महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१२६-
षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म और द्रोणका दुर्योधनको पुनः समझाना
वैशम्पायन उवाच
धृतराष्ट्रवचः श्रुत्वा भीष्मद्रोणौ समव्यथौ ।
दुर्योधनमिदं वाक्यमूचतुः शासनातिगम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! धृतराष्ट्रका कथन सुनकर युद्धमें जनसंहारकी सम्भावनासे समान-रूपसे दुःखका अनुभव करनेवाले भीष्म और द्रोणाचार्यने गुरुजनोंकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाले दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
यावत् कृष्णावसन्नद्धौ यावत् तिष्ठति गाण्डिवम् ।
यावद् धौम्यो न मेधाग्नौ जुहोतीह द्विषद्बलम् ॥ २ ॥
यावन्न प्रेक्षते क्रुद्धः सेनां तव युधिष्ठिरः ।
ह्रीनिषेवो महेष्वासस्तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥ ३ ॥
‘वत्स! जबतक श्रीकृष्ण और अर्जुन कवच धारण करके युद्धके लिये उद्यत नहीं होते हैं, जबतक गाण्डीव धनुष घरमें रखा हुआ है, जबतक धौम्य मुनि यज्ञाग्निमें शत्रुओंकी सेनाके विनाशके लिये आहुति नहीं डालते हैं और जबतक लज्जाशील महाधनुर्धर युधिष्ठिर तुम्हारी सेनापर क्रोधपूर्ण दृष्टि नहीं डालते हैं, तभीतक यह भावी जनसंहार शान्त हो जाना चाहिये ॥ २-३ ॥
यावन्न दृश्यते पार्थः स्वेऽप्यनीके व्यवस्थितः ।
भीमसेनो महेष्वासस्तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥ ४ ॥
‘जबतक कुन्तीपुत्र महाधनुर्धर भीमसेन अपनी सेनाके अग्रभागमें खड़े नहीं दिखायी देते हैं, तभीतक यह मार-काटका संकल्प शान्त हो जाना चाहिये ॥ ४ ॥
यावन्न चरते मार्गान् पृतनामभिधर्षयन् ।
भीमसेनो गदापाणिस्तावत् संशाम्य पाण्डवैः ॥ ५ ॥
‘दुर्योधन! जबतक हाथमें गदा लिये भीमसेन तुम्हारी सेनाका संहार करते हुए युद्धके विभिन्न मार्गोंमें विचरण नहीं कर रहे हैं, तभीतक तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो ॥ ५ ॥
यावन्न शातयत्याजौ शिरांसि गजायोधिनाम् ।
गदया वीरघातिन्या फलानीव वनस्पतेः ॥ ६ ॥
कालेन परिपक्वानि तावच्छाम्यतु वैशसम् ।
‘जबतक भीमसेन अपनी वीरघातिनी गदाके द्वारा समयानुसार पके हुए वृक्षके फलोंकी भाँति संग्राम-भूमिमें गजारोही योद्धाओंके मस्तकोंको काट-काटकर नहीं गिरा रहे हैं, तभीतक तुम्हारा युद्धविषयक संकल्प शान्त हो जाना चाहिये ॥ ६ १/२ ॥
नकुलः सहदेवश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ७ ॥
विराटश्च शिखण्डी च शैशुपालिश्च दंशिताः ।
यावन्न प्रविशन्त्येते नक्रा इव महार्णवम् ॥ ८ ॥
कृतास्त्राः क्षिप्रमस्यन्तस्तावच्छाम्यतु वैशसम् ।
‘नकुल, सहदेव, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, विराट, शिखण्डी तथा शिशुपालपुत्र धृष्टकेतु—ये अस्त्रविद्यामें निपुण महान् वीर कवच धारण करके महासागरमें घुसे हुए ग्राहोंकी भाँति तुम्हारी सेनाके भीतर जबतक प्रवेश नहीं करते हैं, तभीतक यह जनसंहारका संकल्प शान्त हो जाना चाहिये ।। ७-८ ½ ।।
यावन्न सुकुमारेषु शरीरेषु महीक्षिताम् ॥ ९ ॥
गार्ध्रपत्राः पतन्त्युग्रास्तावच्छाम्यतु वैशसम् ।
‘जबतक इन भूमिपालोंके सुकुमार शरीरोंपर गीधकी पाँखोंसे युक्त भयंकर बाण नहीं गिर रहे हैं, तभीतक युद्धका संकल्प शान्त हो जाय ।। ९ ½ ।।
चन्दनागुरुदिग्धेषु हारनिष्कधरेषु च ।
नोरःसु यावद् योधानां महेष्वासैर्महेषवः ॥ १० ॥
कृतास्त्रैः क्षिप्रमस्यद्भिर्दूरपातिभिरायसाः ।
अभिलक्ष्यैर्निपात्यन्ते तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥ ११ ॥
‘सामने आते ही लक्ष्यको मार गिरानेवाले, शीघ्रतापूर्वक बाण चलाने और दूरतकका लक्ष्य बींधनेवाले, अस्त्रविद्याके पारंगत महाधनुर्धर विपक्षी वीर जबतक तुम्हारे योद्धाओंके चन्दन और अगुरुसे चर्चित तथा हार और निष्क धारण करनेवाले वक्षःस्थलोंपर विशाल बाणोंकी वर्षा नहीं करते, तभीतक तुम्हें युद्धका विचार त्याग देना चाहिये ।। १०-११ ।।
अभिवादयमानं त्वां शिरसा राजकुञ्जरः ।
पाणिभ्यां प्रतिगृह्णातु धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १२ ॥
‘हम चाहते हैं कि नृपश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर तुम्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम करते देख दोनों हाथोंसे पकड़ (कर हृदयसे लगा) लें ।। १२ ।।
ध्वजाङ्कुशपताकाङ्कं दक्षिणं ते सुदक्षिणः ।
स्कन्धे निक्षिपतां बाहुं शान्तये भरतर्षभ ॥ १३ ॥
‘भरतश्रेष्ठ! उत्तम दक्षिणा देनेवाले युधिष्ठिर ध्वजा, अंकुश और पताकाओंके चिह्नसे सुशोभित अपनी दाहिनी भुजाको जगत्में शान्ति स्थापित करनेके लिये तुम्हारे कंधेपर रखें ।। १३ ।।
रत्नौषधिसमेतेन रक्ताङ्गुलितलेन च ।
उपविष्टस्य पृष्ठं ते पाणिना परिमार्जतु ॥ १४ ॥
‘तथा तुम्हें पास बिठाकर रत्न एवं ओषधियोंसे युक्त लाल हथेलीवाले हाथसे तुम्हारी पीठको धीरे-धीरे सहलायें ।।
शालस्कन्धो महाबाहुस्त्वां स्वजानो वृकोदरः ।
साम्नाभिवदतां चापि शान्तये भरतर्षभ ।। १५ ।।
‘भरतभूषण! शालवृक्षके तनेके समान ऊँचे डील-डौलवाले महाबाहु भीमसेन भी शान्तिके लिये तुम्हें हृदयसे लगाकर तुमसे मीठी-मीठी बातें करें ।। १५ ।।
अर्जुनेन यमाभ्यां च त्रिभिस्तैरभिवादितः ।
मूर्ध्नि तान् समुपाघ्राय प्रेम्णाभिवद पार्थिव ।। १६ ।।
‘राजन्! अर्जुन और नकुल-सहदेव—ये तीनों भाई तुम्हें प्रणाम करें और तुम उनके मस्तक सूँघकर उनके साथ प्रेमपूर्वक वार्तालाप करो ।। १६ ।।
दृष्ट्वा त्वां पाण्डवैर्वीरैर्भ्रातृभिः सह संगतम् ।
यावदानन्दजाश्रूणि प्रमुञ्चन्तु नराधिपाः ।। १७ ।।
‘तुम्हें अपने वीर भाई पाण्डवोंके साथ मिला हुआ देख ये सब नरेश अपने नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहायें ।। १७ ।।
घुष्यतां राजधानीषु सर्वसम्पन्महीक्षिताम् ।
पृथिवी भ्रातृभावेन भुज्यतां विज्वरो भव ।। १८ ।।
‘राजाओंकी सभी राजधानियोंमें यह घोषणा करा दी जाय कि कौरव-पाण्डवोंका सारा झगड़ा समाप्त होकर परस्पर प्रेमपूर्वक उनका समस्त कार्य सम्पन्न हो गया। फिर तुम और युधिष्ठिर परस्पर भ्रातृभाव रखते हुए इस राज्यका समानरूपसे उपभोग करो, तुम्हारी सारी चिन्ताएँ दूर हो जायँ’ ।। १८ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि भीष्मद्रोणवाक्ये
षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें भीष्म और द्रोणके वाक्यसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२६ ।।