मेरो आगण सुहावणूं, रसण लागे पी पेम हरी
अरसि परसि मिलि हरिगुण गास्या,धनि मेरी इर्षा इन भाव भरी
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, पकडि पावौ विधाता पेम हरी
॥२१७॥
अभिव्यक्ति के आधार पर पद की प्रामाणिकता संदिग्ध है।
पाँचवी और अन्तिम पक्तियो के उत्तरार्द्ध अर्थहीन प्रतीत होते हैं।
'गुरु रामानन्द माधवा चारेन और नीमानन्द के आगण मे आने की अभि-
व्यक्ति प्राप्त सामग्री के आधार पर सगत सिद्ध नही होती ।
४
राम सनेही सावरियो, म्हांरी नगरी में उतर्यो आई।
प्राण जाय पणि३ प्रीत न छाडूूं, रहौ चरण लपटाय।
१ प्रेम, २ बूंठाँ-मेह—दूध की वर्षा से भर गया, उत्साह और आनन्द से
परिपूर्ण हो गया, ३ तथापि ।
मिलन और बधाई १३७
सपत¹ दीप की दे परकरमा, हरि हरी मे रहौ समाय ।
तीन लोक झोली मे डारै, धरही ती कियो निपान² ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, रहौ चरण लपटाय ॥२१८॥
प्रथम पंक्ति मे प्रयुक्त 'राम स्नेही' प्रयोग विचारणीय है। पद की
तृतीय पंक्ति से सतमत की भावना ही स्पष्ट हो उठती है जब कि शेष
पद मे वैष्णव प्रभाव ही लक्षित होता है। यह भी विचारणीय प्रश्न है।
५
गिरधर आवणा है ऊदाँबाई लेजडली संवार ।
आवण री बिरिया³ भई जी, अब महलां ढोल्यो⁴ ढार ।
अँतर⁵ सुगंध मिलाय के जी, घी भर दिवला बार ।
जाई जुही केतकी जी, चपा कली सुधार ।
पलकां सू करां पावडाजी, अंचला सू मग झार ।
गिरधर म्हारो परम स्नेही गिरधर उनकी नार ॥ २१९ ॥
निम्नांकित दो पंक्तियाँ और भी मिलती है .
पुष्पन सो झोली भरी, रुचि रुचि सेज संवारि ।
चारुं दिस फिरती फिरै, ऊदाँ चमेली लार⁶ ।
अद्यावधि प्राप्त पदों से मीराँ के प्रति ऊदाँ का विरोध भाव
ही लक्षित होता रहा है। यही एक पद भक्ति के क्षेत्र मे मीराँ और
ऊदाँ की निकटता का द्योतक है।
६
म्हांरे आज रंगीली रात, मनडरा म्हरम आइया ।
या छिब निरखण सुगन⁷ मनावण, अतर सुगध लगावण ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मन अंछ्या⁸ बर पावण । ॥२२०॥
१ सप्त, २ नाप दिया, ३ समय, ४ अतिथि अभ्यागत के लिये बनाए
गए छोटे पलग, ५ इत्र, ६ पीछे, ७ सगुण, ८ इच्छित ।
१३८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
७
रे सांवलिया म्हारे आज रगीली गणगोर छै जी ।
काली पीली बादली मे बिजली चमके, मेघ घटा घनघोर छै जी ।
दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल कर रही शोर छै जी ।
आप रंगीली, सेज रंगीली, और रगीली सारो साथ छै जी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरना मै म्हांरो जोर छै जी ।
॥२२१॥†
गणगोर (शिवपार्वती) का उत्सव मनाने की अभिव्यक्ति के
कारण पद की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध है। विस्तृत विवेचना के
लिये देखे, ‘मीरा, एक अध्ययन’ आलोचना खड ।
८
म्हाके जी गिरधारी, थासूं म्हे बोले।
थे तो म्हौरा जनम जनम रा सगी, थारे लारे लारे१ सग मे डोले हो।
आदि तन मन धन मेरे, आनन्द करा कलोले२।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, आन मिल्यो अनमोले ॥२२२॥†
पदाभिव्यक्ति अर्थहीन है।
१ पीछे-पीछे, २ कल्लोल।
मिलन और बधाई १३६
मिश्रित भाषा में प्राप्त पद ।
१
तनक हरि चितवौ जी मेरी ओर ।
हम चितवत तुम चितवत नही, दिल के बडे कठोर ।
मेरो आसा चितवनि तुमरी, और न दूओ दोर ।
तुम से हमकू कबर मिलोगे, हम्सी लाख करोर ।
उमी ठाढी अरज करत हू, अरज करत भयो मोर ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, देस्यूँ प्राण अकोर ॥२२३॥†
आराध्य के निकट रहते हुए भी न बोलने की अभिव्यक्ति एक
और पद मे भी मिलती हैं, यद्यपि इस पद की प्रामाणिकता विशेष
संदिग्ध हैं ।
'बृहद्राग रत्नाकार' में निम्नांकित पद प्राप्त हैं जिसकी प्रथम
दो पंक्तियाँ उपर्युक्त पद की प्रथम दो पंक्तियो से हूबहू मिलती है।
बहुत सम्भव है कि कृष्णप्रिया का ही यह पद मीराँ के नाम पर
प्रचलित हो गया है ।
तनक हंस हेरो मेरी ओर।
हम चितवत तुम चितवत नाही, काहे भई हो कठोर ।
निस दिन तुमरो ही नाम रटत हो, चातक ज्यो घनघोर ।
कृष्णाप्रिया दर्शन के लोभी, जैसे चन्द्र चकोर ।
(पद २५७, पृष्ठ ७१,)
२
आज सखी मेर आनन्द भयो है, घर मे मोहन लाघोरी ।
बन जोईं वृन्दावन जोईं, जोईं बिरज सब बाघोरी ।
सतवे मलिये अजब झरोखे, कही ते हरि जी लाघोरी ।
म्हारा तो घर में मही घनेरी, हरी चोर चोर दधि खाधोरी ।
१४० मीराँ-बृहद्-पद संग्रह
अपने द्वार मै कब की ठाढी, बाह पकरि हरि साधोरी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, मिलियो बिरह बाजन बाघोरी ।
॥२२४॥†
असंगत अभिव्यक्ति के आधार पर पद की प्रामाणिकता विशेष
संदिग्ध है।
उपर्युक्त दोनो पदो की भाषा प्रधानत. ब्रजभाषा है यद्यपि कुछ
ठेठ राजस्थानी शब्दों का प्रयोग भी है।
३
आण मिल्यो अनुरागी (गिरधर) आण मिल्यो अनुरागी।
सांसो१ सोच अंग नहि, अब तो तिस्ना२ दुबध्या३ त्यागा।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, स्याम बरण४ बड भागी।
जनम जनम के साहिब मेरो, वाही से लौ लागी।
अपण पिया सग हिलमिल खेलूँ, अधर सुधारस पागी।
मीराँ के गिरधर नागर, अब के भई सुभागी ॥२२५॥†
पदाभिव्यक्ति से सतमत और वैष्णव मत दोनो का ही प्रभाव
इंगित होता है।
१ सशय, २ तृष्णा, ३ दुविधा, ४ वर्ण।
मिलन और बधाई १४१
ब्रज भाषा में प्राप्त पद
१
बदला रे तू जल भरि ले आयो।
छोटी छोटी बूदन बरसन लागी, कोयल सबद सुनायो।
गाजै बाजै पवन मधुरिया, अबर बदरा छायो।
सज सवारी पिय घर आये, हिल्मिल मगल गायो।
मीरॉ के प्रभु हरि अविनासी, भाग भलो जिन पायो। ॥२२६॥
२
नन्द नन्दन बिलमाई, बदरा ने घेरी माई।
इत घन लरजे, उत घन गरजे चमकत बिज्जु सवाई।
उमड़ घुमड चहुँ दिसी से आया, पवन चलै पुरवाई।
दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल सबद सुनाई।
मीरॉ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल चितलाई। ॥२२७॥
पाठान्तर १,
चित नन्दन बिलमाई, बदराने घेरी भाई।
इत घन लरजै, उत घन गरजै, चमकत बिज्जु सवाई।
उमड़ घुमड चहुँ दिस से आया, पवन चलै पुरवाई।
विरहनि तेरी प्राण डरत है, दाधी बेल सिचाई।
मीराँ के प्रभु दर्शन दीजै, प्राण रखौ सरणाई।
तृतीय पंक्ति के उत्तरार्द्ध का निम्नांकित पाठान्तर भी प्राप्त है।
'माण रहत मोकू।'
एक ही पद के दो पाठान्तर दो विभिन्न भावो के द्योतक हैं, यह विचारणीय ह। पाठान्तर की तृतीय पंक्ति का अर्थ स्पष्ट नही होता।
१४२ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
३
मेहा बरसवो करे रे, आज तो रमियो मेरे घर रे ।
नान्ही नान्ही बूंद मेघ घन् बरसे, सूखे सखर भरे रे ।
बहुत दिना पै पीतम पायो, बिछुरन को मोहि डर रे ।
मीराँ कहै अति नेह जुडायो, मै लियो पुरबालो बर रे ।॥२२८॥
पद की द्वितीय पक्ति में 'मेघ' और 'घन' दोनो पर्यायवाची शब्दो
के प्रयोग से पुनरुक्ति हुई है।
४
देखी बरषा की सरसाई, मेरे पिया जी के मन आई ।
नान्ही नान्ही बूंदैन बरसन लाग्यो, दामिनी दमके झरलाई ।
स्याम घटा उमडी चहुँ दिसी सो, बोलत मोर सुहाई ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर आणन्द मगल गाई । ॥२२९॥
५
रग भरी रग भरी, रग सूं भरी री,
होली आई प्यारी रग सूं भरी री ।
उडत गुलाल लाल भये बाहर,
पिचकारिन की लगी झरी री ।
चोवा चन्दन और अरगजा,
केसर गागर भरी धरी री ।
मीराँ कहै प्रभु गिरधर नागर,
चेरी होय पायन मे परी री ॥२३०॥
६
बसो मोरे नैनन मे नन्दलाल ।
मोहनि मूरत सावरि सूरत, नैणा बने विसाल ।
अधर सुधारस मुरलि राजति, उर बैजन्ती माल ।
मिलन और बधाई १४३
छुद्र घटिका कटि तट सोभित, नूपुर शब्द रसाल ।
मीराँ प्रभु संतन सुखदाई, भक्त वच्छल गोपाल ॥२३१॥
पदाभिव्यक्ति से बालकृष्ण का वर्णन ही स्पष्ट होता है, जो मुग्धा
नारी के लिय सगत नही प्रतीत होता। देखे 'मीरा', एक अध्ययन।'
'बृहदाग रत्नाकर' मे निम्नाकित पद प्राप्त है। दोनो पदो मे
इस गहरे साम्य के कारण कहा जा सकता है कि 'दास गोपाल' का ही
पद मीराँ के नाम पर प्रचलित हो गया है :-
बसो मोरे नैनन मे नन्दलाल ।
सावरी सूरत माधुरी मूरत, राजिव नयन विसाल ।
मोर मुकुट मकराकृत कुडल, अरुण तिलक दिये भाल ।
अधरन बंसी कर मे लकुटी, कौस्तुभ मणि वनमाल ।
बाजूबन्द आभूषण मुदर, नुपूर शब्द रसाल ।
दास गोपाल मदन मोहन, पिय भक्तन के प्रतिपाल ।
(पद ४८५, पृष्ठ १२३,)
'दास गोपाल' के पद की भाषा साहित्यिक है जबकि मीराँ के
नाम पर प्रचलित पद की भाषा सरल है। सम्भव है कि गेय परम्परा
ही इसका कारण हो।
उपर्युक्त दोनो पद से कुछ साम्य रखता हुआ एक और भी निम्ना-
कित पद 'बृहद्राग रत्नाकर' मे मिलता है।
“बसो मेरे नयनन मे दोऊ चद।
गौर बरण बृषभानु नदिनी, श्याम वरण नन्दनन्द।
गोकुल रहे लुभाय रूप मे, निरखत आनन्द कद।
जयश्री भट्ट युगल रूप बडो, क्यो छूटै दृढ फंद।
(पद ४८६, पृष्ठ १२४)
इस पद की प्रथम पक्ति और उपर्युक्त अन्य दोनो पदो की प्रथम
पक्ति मे ही गहरा साम्य है। यद्यपि शेष पद सर्वथा भिन्न है।
१४४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
७
जोसीड़ा ने लाख बधाई, अब घर आये स्याम।
आजि आनन्द उमंगि भयो है, जीव लहै सुखधाम।
पांच सखि मिली, पीव परसि के, आनन्द ठासू ठाम।
बिसर गई दु ख निरखि पिया कूँ, सुफल मनोरथ काम।
मीराँ के सुख सागर स्वामी, भवन गवन कियो राम ॥२३२॥†
पाठान्तर १,
जोसीड़ा ने लाख बधाई, आज घर आये स्याम।
आजि आनन्द उमगि भयो अति, जीव लहै सुखधाम।
पच सखी मिलि परसि पिया कूँ, आनन्द आठूँ जाम।
विसर गई दुख निरखि पिया कूं सुफल मनोरथ काम।
मीराँ के प्रभु सुख के सागर, भवन गवन कियो, राम।
यह पद ‘राम सनेही’ गुटके से उद्धृत है। बहुत सम्भव है कि ‘राम
सनेही’ सम्प्रदाय का ही पद मीराँ के नाम पर चल पड़ा हो। ‘राम
सनेही’ प्रयोगयुक्त एक पद (सं० ४) राजस्थानी मे भी मिलता है।
८
पायो जी मै तो राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु, किरपा करि अपनायो।
जनम जनम की पूँजी पाई, जग मे सभी खोवायो।
खरचै नहि कोई चोर न लेवै, दिन दिन बढ़त सवायो।
सत की नाव खेवटिया सतगुरु भवसागर तर आयो।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरख हरख जस पायो ॥२३३॥
सम्पूर्ण पद की भाषा विशुद्ध ब्रज भाषा है। मात्र एक शब्द ‘म्हारे’
ठेठ राजस्थानी शब्द है। पाठान्तर मे इस शब्द का प्रयोग नही
मिलता।
मिलन और बधाई १४५
पाठान्तर १,
राम रतन धन पायो, मैया मै तो राम रतन धन पायो ।
खरचै ना खूटै, वाकू चोर न लुटै, दिन दिन होत सवायो ।
नीर न डूबै वाकूँ अगिन न जालै, धरनी धर्यो न समायो ।
नाँव को नाँव भजन की बतियाँ, भवसागर से तार्यो ।
मीराँ बाई प्रभु गिरधर सरणै, चरण कमल चित लायो ।
उपर्युक्त पद के दोनो पाठो से सतंमत का प्रभाव स्पष्ट हो
जाता है।
९
माई मै तो लियो रमैयो मोल ।
कोई कहै छानी¹, कोई कहै चोरी, लियो है बजता ढोल ।
कोई कहै कारो, कोई कहै गोरो, लियो है अखी खोल ।
कोई कहै हल्का, कोई कहै मँहगा, लियो है तराजू तोल ।
तनका गहना मै सब कुछ दीन्हा, दियो है बाजूबन्द खोल ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, पूरब जनम का कोल ॥२३४॥
उपर्युक्त पाठ की भाषा राजस्थानी की ओर झुकी हुई है। पद
की द्वितीय पंक्ति मे प्रयुक्त ‘चोरी’ शब्द के बदले ‘चोडे’ का भी प्रयोग
मिलता है जो अर्थ सगति के विचार से अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।
‘चोडे’ का अर्थ हे सब की जानकारी मे । शेष पद से चतुर्थ पंक्ति भिन्न
पडती है, इतना ही नही यह पंक्ति ज्यो की त्यों अन्य पदो मे भी मिल जाती
है। इसी तरह, अन्तिम पक्ति का द्वितीयाश भी ज्यो का त्यो अन्य
पदो मे प्राप्त है।
१ छिपा कर ।
०
पाठान्तर १,
माई म्हे गोविन्द लीनी मोल।
कोई कहै सस्तो, कोई कहै महँगो, लीनी तराजू तोल।
कोई कहै घर मे, कोई कहै वन मे, राधा के सग किलोल।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आवत प्रेम के मोल।
पाठान्तर २,
माई मै तो लीयो री गोविन्दो मोल।
कोई कहै सोहग्गो कोई कहै मेहगो लियोरी तराजू तोल।
कोई कहै छानै, कोई कहै छुरकै लीयोरी बाजता ढोल।
याकूँ तो सब लोग जाणत है, लियो अमोला मोल।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, पूरब जनम के कोल।
पाठान्तर ३,
मै तो गोविन्द लीन्हा मोल।
कोई कहै महंगा, कोई कहै सस्ता, लियो तराजू तोल।
ब्रज के लोग करै सब चर्चा, लिया बजा के ढोल।
सुर नर मुनि जाको पार न पावै, ढक लिया प्रेम पटोल।
जहर पियाला राणाजी भेज्यो, पिया मै अमृत मोल।
मीराँ प्रभु के हाथ बिकानी, सर्वस दीना घोल।
'ब्रजं कै बसिया करै सब चर्चा' और 'जहर पियाला . अमृत
मोल' जैसी अभिव्यक्तियाँ इस पाठ की विशेषताएँ हैं।
मिलन और बधाई १४७
पाठान्तर ४,
माई मै तो लियो है सावरियो मोल ।
कोई कहै सूँघो, कोई कहै मूँहगो (मै तो) लियो ह हीरा सूँ तोल ।
कोई कहै हलका, कोई कहै भारी, (मै तो) लियोरी जाखडिया१तोल
कोई कहै घटतो, कोई बढतो (मै तो) लियो है बराबर तोल ।
कोई कहै कालो, कोई कहै गोरो, (मै तो) देख्यो हे घूँघट पट खोल ।
मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, म्हारे पूरब जनमरो कोल ।
पाठान्तर ५,
माई मै तो लियो छै सांवरियो मोल ।
कोई कहै हलको, कोई कहै भारी, (मै तो) लियो छै तराजू तोल ।
कोई कहै सोगो, कोई कहै मैंगो२, (मै तो) लियो छै अमोलख मोल ।
कोइ कहै छानै, कोई कहै चोडे (मै तो) लियो छै बजता ढोल ।
कोई कहै कालो, कोई कहै गोरो (मै तो) लियो छै अखिया खोल ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, (म्हारे) पूरब जनम को कोल ।
स्पष्ट है कि उपर्युक्त सभी पाठ एक ही पद के गेय रूपान्तर मात्र
हे। यद्यपि प्रत्येक पाठ की भाषा किसी एक बोली विशेष के प्रभाव
की द्योतक है तथापि भाव सर्वथा एक ही है।
तत्कालीन समाज के साथ मीराँ के कठोर सघर्ष की भावना
सभी पाठो से व्यक्त होती है। साथ ही सभी पाठो से निन्दा-स्तुति
के प्रति उदासीन मीराँ का आत्मविश्वास और दृढ भक्ति-भाव
“मै तो लियो तराजू तोल” जैसी अभिव्यक्ति से अति स्पष्ट हो उठता है।
शुद्ध ब्रजभाषा के साथ ही साथ राजस्थानी से कुछ प्रभावित
ब्रजभाषा मे भी प्राप्त यह पद और इसके विभिन्न पाठ विशेष
विचारणीय है ।
१ तराजू, २ महँगा।
१४८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
गुजराती में प्राप्त पद
१
मने मलिया मित्र गोपाल, नही जाऊ सासराए ।
ससार मारूँ हो सासुरो ने बैकुंठ मारो वास रे ।
लक्ष चौरासी मारो हो चुड़ोलो रे, हारे मै तो वरिया गोपाल लाल नाथ ।
सासु हमारी शुशुमना रे, सुसरी प्रेम सतोष रे ।
जेठ जुगे जुग जीव जो रे, हा रे पेलो नावलियो निरदोस ।
आपूँ तो नवरग चूंदडी रे, नही ओढूँ कामल लगार रे ।
ओढूँ प्रेम रस चूंदडी रे, हाँ रे मारा पाप निवारण करनार ।
दियरे¹ ने दीनूँ है दीकडी² रे, दोनूँ राजकुमार रे ।
एक ने सतयुग मोहि रहियो, राणा, दूजी रही ब्रह्मचार ।
एक एक नो गुरु गोविन्द जी हो रे, दूजी की है ससार रे ।
राज छाड़ौ चित्रकूट नेरे हाला, बाला गावला सोल हजार ।
अपना पिया को जाई ने कह जो, घना दहाडो³ धना वास रे ।
बेऊँ⁴ कर जोडी हो निनवरे, हा रे गुण गावे मीराबाई दास ॥२३५॥†
पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय ह। यद्यपि अभिव्यक्ति अस्पष्ट
और कही कही असगत भी है, तथापि सतमत का प्रभाव विशेष रूपम
इंगित हो जाता है।
अन्तिम पक्ति मे 'मीराबाई दास' जैसा प्रयोग इस पद की विशे-
षता है। इस प्रयोग के आधार पर पद की प्रामाणिकता और भी
सदिग्ध हो उठती है।
२
अरज करे छे मीरा राकडी, ऊंभी ऊभी अरज करे छे ।
मणिधर स्वामी म्हारे मादेर पधारी, सेवा करु दिन रातडी ।
१ देवर, २ दीकडी अशुद्ध है, शुद्ध शब्द हैडीकरी, जिसका अर्थ हैं पुत्री, ३ दिन,
४ दोनो।
मिलन और बधाई १४९
फुलना रे तोडा,$^१$ फुलना रे गजरा,$^२$ फुलना रे हार फल पाखडी।
फुलना रे गादी फुलना रे तकिया, फुलना री पाथरी पछेडी।
पय पकवान मिठाई ने मेवा, सेवेया ने सुन्दर दहीडी।
लवग सुपारी ने एलची, तजवाला कथा पुरारी पान बीडी।
सेज बिछाऊ ने पासा मगाऊ, रमवा आवो तो जाय रातड़ी ॥२३६॥†
मीराँ के नाम पर प्रचलित इस पद के किसी भी अंश से इसका
मीराँ विरचित होना आभासित नही होता। ऐसो पदो को प्रामाणिक
सग्रह मे स्थान न देना ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है। किसी किसी
सग्रह मे निम्नाकित एक पक्ति और भी मिलती है जिसके आधार पर
पद को मीराँ का कहा जा सकता है।
'मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, वाँला राम ने जोता ठरे आखडी।
इस पक्ति से व्यक्त होती भावना का शेष पदाभिव्यक्ति से कोई
सगति नही बैठती। फिर गुजराती मे प्राप्त मीराँ के पदो की अन्तिम
पक्ति मे 'मीराँ के प्रभु गिरधर नागर' के बदले "मीराँ के प्रभु गिरधर
ना गुण' का ही प्रयोग मिलता है। ऐसी स्थिति मे उपर्युक्त पक्ति के
आधार पर भी पद की प्रामाणिकता सिद्ध नही होती।
३
अबोला सीद लोछी मारा राज, प्राण जीवन प्रभु मारा म्हांरा राज।
अमे तो तमारा तमे तो अमारा, टाली दोस दो छोरे।
अमे तो तमारी सेवा करीये, सुख लई ने दुख दो छोरे।
जेने पोतानी मासी भारी, तेनी सो विश्वास रे।
अमृत पाई ने उच्छेरिया वाँला, बिखडा घोलि घोलि शीद पावो छोरे।
१ हाथो मे पहनने का जेवर विशेष, २ हार।
१५० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
ऊडा कुवी मे उतरिया वाला, बरत बाढी शूं जाओ छो रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल चित लाओ छो रे ॥२३७॥
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सगति का अभाव है। 'मीराँ के प्रभु
गिरधर नागर' का प्रयोग भी अन्य गुजराती पदो की परम्परा के अनु-
कूल नही पडता।
आराध्य की अप्रसन्नता के प्रति उलाहने की अभिव्यक्ति अन्य
पदो मे भी मिलती है।