कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 12, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ें९ बालकाण्ड
धनुर्यज्ञ
छोनीमेंके छोनीपति छाजैं जिन्हें छत्रछाया
छोनी-छोनी छाए छिति आए निमिराजके ।
प्रबल प्रचंड बरिबंड बर वेष बपु
बरिबेकों बोले बैदेही वर काजके ॥
बोले बंदी बिरुद बजाइ बर बाजनेऊ
बाजे-बाजे बीर बाहु धुनत समाजके।
तुलसी मुदित मन पुर नर-नारि जेते
बार-बार हेरैं मुख औध-मृगराजके ॥ ८॥
जिनके ऊपर राजछत्रोंकी छाया शोभायमान है ऐसे पृथ्वीभरके
परन्तु उन सबको देख और विचारकर भी उसकी बुद्धि कुण्ठित हो गयी ।
अर्थात् उसे उस शोभाके योग्य कोई भी उपमा नहीं मिली।
काशी-नागरी-प्रचारिणी सभाकी प्रतिमें यों अर्थ है -
दस गुण माधुर्यके ( रूप, लावण्य, सौन्दर्य, माधुर्य, सौकुमार्य, यौवन,
सुगन्ध, सुवेष, स्वच्छता, उज्ज्वलता )
चार गुण प्रतापके ( ऐश्वर्य, वीर्य, तेज, बल ) ।
ऐश्वर्यके नौ गुण ( भाग्य, अदभ्रता, नियतात्मता, वशीकरण,
वाग्मित्व, सर्वज्ञता, संहनन, स्थिरता, वदान्यता ) ।
सहज या प्रकृतिके तीन गुण ( सौम्यता, रमण, व्यापकता ) ।
यशके इक्कीस गुण ( सुशीलता, वात्सल्य, सुलभता, गम्भीरता, क्षमा,
दया, करुणा, आर्द्रता, उदारता, आर्जव, शरण्यत्व, सौहार्द, चातुर्य,
प्रीतिपालकत्व, कृतज्ञता, ज्ञान, नीति, लोकप्रियता, कुलीनता, अनुराग,
निर्वहणता ) ।