महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(श्रीमद्भगवद्गीतायां त्रयोदशोऽध्यायः)
सप्तत्रिंशोऽध्यायः
(श्रीमद्भगवद्गीतायां त्रयोदशोऽध्यायः)
ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ और प्रकृति-पुरुषका वर्णन
सम्बन्ध—गीताके बारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने सगुण और निर्गुणके उपासकोंकी श्रेष्ठताके विषयमें प्रश्न किया था, उसका उत्तर देते हुए भगवान्ने दूसरे श्लोकमें संक्षेपमें सगुण उपासकोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करके तीसरेसे पाँचवें श्लोकतक निर्गुण उपासनाका स्वरूप, उसका फल और देहाभिमानियोंके लिये उसके अनुष्ठानमें कठिनताका निरूपण किया। तदनन्तर छठेसे बीसवें श्लोकतक सगुण उपासनाका महत्त्व, फल, प्रकार और भगवद्भक्तोंके लक्षणोंका वर्णन करते-करते ही अध्यायकी समाप्ति हो गयी; निर्गुणका तत्त्व, महिमा और उसकी प्राप्तिके साधनोंको विस्तारपूर्वक नहीं समझाया गया। अतएव निर्गुण-निराकारका तत्त्व अर्थात् ज्ञानयोगका विषय भलीभाँति समझानेके लिये तेरहवें अध्यायका आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले भगवान् क्षेत्र (शरीर) तथा क्षेत्रज्ञ (आत्मा)-के लक्षण बतलाते हैं—
श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद् यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥
**श्रीभगवान् बोले—**हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र'३. इस नामसे कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको 'क्षेत्रज्ञ'३ इस नामसे उनके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन कहते हैं ॥ १ ॥
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत् तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥
हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा भी भी मुझे ही जान३. और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका अर्थात् विकार-सहित प्रकृतिका और पुरुषका जो तत्त्वसे जानना है, वह ज्ञान है—ऐसा मेरा मत है ॥ २ ॥
सम्बन्ध—क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका पूर्ण ज्ञान हो जानेपर संसारभ्रमका नाश हो जाता है और परमात्माकी प्राप्ति होती है, अतएव 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' के स्वरूप आदिको भलीभाँति विभागपूर्वक समझानेके लिये भगवान् कहते हैं—
तत् क्षेत्रं यच्च४ यादृक्५ च यद्विकारि६ यतश्च यत्७ ।
स८ च यो यत्प्रभावश्च९ तत् समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥
वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारोंवाला है और जिस कारणसे जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है—वह सब संक्षेपमें मुझसे सुन ॥ ३ ॥
सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' के जिस तत्त्वको संक्षेपमें सुननेके लिये भगवान्ने अर्जुनसे कहा है—अब उसके विषयमें ऋषि, वेद और ब्रह्म-सूत्रकी उक्तिका प्रमाण देकर भगवान् ऋषि, वेद और ब्रह्मसूत्रको आदर देते हैं—
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः१ पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव२ हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ऋषियोंद्वारा३ बहुत प्रकारसे कहा गया है और विविध वेदमन्त्रोंद्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी कहा गया है ॥
महाभूतान्यहंकारो४ बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशकं चैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥५
पाँच महाभूत, अहंकार६, बुद्धि७ और मूल प्रकृति३ भी; तथा दस इन्द्रियाँ३, एक मन३ और पाँच इन्द्रियोंके विषय४ अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध— ॥ ५ ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः ।
एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥
तथा इच्छा,५ द्वेष,६ सुख,७ दुःख,८ स्थूल देहका पिण्ड, चेतना९ और धृति१०—इस प्रकार विकारोंके सहित यह क्षेत्र संक्षेपमें कहा गया११। ॥ ६ ॥
सम्बन्ध—इस प्रकार क्षेत्रके स्वरूप और उसके विकारोंका वर्णन करनेके बाद अब जो दूसरे श्लोकमें यह बात कही थी कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतसे ज्ञान है—उस ज्ञानको प्राप्त करनेके साधनोंका 'ज्ञान' के ही नामसे पाँच श्लोकोंद्वारा वर्णन करते हैं—
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा१२ १३ क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥
श्रेष्ठताके अभिमानका अभाव, दम्भाचरणका अभाव, किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भी न सताना१, क्षमाभाव२, मन-वाणी आदिकी सरलता३, श्रद्धा-भक्तिसहित गुरुकी सेवा४, बाहर-भीतरकी शुद्धि५, अन्तःकरणकी स्थिरता६ और मन-इन्द्रियों-सहित शरीरका निग्रह७ ॥ ७ ॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार८ ९ एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥
इस लोक और परलोकके सम्पूर्ण भोगोंमें आसक्तिका अभाव और अहंकारका भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदिमें दुःख और दोषोंका बार-बार विचार करना३०।।