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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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कवितावली १४
जनकको पनु जयो, सबको भावतो भयो
तुलसी मुदित रोम-रोम मोद् माचहीं।
साँवरो किसोर गोरी सोभापर तृन तोरी
जोरी जियो जुग-जुग जुवती-जन जाचहीं ॥१४॥
नगरमें मनोहर नगाड़े और आकाशमें दुन्दुभियाँ बज रही हैं।
देवाङ्गनाएँ विमानोंपर चढ़ गा-गाकर नृत्य कर रही हैं। तीनों
लोकोंमें जय-जयकार छाया हुआ है। भगवान् रामके गलेमें जयमाला
सुशोभित है। देवतालोग भगवान्‌के सुन्दर रूपपर मुग्ध होकर
पुष्पोंकी वर्षा कर रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—महाराज
जनककी प्रतिज्ञा पूर्ण हुई, सब लोगोंकी अभिलाषा पूरी हो गयी;
अतः आनन्दके कारण उनके रोम-रोममें हर्ष भर गया है। युवतियाँ
उस श्यामसुन्दर कुमार और गौरवर्ण कुमारीकी शोभापर तृण तोड़कर
मनाती हैं कि यह जोड़ी युग-युग जीवित रहे।
भले भूप कहत भलें भदेस भूपनि सों,
लोक लखि बोलिये पुनीत रीति भाखी।
जगदंबा जानकी जगतपितु रामचंद्र,
जानि जियँ जोहौ जो न लागै मुहँ कारिखी ॥
देखे हैं अनेक ब्याह, सुने हैं पुरान-वेद,
बूझे हैं सुजान साधु नर-नारि पारिखी।
ऐसे सम समधी समाज न विराजमान,
रामु से न बर दुलही न सिय-सारिखी ॥१५॥
अच्छे राजालोग नीच राजाओंको भली प्रकार समझाकर कहते
हैं कि समाजको देखकर आर्योचित पवित्र ढंगसे बात कीजिये।