महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1913)
अष्टषष्टितमोऽध्यायः
ब्रह्मभूतस्तोत्र तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महत्ता
भीष्म उवाच
शृणु चेदं महाराज ब्रह्मभूतं स्तवं मम ।
ब्रह्मर्षिभिश्च देवैश्च यः पुरा कथितो भुवि ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—महाराज दुर्योधन! पूर्वकालमें इस भूतलपर ब्रह्मर्षियों तथा देवताओंने इनका जो ब्रह्मभूतस्तोत्र कहा है, उसे तुम मुझसे सुनो— ॥ १ ॥
साध्यानामपि देवानां देवदेवेश्वरः प्रभुः ।
लोकभावनभावज्ञ इति त्वां नारदोऽब्रवीत् ॥ २ ॥
‘प्रभो! आप साध्यगण और देवताओंके भी स्वामी एवं देवदेवेश्वर हैं। आप सम्पूर्ण जगत्के हृदयके भावोंको जाननेवाले हैं। आपके विषयमें नारदजीने ऐसा ही कहा है ॥ २ ॥
भूतं भव्यं भविष्यं च मार्कण्डेयोऽभ्युवाच ह ।
यज्ञं त्वां चैव यज्ञानां तपश्च तपसामपि ॥ ३ ॥
‘मार्कण्डेयजीने आपको भूत, भविष्य और वर्तमान स्वरूप बताया है। वे आपको यज्ञोंका यज्ञ और तपस्याओंका भी सारभूत तप बताया करते हैं ॥ ३ ॥
देवानामपि देवं च त्वामाह भगवान् भृगुः ।
पुराणं चैव परमं विष्णो रूपं तवेति च ॥ ४ ॥
‘भगवान् भृगुने आपको देवताओंका भी देवता कहा है। विष्णो! आपका रूप अत्यन्त पुरातन और उत्कृष्ट है ।।
वासुदेवो वसूनां त्वं शक्रं स्थापयिता तथा ।
देव देवोऽसि देवानामिति द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ ५ ॥
‘प्रभो! आप वसुओंके वासुदेव तथा इन्द्रको स्वर्गके राज्यपर स्थापित करनेवाले हैं। देव! आप देवताओंके भी देवता हैं। महर्षि द्वैपायन आपके विषयमें ऐसा ही कहते हैं ॥ ५ ॥
पूर्वे प्रजानिसर्गे च दक्षमाहुः प्रजापतिम् ।
स्रष्टारं सर्वलोकानामङ्गिस्त्वां तथाब्रवीत् ॥ ६ ॥
‘प्रथम प्रजासृष्टिके समय आपको ही दक्ष प्रजापति कहा गया है। आप ही सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा हैं—इस प्रकार अंगिरा मुनि आपके विषयमें कहते हैं ॥ ६ ॥
अव्यक्तं ते शरीरोत्थं व्यक्तं ते मनसि स्थितम् ।
देवास्त्वत्सम्भवाश्चैव देवलस्त्वसितोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥
‘अव्यक्त (प्रधान) आपके शरीरसे उत्पन्न हुआ है, व्यक्त महत्तत्त्व आदि कार्यवर्ग आपके मनमें स्थित है तथा सम्पूर्ण देवता भी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं; ऐसा असित और देवलका कथन है॥ ७॥
शिरसा ते दिवं व्याप्तं बाहुभ्यां पृथिवी तथा।
जठरं ते त्रयो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः॥ ८॥
एवं त्वामभिजानन्ति तपसा भाविता नराः।
आत्मदर्शनतृप्तानामृषीणां चासि सत्तमः॥ ९॥
‘आपके मस्तकसे द्युलोक और भुजाओंसे भूलोक व्याप्त है। तीनों लोक आपके उदरमें स्थित हैं। आप ही सनातन पुरुष हैं। तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरण-वाले महात्मा पुरुष आपको ऐसा ही जानते हैं। आत्मसाक्षात्कारसे तृप्त हुए ज्ञानी महर्षियोंकी दृष्टिमें भी आप सबसे श्रेष्ठ हैं॥ ८-९॥
राजर्षीणामुदाराणामाहवेष्वनिवर्तिनाम्।
सर्वधर्मप्रधानानां त्वं गतिर्मधुसूदन॥ १०॥
‘मधुसूदन! जो सम्पूर्ण धर्मोंमें प्रधान और संग्रामसे कभी पीछे हटनेवाले नहीं हैं, उन उदार राजर्षियोंके परम आश्रय भी आप ही हैं॥ १०॥
इति नित्यं योगविद्भिर्भगवान् पुरुषोत्तमः।
सनत्कुमारप्रमुखैः स्तूयतेऽभ्यर्च्यते हरिः॥ ११॥
‘इस प्रकार सनत्कुमार आदि योगवेत्ता पापापहारी आप भगवान् पुरुषोत्तमकी सदा ही स्तुति और पूजा करते हैं’॥ ११॥
एष ते विस्तरस्तात संक्षेपश्च प्रकीर्तितः।
केशवस्य यथातत्त्वं सुप्रीतो भज केशवम्॥ १२॥
तात! दुर्योधन! इस तरह विस्तार और संक्षेपसे मैंने तुम्हें भगवान् केशवकी यथार्थ महिमा बतायी है। अब तुम अत्यन्त प्रसन्न होकर उनका भजन करो॥ १२॥
संजय उवाच
पुण्यं श्रुत्वैतदाख्यानं महाराज सुतस्तव।
केशवं बहु मेने स पाण्डवांश्च महारथान्॥ १३॥
संजय कहते हैं— महाराज! भीष्मजीके मुखसे यह पवित्र आख्यान सुनकर तुम्हारे पुत्रने भगवान् श्रीकृष्ण तथा महारथी पाण्डवोंको बहुत महत्त्वशाली समझा॥ १३॥
तमब्रवीन्महाराज भीष्मः शान्तनवः पुनः।
माहात्म्यं ते श्रुतं राजन् केशवस्य महात्मनः॥ १४॥
नरस्य च यथातत्त्वं यन्मां त्वं पृच्छसे नृप।
राजन्! उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मजीने पुनः दुर्योधनसे कहा—'नरेश्वर! तुमने महात्मा केशव तथा नरस्वरूप अर्जुनका यथार्थ माहात्म्य, जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे थे, मुझसे अच्छी तरह सुन लिया।। १४ १/२ ।।
यदर्थं नृषु सम्भूतौ नरनारायणावृषी ।। १५ ।।
अवध्यौ च यथा वीरौ संयुगेष्वपराजितौ ।
यथा च पाण्डवा राजन्नवध्या युधि कस्यचित् ।। १६ ।।
'ऋषि नर और नारायण जिस उद्देश्यसे मनुष्योंमें अवतीर्ण हुए हैं, वे दोनों अपराजित वीर जिस प्रकार युद्धमें अवध्य हैं तथा समस्त पाण्डव भी जिस प्रकार समरभूमिमें किसीके लिये भी वध्य नहीं हैं, वह सब विषय तुमने अच्छी तरह सुन लिया।। १५-१६ ।।
प्रीतिमान् हि दृढं कृष्णः पाण्डवेषु यशस्विषु ।
तस्माद् ब्रवीमि राजेन्द्र शमो भवतु पाण्डवैः ।। १७ ।।
'राजेन्द्र! भगवान् श्रीकृष्ण यशस्वी पाण्डवोंपर बहुत प्रसन्न हैं। इसीलिये मैं कहता हूँ कि पाण्डवोंके साथ तुम्हारी संधि हो जाय ।। १७ ।।
पृथिवीं भुङ्क्ष्व सहितो भ्रातृभिर्बलिभिर्वशी ।
नरनारायणौ देवाववज्ञाय नशिष्यसि ।। १८ ।।
'वे तुम्हारे बलवान् भाई हैं। तुम अपने मनको वशमें रखते हुए उनके साथ मिलकर पृथ्वीका राज्य भोगो। भगवान् नर-नारायण (अर्जुन और श्रीकृष्ण)-की अवहेलना करके तुम नष्ट हो जाओगे ।। १८ ।।
एवमुक्त्वा तव पिता तूष्णीमासीद् विशाम्पते ।
व्यसर्जयच्च राजानं शयनं च विवेश ह ।। १९ ।।
प्रजानाथ! ऐसा कहकर आपके ताऊ भीष्मजी चुप हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने राजा दुर्योधनको विदा किया और स्वयं शयन करने चले गये ।। १९ ।।
राजा च शिविरं प्रायात् प्रणिपत्य महात्मने ।
शिश्ये च शयने शुभ्रे रात्रिं तां भरतर्षभ ।। २० ।।
भरतश्रेष्ठ! राजा दुर्योधन भी महात्मा भीष्मको प्रणाम करके अपने शिविरमें चला आया और अपनी शुभ्र शय्यापर सो गया ।। २० ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विश्वोपाख्याने अष्टषष्टितमोऽध्यायः
।। ६८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें विश्वोपाख्यानविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६८ ।।