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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariBrajpublished228 pages

प्रस्तावना एवं विषय-सूची

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कवितावली

हिन्दी अनुवाद सहित
अनुवादक
इन्द्र देवनारायण

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मुद्रक तथा प्रकाशक
घनश्यामदास जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर

सं० १९९४ से २००४ तक २४,२५०
सं० २००६ सप्तम संस्करण १०,०००
सं० २००७ अष्टम संस्करण १५,०००
कुल ४९,२५०

मूल्य ॥-) नौ आना

पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर)

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निवेदन
श्रीइन्द्रदेवनारायणजीद्वारा अनुवादित इस कवितावलीके
अनुवादको संशोधन करनेमें श्रीयुत मुनिलालजी एवं सम्मान्य
पं० श्रीचिम्मनलालजी गोस्वामी एम्० ए०, शास्त्री, सम्पादक
कल्याण-कल्पतरुने जो परिश्रम किया है, उसके लिये हम
उनके हृदयसे कृतज्ञ हैं।
प्रकाशक

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श्रीहरिः
विषय-सूची
विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
बालकाण्ड २१-लक्ष्मण-मूर्च्छा ... ९९
१-बालरूपकी झाँकी ... ५ २२-युद्धका अन्त ... १०२
२-बाललीला ... ७ उत्तरकाण्ड
३-धनुर्यज्ञ ... ९ २३-रामकी कृपालुता ... १०५
४-परशुराम-लक्ष्मण-संवाद १६ २४-केवल रामहीसे माँगो १२०
अयोध्याकाण्ड २५-उद्बोधन ... १२३
५-वनगमन ... २० २६-विनय ... १२५
६-गुहका पाद-प्रक्षालन ... २३ २७-रामप्रेम ही सार है ... १२६
७-वनके मार्गमें ... २७ २८-नाम-विश्वास ... १४१
८-वनमें ... ३६ २९-कलिवर्णन ... १५५
अरण्यकाण्ड ३०-रामनाममहिमा ... १५८
९-मारीचानुधावन ... ३८ ३१-रामगुणगान ... १७२
किष्किन्धाकाण्ड ३२-रामप्रेमकी प्रधानता ... १७५
१०-समुद्रोल्लङ्घन ... ३९ ३३-रामभक्तिकी याचना ... १७९
सुन्दरकाण्ड ३४-प्रभुकी महत्ता और
११-अशोकवन ... ४० दयालुता ... १८२
१२-लंकादहन ... ४१ ३५-गोपियोंका अनन्य प्रेम १८७
१३-सीताजीसे विदाई ... ५९ ३६-विनय ... १८९
१४-भगवान् रामकी उदारता ६३ ३७-सीतावट-वर्णन ... १९१
लंकाकाण्ड ३८-चित्रकूट-वर्णन ... १९३
१५-राक्षसोंकी चिन्ता ... ६५ ३९-तीर्थराजसुषमा ... १९५
१६-त्रिजटाका आश्वासन ... ६६ ४०-श्रीगङ्गा-माहात्म्य ... १९६
१७-समुद्रोत्तरण ... ६९ ४१-अन्नपूर्णामाहात्म्य ... १९८
१८-अङ्गदजीका दूतत्व ... ७१ ४२-शङ्कर-स्तवन ... १९८
१९-रावण और मन्दोदरी ... ७६ ४३-काशीमें महामारी ... २१३
२०-राक्षस-वानर-संग्राम ... ८५ ४४-विविध ... २२०

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कवितावली
श्रीसीताराम

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ॐ
श्रीसीतारामभ्यां नमः
कवितावली
बालकाण्ड
रेफ आत्मचिन्मय अकल, परब्रह्म पररूप।
हरि-हर-अज-वन्दित-चरन, अगुण अनीह अनूप ॥ १ ॥
बालकेलि दशरथ-अजिर, करत सो फिरत सभाम।
पदनखेन्दु तेहि ध्यान धरि, विरचत तिलक बनाय ॥ २ ॥
अनिलसुवन पदपद्मरज, प्रेमसहित शिर धार।
इन्द्रदेव टीका रचत, कवितावली उदार ॥ ३ ॥
बन्दौं श्रीतुलसीचरन-नख अनूप दुतिमाल।
कवितावलि-टीका लसै कवितावलि-वरभाल ॥ ४ ॥
बालरूपकी झाँकी
अवधेसके द्वारें सकारें गई सुत गोद कै भूपति लै निकसे।
अवलोकि हौं सोच विमोचनको ठगि-सी रही, जे न ठगे धिक-से॥
तुलसी मन-रंजन रंजित-अंजन नैन सुखंजन-जातक-से।
सजनी ससिमें समसील उभै नवनील सरोरुह-से बिकसे ॥१॥
[ एक सखी किसी दूसरी सखीसे कहती है—] मैं सबेरे
अयोध्यापति महाराज दशरथके द्वारपर गयी थी। उसी समय
महाराज पुत्रको गोदमें लिये बाहर आये। मैं तो उस सकल-
शोकहारी बालकको देखकर ठगी-सी रह गयी; उसे देखकर जो

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कवितावली ६
मोहित न हों उन्हें धिक्कार है । उस बालकके अञ्जन-रञ्जित मनोहर
नेत्र खञ्जन पक्षीके बच्चेके समान थे । हे सखि ! वे ऐसे जान
पड़ते थे मानो चन्द्रमाके भीतर दो समान रूपवाले नवीन नील-
कमल खिले हुए हों ।
पग नूपुर औ पहुँची करकंजनि मंजु बनी मनिमाल हिएँ ।
नवनील कलेवर पीत झँगा झलकै पुलकैं नृपु गोद लिएँ ॥
अरबिंदु सो आननु रूप मरंदु अनंदित लोचन-भृंग पिएँ ।
मनमो न बस्यौ अस बालकु जौं तुलसी जगमें फलु कौन जिएँ ॥२॥
उस बालकके चरणोंमें घुँघुरू, करकमलोंमें पहुँची और
गलेमें मनोहर मणियोंकी माला शोभायमान थी । उसके नवीन श्याम
शरीरपर पीला झँगुला झलकता था । महाराज उसे गोदमें लेकर
पुलकित हो रहे थे । उसका मुख कमलके समान था, जिसके रूप-
मकरन्दका पानकर [ देखनेवालोंके ] नेत्ररूप भौंरे आनन्दमग्न हो
जाते थे । श्रीगोसाईंजी कहते हैं—यदि मनमें ऐसा बालक न बसा
तो संसारमें जीवित रहनेसे क्या लाभ है ?
तनकी दुति स्याम सरोरुह लोचन कंजकी मंजुलताई हरैं ।
अति सुंदर सोहत धूरि भरे छबि भूरि अनंगकी दूरि धरैं ॥
दमकैं दँतियाँ दुति दामिनि ज्यौं किलक कल बालबिनोद करैं ।
अवधेसके बालक चारि सदा तुलसी-मन-मंदिरमें बिहरैं ॥३॥
उनके शरीरकी आभा नीलकमलके समान है तथा नेत्र कमल-
की शोभाको हरते हैं । धूलिसे भरे होनेपर भी वे बड़े सुन्दर जान
पड़ते हैं और कामदेवकी महती छबिको भी दूर कर देते हैं । उनके
नन्हे-नन्हे दाँत बिजलीकी चमकके समान चमकते हैं और वे

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किलक-किलककर मनोहर बाललीलाएँ करते हैं। अयोध्यापति महाराज
दशरथके वे चारों बालक तुलसीदासके मनमन्दिरमें सदैव विहार करें।
बाललीला
कबहूँ ससि मागत आरि करैं कबहूँ प्रतिबिंब निहारि डरैं।
कबहूँ करताल बजाइकें नाचत मातु सबै मन मोद भरैं ॥
कबहूँ रिसिआइ कहैं हठिकै पुनि लेत सोई जेहि लागि अरैं।
अवधेसके बालक चारि सदा तुलसी-मन-मंदिरमें बिहरैं ॥४॥
कभी चन्द्रमाको माँगनेका हठ करते हैं, कभी अपनी परछाईं
देखकर डरते हैं, कभी हाथसे ताली बजा-बजाकर नाचते हैं जिससे
सब माताओंके हृदय आनन्दसे भर जाते हैं। कभी रूठकर
हठपूर्वक कुछ कहते ( माँगते ) हैं और जिस वस्तुके लिये अड़ते
हैं उसे लेकर ही मानते हैं। अयोध्यापति महाराज दशरथके वे चारों
बालक तुलसीदासके मन-मन्दिरमें सदैव विहार करें।
बर दंतकी पंगति कुंदकली अधराधर-पल्लव खोलनकी।
चपला चमकै घन बीच जगै छबि मोतिन माल अमोलनकी ॥
घुँघुरारि लटैं लटकैं मुख ऊपर कुंडल लोल कपोलनकी।
नेवछावरि प्रान करै तुलसी बलि जाउँ लला इन बोलनकी ॥५॥
कुन्दकलीके समान उज्ज्वलवर्ण दन्तावली, अधरपुटोंका खोलना
और अमूल्य मुक्तामालाओंकी छवि ऐसी जान पड़ती है मानो
श्याममेघके भीतर बिजली चमकती हो। मुखपर घुँघुराली अलकें
लटक रही हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—लल्ला ! मैं कुण्डलोंकी
झलकसे सुशोभित तुम्हारे कपोलों और इन अमोल बोलोंपर अपने
प्राण न्यौछावर करता हूँ।

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कवितावली ८
पद कंजनि मंजु बनीं पनहीं, धनुहीं सर पंकज-पानि लिएँ।
लरिका सँग खेलत डोलत हैं सरजू-तट चौहट हाट हिएँ॥
तुलसी अस बालक सों नहि नेहु कहा जप जोग समाधि किएँ।
नर वे खर सूकर स्वान समान कहौ जगमें फलु कौन जिएँ ॥६॥
उनके चरणकमलोंमें मनोहर जूतियाँ सुशोभित हैं, वे
करकमलोंमें छोटा-सा धनुष-बाण लिये हुए हैं, बालकोंके साथ
सरयूजीके किनारे, चौराहे और बाजारोंमें खेलते फिरते हैं।
तुलसीदासजी कहते हैं—यदि ऐसे बालकोंसे प्रेम न हुआ तो
बताइये जप, योग अथवा समाधि करनेसे क्या लाभ है? वे लोग
तो गधों, शूकरों और कुत्तोंके समान हैं, बताइये संसारमें उनके
जीनेका क्या फल है ?
सरजू बर तीरहिं तीर फिरैं रघुबीर सखा अरु बीर सबै।
धनुहीं कर तीर, निषंग कसें कटि पीत दुकूल नवीन फबै॥
तुलसी तेहि औसर लावनिता दस चारि नौ तीन इक्कीस सबै।
मति भारति पंगु भई जो निहारि बिचारि फिरी उपमा न पवै ॥७॥
श्रीरघुनाथजी, उनके सखा और सब भाई पवित्र सरयू नदीके
किनारे-किनारे घूमते फिरते हैं। उनके हाथमें छोटे-छोटे धनुष-बाण
हैं, कमरमें तरकस कसा हुआ है और शरीरपर नूतन पीताम्बर सुशोभित
है। तुलसीदासजी कहते हैं—श्रीशारदाकी मति उस समयकी सुन्दरताकी
उपमा चौदहों भुवन, नवों खण्ड, तीनों लोक और इक्कीसों ब्रह्माण्डोंमें
जब विचारपूर्वक खोजनेपर भी नहीं पा सकी तब कुण्ठित हो गयी*।

  • उस समय शोभाकी उपमा पानेके लिये शारदा दसों यामल-तन्त्र,
    चारों उपवेद, नवों व्याकरण, वेदत्रयी और इक्कीसों ब्रह्माण्डोंमें सर्वत्र फिरीं,
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९ बालकाण्ड
धनुर्यज्ञ
छोनीमेंके छोनीपति छाजैं जिन्हें छत्रछाया
छोनी-छोनी छाए छिति आए निमिराजके ।
प्रबल प्रचंड बरिबंड बर वेष बपु
बरिबेकों बोले बैदेही वर काजके ॥
बोले बंदी बिरुद बजाइ बर बाजनेऊ
बाजे-बाजे बीर बाहु धुनत समाजके।
तुलसी मुदित मन पुर नर-नारि जेते
बार-बार हेरैं मुख औध-मृगराजके ॥ ८॥
जिनके ऊपर राजछत्रोंकी छाया शोभायमान है ऐसे पृथ्वीभरके
परन्तु उन सबको देख और विचारकर भी उसकी बुद्धि कुण्ठित हो गयी ।
अर्थात् उसे उस शोभाके योग्य कोई भी उपमा नहीं मिली।
काशी-नागरी-प्रचारिणी सभाकी प्रतिमें यों अर्थ है -
दस गुण माधुर्यके ( रूप, लावण्य, सौन्दर्य, माधुर्य, सौकुमार्य, यौवन,
सुगन्ध, सुवेष, स्वच्छता, उज्ज्वलता )
चार गुण प्रतापके ( ऐश्वर्य, वीर्य, तेज, बल ) ।
ऐश्वर्यके नौ गुण ( भाग्य, अदभ्रता, नियतात्मता, वशीकरण,
वाग्मित्व, सर्वज्ञता, संहनन, स्थिरता, वदान्यता ) ।
सहज या प्रकृतिके तीन गुण ( सौम्यता, रमण, व्यापकता ) ।
यशके इक्कीस गुण ( सुशीलता, वात्सल्य, सुलभता, गम्भीरता, क्षमा,
दया, करुणा, आर्द्रता, उदारता, आर्जव, शरण्यत्व, सौहार्द, चातुर्य,
प्रीतिपालकत्व, कृतज्ञता, ज्ञान, नीति, लोकप्रियता, कुलीनता, अनुराग,
निर्वहणता ) ।

१. बालकाण्ड (श्री राम जन्म व बाललीला)

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कवितावली १०
राजालोग झुंड-के-झुंड महाराज जनकके यहाँ आकर उनके स्थानमें
छाये हुए हैं। वे बड़े बलवान्, प्रतापी और तेजस्वी हैं, उनके शरीर
और वेष भी बड़े सुन्दर हैं और वे श्रीसीताजीको वरण करनेके शुभ
कार्यसे बुलाये गये हैं। श्रेष्ठ वन्दीजन उनकी बिरदावलीका बखान
करते हैं, बाजेवाले बाजे बजाते हैं तथा उस राजसमाजके कोई-कोई
वीर भी अपनी भुजाएँ ठोंकते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं- इस
समय जनकपुरके जितने नर-नारी हैं वे सभी अवधकेसरी भगवान्
रामका मुख बारंबार देखते और मन-ही-मन प्रसन्न होते हैं।
सियकें स्वयंवर समाजु जहाँ राजनिको
राजनके राजा महाराजा जानै नाम को।
पवनु, पुरंदरु, कृसानु, भानु, धनदु से,
गुनके निधान रूपधाम सोमु कामु को॥
बान बलवान जातुधानप सरीखे सूर
जिन्हकें गुमानु सदा सालिम संग्रामको।
तहाँ दसरथकें समत्थ नाथ तुलसीकें
चपरि चढ़ायौ चापु चंद्रमाललामको ॥९॥
सीताजीके स्वयंवरमें, जहाँ राजाओंका समाज जुड़ा हुआ था,
बहुत-से राजराजेश्वर और सम्राट् थे, उनके नाम कौन जानता है ?
वे वायु, इन्द्र, अग्नि, सूर्य और कुबेरके समान गुणके भण्डार और
ऐसे रूपराशि थे कि उनके सामने चन्द्रमा तथा कामदेव भी क्या
हैं ? उनमें बाणासुर और राक्षसराज रावण-जैसे शूरवीर भी थे, जिन्हें
संग्रामभूमिमें सदा ही सकुशल रहनेका अभिमान था [ अर्थात् जो
संग्राममें सदा ही दृढ़रूपसे क्षतरहित विजय लाभ करते थे ]। उसी

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११ बालकाण्ड
राजसमाजमें तुलसीदासके समर्थ प्रभु दशरथनन्दन रामने चपलतासे
चन्द्रमौलि भगवान् शङ्करका धनुष चढ़ा दिया ।
मयनमहनु पुरदहनु गहनु जानि
आनिकै सबैको सारु धनुष गढ़ायो है।
जनकसदसि जेते भले-भले भूमिपाल
किये बलहीन, बलु आपनो बढ़ायो है ॥
कुलिस-कठोर कूर्मपीठतें कठिन अति
हठि न पिनाकु काहूँ चपरि चढ़ायो है।
तुलसी सो रामके सरोज-पानि परसत ही
टूट्यौ मानो बारे ते पुरारि ही पढ़ायो है ॥१०॥
श्रीमहादेवजीने कामका दलन और त्रिपुरका नाश बहुत कठिन
समझकर सब कठोर पदार्थोंको मँगाकर उनका साररूप यह धनुष
बनवाया था। उसने जनकजीकी सभामें जितने बड़े-बड़े राजा आये
थे, उन सभीको बलहीन कर अपना ही बल बड़ा रक्खा । वज्रसे
भी कठोर और कछुएकी पीठसे भी कड़े उस धनुषको कोई भी राजा
बलपूर्वक फुर्तीसे नहीं चढ़ा सका । तुलसीदासजी कहते हैं--किन्तु
वही धनुष भगवान् रामके करकमलका स्पर्श होते ही टूट गया,
मानो महादेवजीका उसे बालेपन (आरम्भ) से यही पाठ पढ़ाया
हुआ था।
डिगति उर्वि अति गुर्वि, सर्व पब्बै समुद्र-सर ।
ब्याल बधिर तेहि काल, बिकल दिगपाल चराचर ॥
दिग्गयंद लरखरत परत दसकंधु मुखख भर ।
सुर-बिमान हिमभानु भानु संघटत परसपर ॥

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कवितावली १२
चौंके विरंचि संकर सहित, कोलु कमठु अहि कलमल्यौ।
ब्रह्मांड खंड कियो चंड धुनि जबहिं राम सिव धनु दल्यौ ॥११॥
जिस समय श्रीरामचन्द्रजीने शिवजीका धनुष तोड़ा उस समय
उसका प्रचण्ड शब्द ब्रह्माण्डको पार कर गया और उसके आघातसे
सारे पर्वत, समुद्र और तालाबोंके सहित अत्यन्त भारी पृथ्वी
डगमगाने लगी, सर्प बहिरे हो गये, सम्पूर्ण चराचर एवं इन्द्रादि
दिक्पालगण व्याकुल हो उठे, दिग्गज लड़खड़ाने लगे, रावण मुँहके
बल गिरने लगा, देवताओंके विमान, चन्द्रमा और सूर्य आकाशमें
परस्पर टकराने लगे, महादेवजीसहित ब्रह्माजी चौंक पड़े और
वाराह, कच्छप तथा शेषजी भी कलमला उठे।
लोचनाभिराम घनस्याम रामरूप सिसु,
सखी कहै सखीसों तूँ प्रेमपय पालि, री !
बालक नृपालजूकें ख्याल ही पिनाकु तोरयो,
मंडलीक-मंडली-प्रताप-दापु दालि री ॥
जनकको, सियाको, हमारो, तेरो, तुलसीको,
सबको भावतो हैंहै, मैं जो कह्यो कालि, री ।
कौसिलाकी कोखिपर तोषि तन वारिये, री,
राय दसरथकी बलैया लीजै आलि री ॥१२॥
कोई सखी दूसरी सखीसे कहने लगी—अरी सखि !
रामचन्द्रजीके इस नयनसुखदायक मेघश्यामरूपरूपी शिशुका तू
प्रेमरूपी दूधसे पालन कर । यहाँ एकत्रित हुए मण्डलेश्वरोंको जो
अपने प्रतापका अभिमान था उसे चूर्णकर इस राजकुमारने संकल्प-
मात्रसे ही धनुष तोड़ डाला । मैंने जो तुझसे कल कहा था, अब

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१३ बालकाण्ड
महाराज जनकका, सीताका, हमारा, तेरा और तुलसीका सभीका
मनमाना होगा । अरी आली ! अब सन्तुष्ट होकर रानी कौसल्याकी
कोखपर अपना शरीर न्यौछावर कर दो और महाराज दशरथकी
भी बलैयाँ लो ।
दूब दधि रोचनु कनक थार भरि भरि
आरति सँवारि बर नारि चलीं गावतीं ।
लीन्हें जयमाल करकंज सोहैं जानकीके
पहिरावो राघोजूको सखियाँ सिखावतीं ॥
तुलसी मुदित मन जनकनगर-जन
झाँकतीं झरोखें लागीं सोभा रानीं पावतीं ।
मनहुँ चकोरीं चारु बैठीं निज निज नीड
चंदकी किरिन पीवैं पलकौ न लावतीं ॥१३॥
सौभाग्यवती स्त्रियाँ सुवर्णके थालोंमें दूब, दही और रोली भर-
भरकर आरती सजा गाती हुई चलीं । श्रीजानकीजीके करकमल
जयमाला लिये सुशोभित हो रहे हैं । उन्हें सखियाँ सिखाती हैं कि
श्रीरामचन्द्रजीको जयमाला पहना दो । तुलसीदासजी कहते हैं-
जनकपुरके सभी लोग मनमें प्रसन्न हैं । झरोखोंमें आकर झाँकती
हुईं रानियाँ भी बड़ी ही शोभा पा रही हैं, मानो अपने-अपने
घोंसलोंमें बैठी हुई मनोहर चकोरियाँ चन्द्रमाकी किरणोंका अनिमेष
नेत्रोंसे पान कर रही हैं ।
नगर निसान बर बाजैं ब्योम दुंदुभीं
बिमान चढ़ि गान कैके सुरनारि नाचहीं ।
जयति जय तिहुँ पुर जयमाल रामउर
बरषै सुमन सुर रूरे - रूप राचहीं ॥

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कवितावली १४
जनकको पनु जयो, सबको भावतो भयो
तुलसी मुदित रोम-रोम मोद् माचहीं।
साँवरो किसोर गोरी सोभापर तृन तोरी
जोरी जियो जुग-जुग जुवती-जन जाचहीं ॥१४॥
नगरमें मनोहर नगाड़े और आकाशमें दुन्दुभियाँ बज रही हैं।
देवाङ्गनाएँ विमानोंपर चढ़ गा-गाकर नृत्य कर रही हैं। तीनों
लोकोंमें जय-जयकार छाया हुआ है। भगवान् रामके गलेमें जयमाला
सुशोभित है। देवतालोग भगवान्‌के सुन्दर रूपपर मुग्ध होकर
पुष्पोंकी वर्षा कर रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—महाराज
जनककी प्रतिज्ञा पूर्ण हुई, सब लोगोंकी अभिलाषा पूरी हो गयी;
अतः आनन्दके कारण उनके रोम-रोममें हर्ष भर गया है। युवतियाँ
उस श्यामसुन्दर कुमार और गौरवर्ण कुमारीकी शोभापर तृण तोड़कर
मनाती हैं कि यह जोड़ी युग-युग जीवित रहे।
भले भूप कहत भलें भदेस भूपनि सों,
लोक लखि बोलिये पुनीत रीति भाखी।
जगदंबा जानकी जगतपितु रामचंद्र,
जानि जियँ जोहौ जो न लागै मुहँ कारिखी ॥
देखे हैं अनेक ब्याह, सुने हैं पुरान-वेद,
बूझे हैं सुजान साधु नर-नारि पारिखी।
ऐसे सम समधी समाज न विराजमान,
रामु से न बर दुलही न सिय-सारिखी ॥१५॥
अच्छे राजालोग नीच राजाओंको भली प्रकार समझाकर कहते
हैं कि समाजको देखकर आर्योचित पवित्र ढंगसे बात कीजिये।

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बालकाण्ड
श्रीजानकीजीको जगत्की माता और कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रको
जगत्के पिता जानकर मनमें ऐसे विचारकर देखो जिससे मुँहमें
कालिमा न लगे । अनेकों विवाह देखे हैं, वेद-पुराण भी सुने और
श्रेष्ठ साधु पुरुषोंसे तथा जो अन्य स्त्री-पुरुष परीक्षा कर सकते हैं,
उनसे भी पूछा है; परन्तु ऐसे समान समधी और समाजकी जोड़ी
कहीं नहीं है, और न श्रीरामचन्द्रजीके समान दुलहा तथा
श्रीजानकीजी-जैसी दुलहिन ही हैं।
बानी बिधि गौरी हर सेसहूँ गनेस कही,
सही भरी लोमस भुसुंडि बहुबारिषो ।
चारिदस भुअन निहारि नर-नारि सब
नारदसों परदा न नारदु सो पारिखो ॥
तिन्ह कही जगमें जगमगनि जोरी एक
दूजो को कहैया औ सुनैया चप चारिखो ।
रमा रमारमन सुजान हनुमान कही
सीय-सी न तीय न पुरुष राम-सारिखो ॥१६॥
सरस्वती, ब्रह्मा, पार्वती, शिव, शेष और गणेशने कहा है
और चिरञ्जीवी लोमश तथा काकभुशुण्डिजीने साक्षी दी है; जिन
नारदजीसे कहीं पर्दा नहीं है और जिनके समान दूसरा कोई स्त्री-
पुरुषोंके लक्षणोंका जानकार नहीं है, उन्होंने भी चौदहों भुवनोंके
समस्त स्त्री-पुरुषोंको देखकर यही कहा है कि संसारमें एक श्रीराम-
जानकीजीकी [ ही ] जोड़ी जगमगा रही है। उनसे बढ़कर और
कौन चार आँखोंवाला बतलाने और सुननेवाला है । स्वयं लक्ष्मी

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कवितावली १६
और श्रीमन्नारायण तथा तत्त्वज्ञ हनुमान्जीने कहा है कि जानकीजीके
समान स्त्री और श्रीरामजीके समान पुरुष नहीं है ।
दूलह श्रीरघुनाथु बने दुलही सिय सुंदर मंदिर माहीं ।
गावति गीत सबै मिलि सुंदरि वेद जुवा जुरि विप्र पढ़ाहीं ॥
रामको रूपु निहारति जानकी कंकनके नगकी परछाहीं ।
यातें सबै सुधि भूलि गई कर टेकि रही पल टारत नाहीं ॥१७॥
सुन्दर राजमहलमें श्रीरामचन्द्रजी दुलहा और श्रीजानकीजी
दुलहिन बनी हुई हैं । समस्त सुन्दरी स्त्रियाँ मिलकर गीत गा रही
हैं और युवक ब्राह्मणलोग जुटकर वेदपाठ कर रहे हैं । उस
अवसरमें श्रीजानकीजी हाथके कंकणके नगमें पड़ी हुई श्रीरामचन्द्रजी-
की परछाहीं निहार रही हैं, इससे वे सारी सुधि भूल गयी हैं अर्थात्
रूपकी शोभामें मन लीन हो गया है । उनके हाथ जहाँ-के-तहाँ
रुक गये हैं और वे पलकें भी नहीं हिलाती हैं ।
परशुराम-लक्ष्मण-संवाद
भूपमंडली प्रचंड चंडीस-कोदंडु खंड्यौ,
चंड बाहुदंडु जाको ताहीसों कहतु हौं ।
कठिन कुठार-धार धरिबेको धीर ताहि,
बीरता बिदित ताको देखिए चहतु हौं ॥
तुलसी समाजु राज तजि सो बिराजै आजु,
गाज्यौ मृगराजु गजराजु ज्यौं गहतु हौं ।
छोनीमें न छाड्यौ छप्यौ छौनिपको छोना छोटो,
छौनिप-छपन बाँको बिरुद बहुतु हौं ॥१८॥

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१७ बालकाण्ड
[ परशुरामजीने गरजकर कहा-- ] राजाओंकी मण्डलीमें
जिसने शिवजीका प्रचण्ड धनुष तोड़ा है और जिसके भुजदण्ड बड़े
प्रचण्ड हैं, मैं उसीसे कहता हूँ--मैं अपने कठिन कुठारकी धारको
धारण करनेकी उसकी धीरता और प्रसिद्ध वीरता देखना चाहता
हूँ । वह राजसमाजको छोड़कर आज अलग विराजमान हो जाय
अर्थात् राज-समाजसे बाहर निकल आवे । जैसे हाथीको सिंह
पकड़ता है वैसे ही मैं उसे पकड़ूँगा । मैंने पृथ्वीपर राजाओंके छिपे
हुए छोटे बालकको भी नहीं छोड़ा; मैं राजाओंको मारनेकी उत्कृष्ट
कीर्ति धारण किये हुए हूँ ।
निपट निदरि बोले बचन कुठारपानि,
मानी त्रास औनिपनि मानो मौनता गही ।
रोष माखे लखनु अकनि अनखोही बातें,
तुलसी विनीत बानी विहसि ऐसी कही ॥
सुजस तिहारें भरे भुअन भृगुतिलक,
प्रगट प्रतापु आपु कह्यो सो सबै सही ।
टूट्यौ सो न जुरैगो सरासनु महेसजूको,
रावरी पिनाकमें सरीकता कहाँ रही ॥१९॥
जब परशुरामजीने अत्यन्त निरादरपूर्ण वचन कहे तब सब
राजा लोग भयभीत हो ऐसे चुप हो गये, मानो मौन ग्रहण कर
लिया हो । किन्तु ऐसे अनखावने वचन सुनकर लक्ष्मणजी
रोषमें भर गये और हँसकर इस प्रकार नम्र वचन बोले--'हे
भृगुकुलतिलक ! तुम्हारे सुयशसे [ चौदहों ] भुवन भरे हुए हैं ।
आपने जो अपना प्रसिद्ध प्रताप बखान किया है सो सब सही है;
क० २--