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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

धृतराष्ट्रके द्वारा कौरव-पाण्डवोंकी शक्तिका तुलनात्मक वर्णन

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षष्टितमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रके द्वारा कौरव-पाण्डवोंकी शक्तिका तुलनात्मक वर्णन

वैशम्पायन उवाच

संजयस्य वचः श्रुत्वा प्रज्ञाचक्षुर्जनेश्वरः ।
ततः संख्यातुमारेभे तद्वचो गुणदोषतः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! संजयकी बात सुनकर प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रने उसके वचनके गुण-दोषका विवेचन आरम्भ किया ॥ १ ॥
प्रसंख्याय च सौक्ष्म्येण गुणदोषान् विचक्षणः ।
यथावन्मतितत्त्वेन जयकामः सुतान् प्रति ॥ २ ॥
बलाबलं विनिश्चित्य याथातथ्येन बुद्धिमान् ।
(यदा तु मेने भूयिष्ठं तद्वचो गुणदोषतः ।
पुनरेव कुरूणां च पाण्डवानां च बुद्धिमान् ॥ )
शक्तिं संख्यातुमारेभे तदा वै मनुजाधिपः ॥ ३ ॥
अपने पुत्रोंकी विजय चाहनेवाले विद्वान् एवं बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने बुद्धितत्त्वके द्वारा उक्त वचनके सूक्ष्म-से-सूक्ष्म गुण-दोषोंकी यथावत् समीक्षा करके दोनों पक्षोंकी प्रबलता एवं निर्बलताका यथार्थरूपसे निश्चय कर लिया। तत्पश्चात् जब उन्हें यह विश्वास हो गया कि गुण-दोषकी दृष्टिसे श्रीकृष्णका कथन सर्वोत्कृष्ट है, तब उन बुद्धिमान् नरेशने पुनः कौरवों और पाण्डवोंकी शक्तिपर विचार करना आरम्भ किया ॥
देवमानुषयोः शक्त्या तेजसा चैव पाण्डवान् ।
कुरून् शक्त्याल्पतरया दुर्योधनमथाब्रवीत् ॥ ४ ॥
पाण्डवोंमें दैवी शक्ति, मानवी शक्ति तथा तेज—इन सभी दृष्टियोंसे उत्कृष्टता प्रतीत हुई और कौरव-पक्षकी शक्ति अल्प जान पड़ी, इस प्रकार विचार करके धृतराष्ट्रने दुर्योधनसे कहा— ॥ ४ ॥
दुर्योधनेयं चिन्ता मे शश्वन्न व्युपशाम्यति ।
सत्यं ह्येतदहं मन्ये प्रत्यक्षं नानुमानतः ॥ ५ ॥
‘वत्स दुर्योधन! मेरी यह चिन्ता कभी दूर नहीं होती है, क्योंकि तुम्हारा पक्ष दुर्बल है। मैं यह बात अनुमानसे नहीं कहता हूँ; प्रत्यक्ष देख रहा हूँ; अतः इसीको सत्य मानता हूँ ॥ ५ ॥
(ईदृशेऽभिनिविष्टस्य पृथिवीक्षयकारके ।

अधर्म्ये चायशस्ये वा कार्ये महति दारुणे ।।
पाण्डवैर्विग्रहस्तात सर्वथा मे न रोचते ।। )
'तुम ऐसे कार्यके लिये दुराग्रह करते हो, जो समस्त भूमण्डलका विनाश करनेवाला है। यह अधर्मकारक तो है ही, अपयशकी भी वृद्धि करनेवाला है; इसके सिवा यह अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्म है। तात! तुम्हारा पाण्डवोंके साथ युद्ध छेड़ना मुझे किसी भी तरह अच्छा नहीं लग रहा है।

आत्मजेषु परं स्नेहं सर्वभूतानि कुर्वते ।
प्रियाणि चैषां कुर्वन्ति यथाशक्ति हितानि च ॥ ६ ॥
'संसारके समस्त प्राणी अपने पुत्रोंपर अत्यन्त स्नेह करते हैं तथा अपनी शक्तिके अनुसार इनका प्रिय एवं हितसाधन करते हैं ।। ६ ।।

एवमेवोपकर्तॄणां प्रायशो लक्षयामहे ।
इच्छन्ति बहुलं सन्तः प्रतिकर्तुं महत् प्रियम् ।। ७ ।।
'इसी प्रकार प्रायः यह भी देखता हूँ कि साधु पुरुष उपकारी मनुष्योंके उपकारका बदला चुकानेके लिये उनका बारंबार महान् प्रिय कार्य करना चाहते हैं ।।

अग्निः साचिव्यकर्ता स्यात् खाण्डवे तत्कृतं स्मरन् ।
अर्जुनस्यापि भीमेऽस्मिन् कुरुपाण्डुसमागमे ।। ८ ।।
'कौरव-पाण्डवोंके इस भयंकर संग्राममें अग्निदेव भी खाण्डववनमें अर्जुनके किये हुए उपकारको याद करके उनकी सहायता अवश्य करेंगे ।। ८ ।।

जातिगृद्ध्याभिपन्नाश्च पाण्डवानामेकशः ।
धर्मादयः समेष्यन्ति समाहूता दिवौकसः ॥ ९ ॥
'इसके सिवा पाण्डवोंका जन्म अनेक देवताओंसे हुआ है, इसलिये वे धर्म आदि देवता युधिष्ठिर आदिके बुलानेपर उनकी सहायताके लिये अवश्य पधारेंगे ।। ९ ।।

भीष्मद्रोणकृपादीनां भयादशनिसंनिभम् ।
रिरक्षिषन्तः संरम्भं गमिष्यन्तीति मे मतिः ।। १० ।।
'भीष्म, द्रोण और कृप आदिके भयसे पाण्डवोंकी रक्षा चाहते हुए देवतालोग भीष्म आदिपर वज्रके समान भयंकर क्रोध करेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है ।। १० ।।

ते देवैः सहिताः पार्था न शक्याः प्रतीवीक्षितुम् ।
मानुषेण नरव्याघ्रा वीर्यवन्तोऽस्त्रपारगाः ।। ११ ।।
'नरश्रेष्ठ पाण्डव अस्त्रविद्याके पारंगत और पराक्रमी तो हैं ही, देवताओंका सहयोग भी प्राप्त कर चुके हैं; अतः कोई मनुष्य उनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता ।। ११ ।।

दुरासदं यस्य दिव्यं गाण्डीवं धनुरुत्तमम् ।
वारुणौ चाक्षयौ दिव्यौ शरपूर्णौ महेषुधी ।। १२ ।।

वानरश्च ध्वजो दिव्यो निःसङ्गो धूमवद्गतिः ।
रथश्च चतुरन्तायां यस्य नास्ति समः क्षितौ ॥ १३ ॥
महामेघनिभश्चापि निर्घोषः श्रूयते जनैः ।
महाशनिसमः शब्दः शात्रवाणां भयंकरः ॥ १४ ॥
यं चातिमानुषं वीर्ये कृत्स्नो लोको व्यवस्यति ।
देवानामपि जेतारं यं विदुः पार्थिवा रणे ॥ १५ ॥
शतानि पञ्च चैवेषून् यो गृह्णन् नैव दृश्यते ।
निमेषान्तरमात्रेण मुञ्चन् दूरं च पातयन् ॥ १६ ॥
यमाह भीष्मो द्रोणश्च कृपो द्रौणिस्तथैव च ।
मद्रराजस्तथा शल्यो मध्यस्था ये च मानवाः ॥ १७ ॥
युद्धायावस्थितं पार्थं पार्थिवैरतिमानुषैः ।
अशक्यं नरशार्दूलं पराजेतुमरिंदमम् ॥ १८ ॥
क्षिपत्येकेन वेगेन पञ्च बाणशतानि यः ।
सदृशं बाहुवीर्येण कार्तवीर्यस्य पाण्डवम् ॥ १९ ॥
तमर्जुनं महेष्वासं महेन्द्रोपेन्द्रविक्रमम् ।
निघ्नन्तमिव पश्यामि विमर्देऽस्मिन् महाहवे ॥ २० ॥

‘जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है—धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाधनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ॥ १२-२० ॥

इत्येवं चिन्तयत् कृत्स्नमहोरात्राणि भारत ।
अनिद्रो निःसुखश्चास्मि कुरूणां शमचिन्तया ॥ २१ ॥

'भारत! मैं दिन-रात यही सब सोचते-सोचते नींद नहीं ले पाता हूँ। कुरुवंशियोंमें कैसे शान्ति बनी रहे—इस चिन्तासे मेरा सारा सुख छिन गया है ॥ २१ ॥

क्षयोदयोऽयं सुमहान् कुरूणां प्रत्युपस्थितः ।
अस्य चेत् कलहस्यान्तः शमादन्यो न विद्यते ॥ २२ ॥
शमो मे रोचते नित्यं पार्थैस्तात न विग्रहः ।
कुरुभ्यो हि सदा मन्ये पाण्डवान् शक्तिमत्तरान् ॥ २३ ॥

'कौरवोंके लिये यह महान् विनाशका अवसर उपस्थित हुआ है। तात! यदि इस कलहका अन्त करनेके लिये संधिके सिवा और कोई उपाय नहीं है तो मुझे सदा संधिकी ही बात अच्छी लगती है; कुन्तीपुत्रोंके साथ युद्ध छेड़ना ठीक नहीं है। मैं सदा पाण्डवोंको कौरवोंसे अधिक शक्तिशाली मानता हूँ' ॥ २२-२३ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि धृतराष्ट्रविवेचने षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें धृतराष्ट्रके द्वारा कौरव-पाण्डवोंकी शक्तिका विवेचनसम्बन्धी साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/३ श्लोक हैं।]