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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

१५०-

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पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका कौरवोंके प्रति साम, दान और भेदनीतिके प्रयोगकी असफलता बताकर दण्डके प्रयोगपर जोर देना

वासुदेव उवाच

एवमुक्ते तु भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च ।
गान्धार्या धृतराष्ट्रेण न वै मन्दोऽन्वबुद्ध्यत ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! भीष्म, द्रोण, विदुर, गान्धारी तथा धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर भी मन्दबुद्धि दुर्योधनको तनिक भी चेत नहीं हुआ ॥ १ ॥

अवधूयोत्थितो मन्दः क्रोधसंरक्तलोचनः ।
अन्वद्रवन्त तं पश्चाद् राजानस्त्यक्तजीविताः ॥ २ ॥
वह मूर्ख क्रोधसे लाल आँखें किये उन सबकी अवहेलना करके सभासे उठकर चला गया। उसीके पीछे अन्य राजा भी अपने जीवनका मोह छोड़कर सभासे उठकर चल दिये ॥ २ ॥

आज्ञापयच्च राज्ञस्तान् पार्थिवान् नष्टचेतसः ।
प्रयाध्वं वै कुरुक्षेत्रं पुष्योऽद्येति पुनः पुनः ॥ ३ ॥
ज्ञात हुआ है, दुर्योधनने उन विवेकशून्य राजाओं-को यह बार-बार आज्ञा दे दी कि तुम सब लोग कुरुक्षेत्रको चलो। आज पुष्य नक्षत्र है ॥ ३ ॥

ततस्ते पृथिवीपालाः प्रययुः सहसैनिकाः ।
भीष्मं सेनापतिं कृत्वा संहृष्टाः कालचोदिताः ॥ ४ ॥
तदनन्तर वे सभी भूपाल कालसे प्रेरित हो भीष्मको सेनापति बनाकर बड़े हर्षके साथ सैनिकों-सहित वहाँसे चल दिये हैं ॥ ४ ॥

अक्षौहिण्यो दशैका च कौरवाणां समागताः ।
तासां प्रमुखतो भीष्मस्तालकेतुर्व्यरोचत ॥ ५ ॥
कौरवोंकी ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ आ गयी हैं। उन सबमें प्रधान हैं भीष्मजी, जो अपने तालध्वजके साथ सुशोभित हो रहे हैं ॥ ५ ॥

यदत्र युक्तं प्राप्तं च तद् विधत्स्व विशाम्पते ।
उक्तं भीष्मेण यद् वाक्यं द्रोणेन विदुरेण च ॥ ६ ॥
गान्धार्या धृतराष्ट्रेण समक्षं मम भारत ।
एतत् ते कथितं राजन् यद् वृत्तं कुरुसंसदि ॥ ७ ॥

प्रजानाथ! अब तुम्हें भी जो उचित जान पड़े, वह करो। भारत! कौरवसभामें भीष्म, द्रोण, विदुर, गान्धारी तथा धृतराष्ट्रने मेरे सामने जो बातें कही थीं, वे सब आपको सुना दीं। राजन्! यही वहाँका वृत्तान्त है॥ ६-७॥

साम्यमादौ प्रयुक्तं मे राजन् सौभ्रात्रमिच्छता।
अभेदायास्य वंशस्य प्रजानां च विवृद्धये॥ ८॥
राजन्! मैंने सब भाइयोंमें उत्तम बन्धुजनोचित प्रेम बने रहनेकी इच्छासे पहले सामनीतिका प्रयोग किया था, जिससे इस वंशमें फूट न हो और प्रजाजनोंकी निरन्तर उन्नति होती रहे॥ ८॥

पुनर्भेदश्च मे युक्तो यदा साम न गृह्यते।
कर्मानुकीर्तनं चैव देवमानुषसंहितम्॥ ९॥
जब वे सामनीति न ग्रहण कर सके, तब मैंने भेदनीतिका प्रयोग किया (उनमें फूट डालनेकी चेष्टा की)। पाण्डवोंके देव-मनुष्योचित कर्मोंका बारंबार वर्णन किया॥ ९॥

यदा नाद्रियते वाक्यं सामपूर्वं सुयोधनः।
तदा मया समानीय भेदिताः सर्वपार्थिवाः॥ १०॥
जब मैंने देखा दुर्योधन मेरे सान्त्वनापूर्ण वचनोंका पालन नहीं कर रहा है, तब मैंने सब राजाओंको बुलाकर उनमें फूट डालनेका प्रयत्न किया॥ १०॥

अद्भुतानि च घोराणि दारुणानि च भारत।
अमानुषाणि कर्माणि दर्शितानि मया विभो॥ ११॥
भारत! वहाँ मैंने बहुत-से अद्भुत, भयंकर, निष्ठुर एवं अमानुषिक कर्मोंका प्रदर्शन किया॥ ११॥

निर्भर्त्स्यित्वा राज्ञस्तांस्तृणीकृत्य सुयोधनम्।
राधेयं भीषयित्वा च सौबलं च पुनः पुनः॥ १२॥
द्यूततो धार्तराष्ट्राणां निन्दां कृत्वा तथा पुनः।
भेदयित्वा नृपान् सर्वान् वाग्भिर्मन्त्रेण चासकृत्॥ १३॥
पुनः सामाभिसंयुक्तं सम्प्रदानमथाब्रुवम्।
अभेदात् कुरुवंशस्य कार्ययोगात् तथैव च॥ १४॥
समस्त राजाओंको डाँट बताकर दुर्योधनको तिनकेके समान समझकर तथा राधानन्दन कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिको बार-बार डराकर जूएसे धृतराष्ट्रपुत्रोंकी निन्दा करके वाणी तथा गुप्त मन्त्रणाद्वारा सब राजाओंके मनमें अनेक बार भेद उत्पन्न करनेके पश्चात् फिर सामसहित दानकी बात उठायी, जिससे कुरुवंशकी एकता बनी रहे और अभीष्ट कार्यकी सिद्धि हो जाय॥ १२—१४॥

ते शूरा धृतराष्ट्रस्य भीष्मस्य विदुरस्य च।
तिष्ठेयुः पाण्डवाः सर्वे हित्वा मानमधश्वराः॥ १५॥

प्रयच्छन्तु च ते राज्यमनीशास्ते भवन्तु च।
यथाऽऽह राजा गाङ्गेयो विदुरश्च हितं तव ॥ १६ ॥
सर्वं भवतु ते राज्यं पञ्च ग्रामान् विसर्जय।
अवश्यं भरणीया हि पितुस्ते राजसत्तम ॥ १७ ॥
मैंने कहा—नृपश्रेष्ठ! यद्यपि पाण्डव शौर्यसे सम्पन्न हैं, तथापि वे सब-के-सब अभिमान छोड़कर भीष्म, धृतराष्ट्र और विदुरके नीचे रह सकते हैं। वे अपना राज्य भी तुम्हींको दे दें और सदा तुम्हारे अधीन होकर रहें। राजा धृतराष्ट्र, भीष्म और विदुरजीने तुम्हारे हितके लिये जैसी बात कही है, वैसा ही करो। सारा राज्य तुम्हारे ही पास रहे। तुम पाण्डवोंको पाँच ही गाँव दे दो; क्योंकि तुम्हारे पिताके लिये पाण्डवोंका भरण-पोषण करना भी परम आवश्यक है ॥ १५—१७ ॥

एवमुक्तोऽपि दुष्टात्मा नैव भागं व्यमुञ्चत।
दण्डं चतुर्थं पश्यामि तेषु पापेषु नान्यथा ॥ १८ ॥
मेरे इस प्रकार कहनेपर भी उस दुष्टात्माने राज्यका कोई भाग तुम्हारे लिये नहीं छोड़ा अर्थात् देना नहीं स्वीकार किया। अब तो मैं उन पापियोंपर चौथे उपाय दण्डके प्रयोगकी ही आवश्यकता देखता हूँ, अन्यथा उन्हें मार्गपर लाना असम्भव है ॥ १८ ॥

निर्याताश्च विनाशाय कुरुक्षेत्रं नराधिपाः।
एतत् ते कथितं राजन् यद् वृत्तं कुरुसंसदि ॥ १९ ॥
सब राजा अपने विनाशके लिये कुरुक्षेत्रको प्रस्थान कर चुके हैं। राजन्! कौरव-सभामें जो कुछ हुआ था, वह सारा वृत्तान्त मैंने तुमसे कह सुनाया ॥ १९ ॥

न ते राज्यं प्रयच्छन्ति विना युद्धेन पाण्डव।
विनाशहेतवः सर्वे प्रत्युपस्थितमृत्यवः ॥ २० ॥
पाण्डुनन्दन! वे कौरव बिना युद्ध किये तुम्हें राज्य नहीं देंगे। उन सबके विनाशका कारण जुट गया है और उनका मृत्युकाल भी आ पहुँचा है ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये
पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५० ॥