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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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कवितावली ६
मोहित न हों उन्हें धिक्कार है । उस बालकके अञ्जन-रञ्जित मनोहर
नेत्र खञ्जन पक्षीके बच्चेके समान थे । हे सखि ! वे ऐसे जान
पड़ते थे मानो चन्द्रमाके भीतर दो समान रूपवाले नवीन नील-
कमल खिले हुए हों ।
पग नूपुर औ पहुँची करकंजनि मंजु बनी मनिमाल हिएँ ।
नवनील कलेवर पीत झँगा झलकै पुलकैं नृपु गोद लिएँ ॥
अरबिंदु सो आननु रूप मरंदु अनंदित लोचन-भृंग पिएँ ।
मनमो न बस्यौ अस बालकु जौं तुलसी जगमें फलु कौन जिएँ ॥२॥
उस बालकके चरणोंमें घुँघुरू, करकमलोंमें पहुँची और
गलेमें मनोहर मणियोंकी माला शोभायमान थी । उसके नवीन श्याम
शरीरपर पीला झँगुला झलकता था । महाराज उसे गोदमें लेकर
पुलकित हो रहे थे । उसका मुख कमलके समान था, जिसके रूप-
मकरन्दका पानकर [ देखनेवालोंके ] नेत्ररूप भौंरे आनन्दमग्न हो
जाते थे । श्रीगोसाईंजी कहते हैं—यदि मनमें ऐसा बालक न बसा
तो संसारमें जीवित रहनेसे क्या लाभ है ?
तनकी दुति स्याम सरोरुह लोचन कंजकी मंजुलताई हरैं ।
अति सुंदर सोहत धूरि भरे छबि भूरि अनंगकी दूरि धरैं ॥
दमकैं दँतियाँ दुति दामिनि ज्यौं किलक कल बालबिनोद करैं ।
अवधेसके बालक चारि सदा तुलसी-मन-मंदिरमें बिहरैं ॥३॥
उनके शरीरकी आभा नीलकमलके समान है तथा नेत्र कमल-
की शोभाको हरते हैं । धूलिसे भरे होनेपर भी वे बड़े सुन्दर जान
पड़ते हैं और कामदेवकी महती छबिको भी दूर कर देते हैं । उनके
नन्हे-नन्हे दाँत बिजलीकी चमकके समान चमकते हैं और वे