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सर्वकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 8

ॐ
श्रीसीतारामभ्यां नमः
कवितावली
बालकाण्ड
रेफ आत्मचिन्मय अकल, परब्रह्म पररूप।
हरि-हर-अज-वन्दित-चरन, अगुण अनीह अनूप ॥ १ ॥
बालकेलि दशरथ-अजिर, करत सो फिरत सभाम।
पदनखेन्दु तेहि ध्यान धरि, विरचत तिलक बनाय ॥ २ ॥
अनिलसुवन पदपद्मरज, प्रेमसहित शिर धार।
इन्द्रदेव टीका रचत, कवितावली उदार ॥ ३ ॥
बन्दौं श्रीतुलसीचरन-नख अनूप दुतिमाल।
कवितावलि-टीका लसै कवितावलि-वरभाल ॥ ४ ॥
बालरूपकी झाँकी
अवधेसके द्वारें सकारें गई सुत गोद कै भूपति लै निकसे।
अवलोकि हौं सोच विमोचनको ठगि-सी रही, जे न ठगे धिक-से॥
तुलसी मन-रंजन रंजित-अंजन नैन सुखंजन-जातक-से।
सजनी ससिमें समसील उभै नवनील सरोरुह-से बिकसे ॥१॥
[ एक सखी किसी दूसरी सखीसे कहती है—] मैं सबेरे
अयोध्यापति महाराज दशरथके द्वारपर गयी थी। उसी समय
महाराज पुत्रको गोदमें लिये बाहर आये। मैं तो उस सकल-
शोकहारी बालकको देखकर ठगी-सी रह गयी; उसे देखकर जो