मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
हरि सागर सू नेहरो१, नैणा बांध्यो सनेह हो।
मीराँ सखी के आंगणै, दूधां बूंठा२ मेह हो ॥२१६॥
पद पर सतमत का प्रभाव स्पष्ट है। "मीराँ सखी' का प्रयोग
सर्वथा नूतन है। अत्युक्ति न होगी यदि कहा जाय कि यही एक पद
ऐसा है जिसमे इस तरह का प्रयोग मिलता है। पद की चतुर्थ
पंक्ति की अभिव्यक्ति शेष पदाभिव्यक्ति के विरुद्ध पडती है क्योकि
उपर्युक्त पक्ति से वियोग ही लक्षित होता है। छठी पक्ति मे “प्रिय
की लीनी 'बधावणा' प्रयोग है। राजस्थानी की परम्परा पर दृष्टि
रखते “प्रिय का रली बधावणां" पाठ ही शुद्ध ठहरता है।
३
रामजी पधारे धनि आज री घरी।
आज री घरी वो भाव री भरा।
गुरु रामानद अर माधवाचारन, नीमानन्द बिसर स्याम हरी।
आजि मेरो आगण सुहावणूं, रसण लागे पी पेम हरी
अरसि परसि मिलि हरिगुण गास्या,धनि मेरी इर्षा इन भाव भरी
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, पकडि पावौ विधाता पेम हरी
॥२१७॥
अभिव्यक्ति के आधार पर पद की प्रामाणिकता संदिग्ध है।
पाँचवी और अन्तिम पक्तियो के उत्तरार्द्ध अर्थहीन प्रतीत होते हैं।
'गुरु रामानन्द माधवा चारेन और नीमानन्द के आगण मे आने की अभि-
व्यक्ति प्राप्त सामग्री के आधार पर सगत सिद्ध नही होती ।
४
राम सनेही सावरियो, म्हांरी नगरी में उतर्यो आई।
प्राण जाय पणि३ प्रीत न छाडूूं, रहौ चरण लपटाय।
१ प्रेम, २ बूंठाँ-मेह—दूध की वर्षा से भर गया, उत्साह और आनन्द से
परिपूर्ण हो गया, ३ तथापि ।