कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
About this granth
The Kaushika Sutra (कौशिक गृह्यसूत्रम्) is the domestic ritual manual of the Atharvaveda in the Shaunaka tradition. Besides the usual life-cycle rites and household offerings, it prescribes the use of Atharvan hymns for healing, averting harm, prosperity, building a house, rites concerning women and expiation of evil omens, which makes it a rich source for daily life, medicine and belief in the Vedic period.
This edition gives the sutras with the brief Sanskrit commentary of Darila and Keshava and a Hindi translation by Thakur Udaynarayan Singh, translator also of the Sarvadarshanasangraha and Surya Siddhanta. He published it from his Shastraprakash Bhavan at Mathurapur, Muzaffarpur (Bihar), and it was printed at the Jyotish Prakash Press, Benares. The dedication says the edition first printed in America was brought out in India with Hindi through the support of Babu Umashankar of Muzaffarpur.
A detailed Hindi table lists the rites section by section, from rites for intelligence and preparing consecrated water to house-building, pumsavana, a child's teething, and remedies for portents such as eclipses, famine and cholera.
An exact, line-by-line transcription of the page into Markdown in Unicode Devanagari:
रिक्षे सीद पृथिव्यां सीदोत्तरोऽहं भूयासमधरे मत्सपला
इति स्रुवं प्राग्दण्डं निदधाति ॥१०॥ विमुञ्चामि
ब्रह्मणा जातवेदसमग्निं होतारमजरं रथस्पृतम् । सर्वा
देवानां जनिमानि विद्वान् यथाभागं वहतु हव्यमग्नि-
रग्नये स्वाहेति समिधमादधाति ॥११॥ एधोऽसीति
द्वितीयां समिद्सोति तृतीयाम् ॥१२॥ तेजोऽसीति मुखं
विमार्ष्टि ॥१३॥ दक्षिणेनाग्निं त्रीन्विष्णुकमान् क्रमते
विष्णोः क्रमोऽसीति दक्षिणेन पादेनानुसंहरति सव्यम्
॥१४॥ सूर्यस्यावृतमित्यभिदक्षिणमावर्तते ॥१५॥ अग-
न्मस्वरित्यादित्यमीक्षते ॥१६॥ इन्द्रस्य वचसा वयं मित्र-
स्य वरुणस्य च । ब्रह्मणा स्थापितं पात्रं पुनरुत्थापयाम-
सीत्यपरेणा
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १५
परिषिञ्च्योदञ्चि हविरुच्छिष्टान्युद्वासयति ॥२०॥ पूर्ण-
पात्रं दक्षिणा ॥२१॥ नादक्षिणं हविः कुर्वीत यः कुरुते
कृत्यामात्मनः कुरुत इति ब्राह्मणम् ॥२२॥ अन्वाहार्यं
ब्राह्मणान् भोजयति ॥२३॥ यद्वै यज्ञस्यानन्वितं भवति
तदन्वाहार्येणान्वाहियते॥२४॥ एतदन्वाहार्यस्यान्वाहार्य-
त्वम् ॥२५॥ ईड्या वा अन्ये देवाः सपर्य्येण्या अन्ये देवाः।
ईड्या देवा ब्राह्मणाः सपर्य्येण्याः ॥२६॥ यज्ञेनैवेड्यान्
प्रीणात्यन्वाहार्येण सपर्य्येण्यान् ॥२७॥ तेऽस्योभे प्रीता-
यज्ञे भवन्तीति॥२८॥ इमौ दर्शपूर्णमासौ व्याख्यातौ॥२९॥
दर्शपूर्णमासाभ्यां पाकयज्ञाः ॥३०॥ अथाप्यपरो हवन-
योगी भवति ॥३१॥ कुम्भीपाकादेव व्युद्धारं जुहुयात्
का आधान करे एवं “सत्यं त्वर्तेन०” इत्यादि से जल का छीटा दे उत्तर
की ओर जल के साथ बची हवि को कर्त्ता स्वीकार करे । पुनः ब्रह्मा और
कर्त्ता के पोषणों के योग्य पूर्णपात्र ( धान्यादि से भरा ) दक्षिणा में देवे
॥१९॥२०॥२१॥ बिना दक्षिणा के हवन न करे। क्योंकि जो ऐसा करता
है वह मानो अपना नाश करता है—ऐसा ब्राह्मणग्रंथ का वचन है ॥२२॥
ब्राह्मणों को ओदनादि भोजन करावे ॥२३॥ जो पदार्थ यज्ञ के अनुकूल
होता है वही श्रद्धापूर्वक व्यवहृत होता है अर्थात् यज्ञार्थ लाया जाता है
॥२४॥ यह अन्वाहार्य्य का अन्वाहार्य्यत्व है ॥२५॥ ईड्य वा पूज्य अन्य
देवता होते हैं और सपर्य्येण्य अन्य देवता होते हैं ।। जिनमें यज्ञ से
सत्कार योग्य देवगण होते हैं और वस्त्र, भोजन, धन, सेवा आदि से
पूजने योग्य ब्राह्मण होते हैं। अतएव यज्ञों द्वारा देवगण को और भोजनादि
द्वारा ब्राह्मणों को प्रसन्न करना चाहिये । ये दोनों ही ( देव, ब्राह्मण )
यजमान द्वारा यज्ञ में प्रसन्न होते हैं तब ही यज्ञों का फल यजमान को
होता है ॥२६॥२७॥२८॥ इन दोनों दर्श और पौर्णमास का व्याख्यान हुआ
और दर्श पौर्णमास द्वारा पाकयज्ञ सब कहे गये ॥२९॥३०॥ इसके अन-
न्तर दूसरा भी हवन योग्य है अर्थात् आग्नेय और अग्नीषोमीय के अति-
रिक्त अन्य भी यज्ञ हैं ॥३१॥ कुम्भीपाक से ही लेकर आहुतियाँ देवे ॥
१६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
॥ ३२ ॥ अधिश्रयणपर्यग्निककरणाभिघारणोद्वासनालङ्क-
रणोत्पवनैः संस्कृत्य ॥३३॥ अथापि श्लोकौ भवतः ॥
आज्यभागान्तं प्राक् तन्त्रमूर्ध्वं स्विष्टकृता सह । हवींषि
यज्ञ आवापो यथा तन्त्रस्य तन्तवः । पाकयज्ञान् समा-
साद्यैकाज्यानैकबर्हिषः । एकस्विष्टकृतः कुर्यान्नानापि
सति दैवतेति ॥३४॥ एतेनैवामावास्यो व्याख्यातः ॥३५॥
ऐन्द्राग्नोऽत्र द्वितीयो भवति ॥ ३६ ॥ तयोर्व्यतिक्रमे
त्वमग्ने व्रतपा असि कामस्तदग्र इति शान्ताः ॥३७॥६॥
अश्नात्यनादेशे स्थालीपाकः ॥ १ ॥ पुष्टिकर्मसु सारू-
पवत्से ॥२॥ आज्यं जुहोति ॥३॥ समिधमादधाति ॥४॥
अधिश्रयण, पर्यग्निकरण, अभिघारण, उद्वासन, अलङ्करण, और
उत्पवन आदि संस्कार करके आहुति देवे ॥ ३२॥३३ ॥ यहाँ दो श्लोक
गोपथ ब्राह्मणों के हैं । आज्य भाग के अन्त के होम पूर्वतन्त्र स्विष्ट
कृत के सहित हवियों के यज्ञ, यह आवाप (प्रधान) है । और
जैसे तन्त्र की सन्तति वा सूत्र स्वरूप है। यदि पाक यज्ञ के करने
में ऐसा अवसर आ पड़े कि एक आज्य हो और अनेक बर्हि । (हवि
रखने के कुश के पात्र) हों तो एक ही स्विष्टकृत की आहुति करे ।
चाहे भिन्न २ अनेक दैवत हवन क्यों न हों ॥३४॥ इसीके द्वारा अमा-
वास्या में कर्त्तव्य ऐन्द्राग्नि की व्याख्या हुई जानो ॥३५॥ यहाँ ऐन्द्राग्न
दूसरा है जानो ॥३६॥ इन दोनों के व्यतिक्रम होने पर “त्वमग्ने व्रतपा
असि”, “कामस्तदग्र०” से शान्ता नाम की आहुति करनी चाहिये ॥३७॥
यह छठी कण्डिका पूरी हुई ॥ ६ ॥
इस संहिता विधि में जहाँ २ “अश्नाति” या “आशयति” करके कहा
गया है वहाँ २ स्थालीपाक की विधि जानना ॥ १ ॥ जैसे पुष्टि कर्मों में
“सारूपवत्सा” स्थालीपाक समझना ॥२॥ जहाँ “जुहोति” कहा गया है
परन्तु हवन करने का विधान नहीं किया गया वहाँ घृत समझना ॥३॥
जहाँ होम का विधान हो परन्तु होतव्य (किस वस्तु का होम करे
सो नहीं लिखा है) वहाँ आज्य की आहुति करे ॥ ३ ॥ जहाँ केवल
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १७
आवपति व्रीहियवतिलान् ॥ ५॥ भक्षयति क्षीरौ-
दनपुरोडाशरसान् ॥ ६॥ मन्थौदनौ प्रयच्छति ॥ ७॥
पूर्वं त्रिषप्तीयम् ॥ ८ ॥ उदकचोदनायामुदपात्रं प्रतीयात्
॥ ९॥ पुरस्तादुत्तरतः संभारमाहरति ॥ १० ॥ गोरनभि-
प्रापाद्वनस्पतीनाम् ॥ ११ ॥ सूर्योदयतः ॥ १२ ॥ पुरस्ता-
दुत्तरतोऽरण्ये कर्मणां प्रयोगः ॥ १३ ॥ उत्तरत्त उदकान्ते
प्रयुज्य कर्माण्यपां सूक्तैराप्लुत्य प्रदक्षिणमावृत्याप
उपस्पृश्यानवेक्षमाणाग्राममुदाव्रजन्ति ॥ १४॥ आश्यब-
न्ध्याप्लवनयानभक्ष्याणि सम्पातवन्ति ॥ १५ ॥ सर्वा-
ण्यभिमन्त्र्याणि ॥ १६ ॥ स्त्रीव्याधितावा पुतावसिक्तौ
समिद् का आधान लिखा है परन्तु यह नही लिखा है कि अमुककाष्ठ आदि
हो। वहाँ होम के योग्य काठ ग्रहण करना चाहिये ॥४॥ व्रीहि (धान्य),
जौ, और तिलों का आवपन करे अर्थात् अग्नि में डाल कर आहुति करे॥
॥५॥ जहाँ “भक्षयति” का विधि हो वहाँ क्षीरोदन, पुरोडाश, रसों को
भक्षण करे करावे ॥६॥ जहाँ “प्रयच्छति” का विधान हो वहाँ मन्थ
और ओदन देवे ॥७॥ “पूर्व त्रिषप्तीयम्” कहने से “ये त्रिषप्ता०” इस
सूक्त को लेवे ॥८॥ जहाँ उदक का संस्कार कहा गया हो वहाँ जलपात्र
का संस्कार समझना ॥९॥ निवास स्थान से संभार लाकर वेदि के
पूर्व उत्तर भाग में घरे ॥१०॥ जहाँ वनस्पतियों के पास के फूल, पत्र,
आदि लाने का विधान हो, और उसके मिलने में कठिनता हो तो
गौशाला के पास के वानस्पत्य के प्रयोजनीय अंश को लेवे ॥११॥ सूर्य
के उदय समय संभार आदि को लावे ॥१२॥ निवास स्थान के पूर्व या
उत्तर-जंगल में कर्म करे ॥१३॥ सब ही कर्म जल के उत्तर भाग में कर
के “अम्बयो यन्ति शम्भुमयो भू हिरण्यवर्णादयः कृष्णं नियानं सस्रुषी-
र्हिमवतः प्रस्स्रवन्ति वायोः पूतः०” ये जलसूक्त हैं। जलसूक्तों से नहा कर
परिक्रमा कर जल को स्पर्श कर के पीछे न देखते हुए ग्राम को
जावे ॥१४॥ “आश्य” आदि सबों में सम्पात् का अभिमंत्रण होता है।
यज्ञार्थ सब ही पदार्थों का अभिमंत्रण करे ॥१५॥१६॥ स्त्री, रुग्ण पुरुष,
३
१८ ़अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
शिरस्तः प्रक्रम्याप्रपदात्प्रमार्ष्टि ॥ १७ ॥ पूर्वं प्रपाद्य
प्रयच्छति ॥ १८ ॥ त्रयोदश्यादयस्तिस्रो दधिमधूनि
वासयित्वा बध्नाति ॥ १९ ॥ आशयति ॥२०॥ अन्वार-
ब्धायामभिमन्त्रणहोमाः ॥ २१ ॥ पश्चादग्नेश्चर्मणि
हविषां संस्कारः ॥ २२ ॥ आनडुहः शकृत्पिण्डः ॥२३॥
जीवघात्यं चर्म ॥२४॥ अकर्णोऽश्मा ॥२५॥ आप्लवनावसे-
चनानामाचामयति च ॥२६॥ सम्पातवतामश्नाति न्यङ्क्ते
वा ॥ २७॥ अभ्याधेयानां धूमं नियच्छति ॥ २८ ॥ शुचि-
ना कर्मप्रयोगः ॥२९॥७॥
पुरस्ताद्धोमवत्सु निशाकर्मसु पूर्वाह्ने यज्ञोपवीती
शालानिवेशनं समूहहत्युपवत्स्यद्भक्तमशित्वा स्नातोऽ-
हतवसनः प्रयुङ्क्ते ॥१॥ स्वस्त्ययनेषु च ॥ २॥ इज्यानां
इनमें से स्त्री तो जल में गोता लगाकर स्नान करे और रुग्ण पुरुष शिर
से पैर तक जल से मार्जन करे ॥१७॥ पहिले प्रपादन फिर मन्थौदन को
देवे ॥१८॥ और त्रयोदशी आदि तीन तिथियों में दही, मधु, यज्ञ कराने
वाले को कर्ता खिलावे और वासित को बान्ध देवे ॥१९॥ इसके
पश्चात् अग्नि के पास जो चर्म है, उसमें हवि का संस्कार करे ॥२०॥
बैल के गोमय का पिण्ड बनावे । बलवान् जीवित पशु के चर्म को अर्थात्
गोलाकार सींगवाले पशु के चर्म को लाकर घरे ॥२१॥२२॥२३॥२४॥२५॥
आप्लवन, अवसेचन, का कारयिता कर्ता से आचमन करावे ॥ २६ ॥
आहुति के सम्पात को आँखों में आञ्जे या खावे ॥ २७ ॥ अभ्याधेय
पदार्थों के धूम को कारयिता स्वयं ग्रहण करे ॥२८॥ और कर्मों की समाप्ति
में पवित्रता से कर्म का प्रयोग करे । नित्य, नैमित्तिक, काम्य कर्मों
को स्नान कर के करे ॥२९॥३०॥ यह सातवी कण्डिका समाप्त हुई ॥७॥
पुरस्ताद्धोमवाले निशाकर्मों में पूर्वाह्न में यज्ञोपवीती होकर अग्नि-
शाला में बैठकर अग्नि का समूहन करे । उपवास रहकर, भात खाकर,
नहाकर, अखण्ड चीरे दार नये वस्त्र धारण कर-कर्म करने में प्रवृत्त होवे
ऐसा कोई आचार्य मानते हैं ॥१॥ स्वस्त्ययन कर्मों में भी ऐसा ही करे
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १९
दिश्यान् बलीन् हरति ॥ ३॥ प्रतिदिशमुपतिष्ठते ॥ ४ ॥
सर्वत्राधिकरणं कर्तुर्द्दक्षिणा ॥ ५ ॥ त्रिरुदकक्रिया ॥६॥
अनन्तराणि समानानि युक्तानि ॥७॥शान्तं संभारम् ॥८॥
अधिकृतस्य सर्वम् ॥९॥ विषये यथान्तरम् ॥१०॥ प्रयच्छ
पर्शुमिति दर्भलवनं प्रयच्छति ॥ ११ ॥ अरातीयोरिति
तक्षति ॥१२॥ यत्त्वा शिक इति प्रक्षालयति ॥१३॥ यद्य-
त्कृष्ण इति मन्त्रोक्तम् ॥ १४ ॥ पलाशोदुम्बरजम्बुकाम्पी-
लस्रग्वङ्गशिरीषस्रक्त्यवरणबिल्वजङ्गिडकुटकगर्हगलावल-
वेतसशिम्बलसिपुनस्यन्दनारणिकाश्मयोक्ततुन्युपूतदार-
वः शान्ताः ॥ १५ ॥ चितिप्रायश्चित्तिशमीशमका-
॥२॥ स्वस्त्ययन याग देवताओं के लिये प्रत्येक दिशाओं में बलि, उपहार
देवे और प्रति दिशा में उपस्थान करे ॥३॥४॥ सब ही यज्ञकर्त्ता क
दक्षिणा देवे ॥५॥ विधि कर्मों में जहाँ २ जल से कर्म करने का विधान
हो वहाँ २ जल क्रिया तीन बार करे ॥६॥ संहिता में जो २ सूक्त
अनन्तर कहे गये हैं, जिनके प्रयोजन समान हों उनको एकत्र कर प्रयोग
करे ॥७॥ सब ही शान्तकर्मों में शान्तसम्भार, दर्भ, समिद्, आदि ।
अभिचार कर्मों में रौद्र, आङ्गिरस, सम्भार जानना ॥८॥ सुच्, स्रुव,
समिद्, काष्ठ आदि मणि, द्रव्य काष्ठ करना चाहिये । मादानक शृत
क्षीरोदन खावे । और मादानक के चमसा में एक रूप रंग के वत्स के
गौ के दूध में क्षीरौदन पकावे । मंत्र कर्म में जहाँ द्रव्य का सन्देह हो
वहाँ निकृष्ट द्रव्य ग्रहण करे ॥९॥१०॥ “प्रयच्छ पर्शु०” से दर्भ काटने
का अस्त्र देवे ॥ ११ ॥ “अरातीयोः” से उलूखल, मुसल, काठ, एवं
अन्य कार्य के लिये लकड़ी काटे, चीरे-फाड़े ॥१२॥ “यत्त्वाशिक”
से प्रक्षालन करे ॥१३॥ “यद्यत्कृष्णः” से उलूखल मुसल को प्रक्षा-
लन करे ॥१४॥ पलाश, उदुम्बर, जम्बु, काम्पील, स्रक्, वंघ, शिरीष,
स्रक्त्य, वरण, बिल्व, जङ्गिड़, कुटक, गर्ह, गलावल, वेतस, शिम्बल,
सिपुन, स्यन्दन, अरणिकाष्ठ, अश्मयोक्त, तुन्यु, पूतदारु ये शान्त कर्म में
प्रयोजनीय हैं ॥१५॥ चिति, प्रायश्चित्ति, शमी, शमका, सवंशा, शाम्य-
' or 'प्रियङ्ग'?
Look at line 7:
प्रि - य - ङ्गु - श्या -
Wait, is the 'ु' there? Look at the bottom of 'ङ्ग': it curves down-left, exactly like 'ु'!
Wait, compare it with 'ङ्ग' without u: 'ङ्ग' normally ends with the bottom curve of 'ग'. But here it goes further down and loops!
Wait, look at line 8: "माका इति मिश्रधान्यानि ॥ २० ॥"
So the word is "श्यामाकाः" or "श्यामाका"!
And before it: "प्रियङ्गु" or "प्रियङ्ग"?
In Hindi: "प्रियङ्गु, श्यामा"!
Wait, look at the Sanskrit: "प्रियङ्गश्या-" or "प्रियङ्गुश्या-"?
Wait, in Hindi line 16: "प्रियङ्गु, श्यामा इन"
In Sanskrit: "प्रियङ्गश्या-" vs "प्रियङ्गुश्या-":
Look at the character: प्रि - य - ङ्ग - श्या. Wait, does it have an u-mātrā?
Look at 'ङ्गु' in line 7: wait, is there a 'ु'? Yes, there is a distinct loop/tail at the bottom of 'ग'!
Wait, but look at 'तल':
Could it be "व्रीहियवगोधूमोपवाकातलप्रियङ्गश्या-" or "व्रीहियव
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २१
अम्बयो यन्ति शम्भुमयो भू हिरण्यवर्णा निस्सालां
ये अग्नयो ब्रह्म जज्ञानमित्येका तदेव मृगारसूक्तानि ॥१॥
उत्तमं वर्जयित्वाऽप नः शोशुचदघं पुनन्तु मा सस्रुषोर्हि-
मवतः प्रस्रवन्ति वायोः पूतः पवित्रेण शं च नो मयश्च
नोऽनडुह्यस्थवं प्रथमं मह्यमापो वैश्वानरो रश्मिभिर्यमो
मृत्युविश्वजित्संज्ञानं नो यद्यन्तरिक्षे पुनर्मैत्विन्द्रियं
शिवा नः शं नो वातो वात्वग्निं ब्रूमो वनस्पतीनिति ॥ २॥
पृथिव्यै श्रोत्रायेतिन्त्रिः प्रत्यासिञ्चति ॥३॥ अम्बयो यन्ति
शम्भुमयो भू हिरण्यवर्णाः शांतातीयं शिवा नः शं नो
वातो वात्वग्निं ब्रूमो वनस्पतीनिति ॥४॥ पृथिव्यै श्रोत्रा-
येति त्रिः प्रत्यासिञ्चति ॥५॥ इति शान्तियुक्तानि ॥६॥
उभयतः सावित्र्युभयतः शं नो देवी ॥७॥ अहतवासाः
कंसे शान्त्युदकं करोति ॥ ८ ॥ अतिसृष्टो अपां वृषभ
इत्यपोऽतिसृज्य सर्वा इमा आप ओषधय इति पृष्ट्वा
“अम्बयो यन्ति” इत्यादि एक और “अग्नेर्मन्व०” इत्यादि ये “मृगार
सूक्त” हैं ॥१॥ पहिले को छोड़ कर “अपनः” इत्यादि यह मृगारसूक्त है
“पृथिव्यै श्रोत्राय” से तीन बार आसिंचन करे ॥२॥३॥ “अम्बयो यन्ति
इत्यादि शान्तिगण हैं । इन सब सूक्तों से कौशिक का कहा बृहत् शान्ति-
गण है ॥४॥ “पृथिव्यै श्रोत्रियाय”० से तीन बार प्रत्यासिञ्चन् करे
अर्थात् शान्त्युदक के मध्य में शान्ति जल डाले फिर “पृथिव्यै श्रोत्राय”
से अग्नि का पर्युक्षण करे । पूर्व गण को शांतियण कहते हैं, और उत्तर
भी शान्ति शब्द वाच्य हैं-दोनों की संज्ञा-पूर्वोत्तरा है ॥ शान्ति के आदि
एवं अन्त में “सावित्री” और “शन्नो देवी” पढ़ना चाहिये ॥५॥६॥७॥
अखण्ड चीरेदार नये वस्त्र पहन कर काँसे के पात्र में शान्ति के जल
को करे “अतिसृष्टो” इत्यादि से जल छोड़कर । ओषधियों के लाने
वाले से कर्ता पूछे कि ‘ये सब ओषधियाँ हैं ? आ० कहे “सब है।”
तब कर्ता ब्रह्मा से पूछे कि ये सब जल ओषधियाँ हैं ? ब्रह्मा जल को
२२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
सर्वा इत्याख्यात ओं बृहस्पति प्रसूतः करवाणीत्यनु-
ज्ञाप्यों सवितृप्रसूतः भवानित्यनुज्ञातः कुर्वीत ॥९॥
पूर्वया कुर्वीतेति गार्ग्यपार्थश्रवसभागलिकाङ्कायनोपरि-
बभ्रवकौशिकजाटिकायनकौरुपथयः ॥ १० ॥ अन्यत-
रया कुर्वीतेति युवा कौशिको युवा कौशिकः ॥११॥९॥
इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥१॥
पूर्वस्य मेधाजननानि ॥१॥ शुकसारिकृशानां जिह्वा
बध्नाति ॥२॥ आशयति ॥३॥ औदुम्बरपलाशकर्कन्धूना-
मादधाति ॥४॥ आवपति ॥५॥ भक्षयति ॥६॥ उपाध्यायाय
भैक्ष्यं प्रयच्छति ॥ ७॥ सुप्तस्य कर्णमनुमन्त्रयते ॥ ८ ॥
उपसीदञ्जपति ॥९॥ धानाः सर्पिर्मिश्राः सर्वहुताः ॥१०॥
छूकर कहे-हाँ सब है । सब क्या ? चित्यादि सब मिल कर सब ओष-
धियों सहित गंगादिके सब नदियों का जल है । "ओं बृहस्पतिप्रसूतः
करवाणि" ऐसी मुझे अनुज्ञा हो "सवितृप्रसूतः भवानि" अनुज्ञा पाने
पर करो ॥ "बृहस्पति प्रसूतः" से करे यह मत गार्ग्य, पाथे, श्रवस,
भागलि, काङ्कायन, उपरि बभ्रव, कौशिक, जाटिकायन, कौरुपथि का है।
"सवितृप्रसूतः" से करे यह मत युवा कौशिक का है ॥८॥९॥१०॥११॥
यह नवमी कण्डिका समाप्त हुई ॥९॥ यह अथववेद के कौशिक सूत्र के
प्रथमाध्याय का भाषानुवाद समाप्त हुआ ॥१॥
पूर्व के (त्रिषप्रीयासूक्त) अनुवाक से मेधा जनन कर्म करे ॥१॥
मेधा चाहने वाले कंटारिका के पत्ते को "अयं मे वरण उरसि०" और
आज्यादि सूक्त से आज्याहुति के संपात से होमकर अपने गले में बाँधे
॥२॥ और कर्त्ता मेधा चाहने वाले को खवावे ॥३॥ उदुम्बर, पलाश,
बैर के बड़े फल, इनको लावे ॥४॥ और उसे आवपन करे ॥५॥ ये त्रि-
षप्ता०" इस सूक्त से क्षीरौदन खावे और रस को प्राशन करे ॥६॥
"ये त्रिषप्ता०" सूक्त से उपनयन के अनन्तर-ब्रह्मचारी-एकत्रित की हुई
भिक्षा को अभिमन्त्रण कर अध्यापक को समर्पण करे ॥७॥ रात में सोते
हुए अध्यापक के कान में अभिमंत्रण करे ॥८॥ जब २ उपाध्याय घर
तिलमिश्रा हुत्वा प्राश्नाति ॥ ११ ॥ पुरस्तादग्नेः कल्माषं
दण्डं निहत्य पश्चादग्नेः कृष्णाजिने धाना अनुमन्त्रयते ॥१२॥
सूक्तस्य पारं गत्वा प्रयच्छति ॥१३॥ सकृज्जुहोति ॥१४॥
दण्डधानाजिनं ददाति ॥१५॥ अहं रुद्रेभिरिति शुक्ल-
पुष्पहरितपुष्पे किंस्त्यनाभिपिप्पल्यौ जातरूपशकलेन
प्राक्स्तनग्रहात् प्राशयति ॥ १६॥ प्रथमप्रवदस्य मातु-
रुपस्थे तालुनि सम्पातानानयति ॥ १७ ॥ दधिमध्वाश-
यति ॥ १८ ॥ उपनीतं वाचयति वार्षशतकं कर्म ॥१९॥
त्वं नो मेघे द्यौश्च म इति भक्षयति ॥ २० ॥ आदित्य-
मुपतिष्ठते ॥२१॥ यदग्ने तपसेत्याग्रहायण्यां भक्षयति
॥ २२ ॥ अग्निमुपतिष्ठते ॥२३॥ प्रातरग्निं गिरावर्गराटेषु
को जाया करे तब २ ब्रह्मचारी जप किया करे ॥९॥ लावा, घी, मिला-
कर हवन करे ॥१०॥ तिल रें., घी मिलाकर हवन कर शेष हवि को
प्राशन करे ॥११॥ काले रंग के दण्ड को अग्नि के पीछे धर कर काले
रंग के मृग चर्म पर धाना धर कर उस का अनुमंत्रण करे ॥१२॥ सूक्त
को पढ़ लेने पर देवे ॥१३॥ धान को अजिन के द्वारा एक बार आहुति
देवे ॥१४॥ और उपाध्याय के लिये दण्ड धान अजिन देवे ॥१५॥ “अहं
रुद्रेभिः” इत्यादि से शंखपुष्पिका, अन्धपुष्पिका, शंखनाभि, पिप्पली
को सोने के शलाका से घस कर माँ के दूध पीने के पहिले बालक को
चटावे ॥ और बच्चे को भली भाँति वर्चस्वी बनाने के लिये और
मेधावि बनाने वाला पहिले माता के गोद में बच्चे को देकर “अहं रुद्रेभिः”
सू० से पाँच कर्मों को जात कर्म में करे और सम्पात को तालु पर डाले
॥१६॥१७॥ और दही मधु मिलाकर बच्चे को चटावे ॥१८॥ और बालक
के पास “अहं रुद्रेभिः” सूक्त एवं “आयातु मित्र” इत्यादि गण के अन्त के
वचन को पढ़े—जो बच्चे की आयुः सौ वर्ष की चाहे वह इस कर्म को करे
॥१९॥ “त्वं नो मेघे०” मंत्रों से भक्षण करावे ॥२०॥ आदित्य का उपस्थान
करे ॥२१॥ “यदग्ने तपसे०” इत्यादि से आग्रयण की पौर्णमासी को मेधा-
जनन कर्म कर के और बच्चे को शेष हवि भक्षण करावे ॥ २२ ॥ और
२४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
दिवस्पृथिव्या इति संह्राय मुखं विमार्ष्टि ॥२४॥१॥१०॥
पूर्वस्य ब्रह्मचारि साम्पदानि ॥१॥ औदुम्बर्यादयः ॥२॥
ब्रह्मचार्यावसथादुपस्तरणान्यादधाति ॥३॥ पिपीलिकोद्वापे
मेदोमधुश्यामाकेषीकतूलान्याज्यं जुहोति ॥ ४ ॥ आज्य-
शेषे पिपीलिकोद्वापानोप्य ग्राममेत्य सर्वहुतान् ॥ ५ ॥
ब्रह्मचारिभ्योऽन्नं धानास्तिलमिश्राः प्रयच्छति ॥६॥ एता-
निग्रामसाम्पदानि ॥ ७ ॥ विकारस्थूणामूलावत्तक्षणानि
समानामुपस्तरणानि ॥८॥ ग्रामीणेभ्योऽन्नम् ॥९॥ सुरां
सुरापेभ्यः ॥ १० ॥ औदुम्बर्यादीनि भक्षणान्तानि सर्व-
साम्पदानि ॥११॥ त्रिज्योतिःकुरुते॥१२॥ उपतिष्ठते॥१३॥
सव्यात्पाणिहृदयाल्लोहितं रसमिश्रमश्नाति ॥ १४॥
पृश्निमन्थः ॥ १५ ॥ जिह्वाया उत्साद्यमक्ष्योः परिस्तरण-
अग्नि का उपस्थान करे ॥२३॥ "प्रातरग्नि०" इत्यादि पढ़ कर सोते से उठ
कर मुख का प्रक्षालन करे ॥२४॥ १॥ यह दशमी कण्डिका पूरी हुई ॥१०॥
पौर्णमासी को निर्ऋति कर्म करके एक वार प्रातःकाल में ब्रह्मचारी
"त्रिषप्तीय०" सूक्त से साम्पद् कर्म करे ॥ उदुम्बर आदि १०।४
सूत्रोक्त अग्नि का आधान करे ॥२॥ ब्रह्मचारी अपने घर से तृणादि को
लाकर आधान करे ॥३॥ चूँटियों से फेकी वा निकाली हुई मट्टी के छिद्र
में मेद, मधु, श्यामक, शरपुष्प इनको आज्य के साथ आहुति देवे ॥४॥
आज्य शेष में पिपीलिका की मट्टी को थाली में धर कर ग्राम में आकर
एक वार हवन करे ॥५॥ ब्रह्मचारियों के लिये अन्न, और तिल मिला धान
देवे ॥६॥ पूर्व दिन में निर्ऋति कर्म करके ग्राम साम्पद् का अधिकार
होता है। समिद् का विकार, स्थूणा (खूँटी) के जड़, इनके अवतक्षण
(चीर, फाड़, कर, ) को यज्ञ के उपस्तरण करे ॥७।८॥ ग्रामीणों को
अन्न, सुरा पीने वाले को सुरा देवे ॥९।१०॥ औदुम्बर, पलाश, बैर
आदि और क्षीरौदन, पुरोडाश, रस ये सर्वकामनाओं के लिये हैं ॥११॥
तीनवार ज्योतिःकरै ॥१२॥ तब उपस्थान करे ॥१३॥ सव्य हाथ से लाल
सहजन को पानी में मिलाकर खावे ॥१४॥ गौ का मट्ठा ॥१५॥ मस्तु
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५
मस्तृहणं हृदयं दूशं उपनह्य तिस्रो रात्रीः पल्पूलने
वासयति ॥१६॥ चूर्णानि करोति ॥१७॥ मैश्रधान्ये मन्थ
ओप्य दधिमधुमिश्रमश्नाति ॥ १८ ॥ अस्मिन् वसु यदा
बध्नन्नव प्राणानिति युग्मकृष्णलं वासितं बध्नाति ॥१९॥
सारूपवत्सं पुरुषगात्रं द्वादशरात्रं सम्पातवन्तं कृत्वा-
˙नभिमुखमश्नाति ॥ २० ॥ २ ॥ ११ ॥
कथं मह इति मादानकश्रुतं क्षीरौदनमश्नाति ॥१॥
चमसे सरूपवत्साया दुग्धे व्रीहियवाववधाय मूर्च्छयि-
त्वा मध्वासिच्याशयति ॥ २ ॥ पृथिव्यै श्रोत्रायेति
जुहोति ॥३॥ वत्सो विराज इति मन्थान्तानि ॥४॥ सहृ-
दयं तदू षु संजानीध्वमेह यातु·सं वः पृच्यन्तां सं वो
मनांसि संज्ञानं न इति सांमनस्यानि ॥ ५ ॥ उदकुलिजं
संम्पातवन्तं ग्रामं परिहृत्य मध्ये निनयति ॥६॥ एवं सुरा-
लङ्कक में धूलक आदि को पुराने वस्त्र में बांधकर तीन रात तक गौ के
गोबर में वासे और चौथे दिन पुराने वस्त्र सहित को चूर्ण करे ॥ और
मैश्रधान्ये में मथन को डालकर दधि, मधु मिलाकर खावे ॥१॥१६॥१७॥१८॥
“अस्मिन्वसु यदा बध्नन्नव प्राणान् इस मंत्र से उक्त प्रतीकों में कृष्णमणि
को वास कर सब कामना सिद्धि चाहने वाला इस को हाथ या गले में
बांधे ॥१९॥ एक वर्ण बच्चे वाली गौके दूध में पके ओदन को पुरुषाकृति
बनाकर १२ दिन तक उस पर दूध में पके ओदन को ढारे ॥२०॥२॥११॥
दूसरी कण्डिका पूरी हुई ॥२॥
सम्पत्ति चाहने वाला “कथमहं” इत्यादि मादानक वृक्ष के काठ से
पके क्षीरोदन को खावे ॥१॥ चमसा में सरूप वत्सा गौ के दूध में
व्रीहि, यव डालकर मूर्च्छना देकर उस में मधु देकर खावे ॥२॥ और
“पृथिव्यै श्रोत्राय०” से आहुति देवे॥३॥ “त्रिज्योतिः कुरुते” इत्यादि से
पृश्निमंथ-तक कर्म्म होते हैं ॥४॥ “सहृदयम्०” इत्यादि से सांमनस्य
कर्म कहे गये हैं ॥५॥ चूने वाले घड़े को बनाकर गाँव में भ्रमण करावे
४
२६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
कुलिजम् । ७॥ त्रिहायिण्या वत्सतर्याः शुक्तानि पिशिता-
न्याशयति ॥८॥ भक्तं सुरां प्रपां सम्पातवतूकरोति ॥९॥
पूर्वस्य ममाग्ने वर्च इति वर्चस्यानि ॥१०॥ औदुम्बर्यादीनि
त्रीणि ॥ ११ ॥ कुमार्या दक्षिणमूरुमभिमन्त्रयते ॥१२॥
वपां जुहोति ॥ १३॥ अग्निमुपतिष्ठते ॥ १४ ॥ प्रातरग्निं
गिरावरगराटे षु दिवस्पृथिव्या इति दधिमध्वाशयति
॥१५॥ कीलालमिश्रं क्षत्रियं कीलालमितरान् ॥१६॥३।१२॥
हस्तिवर्चसमिति हस्तिनम्। १॥हास्तिदन्तंबध्नाति।२।
लोमानि जतुना संदिह्य जातरूपेणापिधाप्य ॥३॥ सिंहे
व्याघ्रे यशो हविरिति स्नातकसिंहव्याघ्रबस्तकृष्णवृषभराजां
नाभिलोमानि॥४॥दशानां शान्तवृक्षाणां शकलानि॥५॥
[L13
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २७
सप्तमर्माणि स्थालीपाके पृक्तान्यश्नाति ॥६॥ अकुशलं
यो ब्राह्मणो लोहितमश्नीयादिति गार्ग्यः ॥७॥ उक्तो
लोममणिः ॥८॥ सर्वैराप्लावयति ॥६॥ अवसिञ्चति ॥१०॥
चतुरङ्गुलं तृणं रजोहरणं बिन्दुनाभिश्रोद्ध्योवमध्य ॥११॥
शुनि किलासमजे पलितं तृणे ज्वरो यो ऽस्मान्द्वेष्टि यं च
वयं द्विष्मस्तस्मिन् राजयक्ष्म इति दक्षिणा तृणं निरस्य-
ति गन्धप्रवादाभिरलंकुरुते ॥१२॥४॥१३॥
पूर्वस्य हस्तित्रसनानि ॥१ रथचक्रेण सम्पातवता-
खावे ॥६॥ इस रुधिर को जो ब्राह्मण खावे उसका कल्याण नहीं होता है
ऐसा गार्ग्य—कहते हैं ॥७॥ लोमणि के विषय में कहा गया ॥८॥ यह
कर्म क्षत्रियों के लिये है ब्राह्मण के लिये नहीं ॥८॥ पाँच प्रतीकों से
( मंत्रों से ) जल से नहवा कर, जलसे उस को सेक करे ॥९॥१०॥ चार
अङ्गुल परिमाण के तृण को—"रजउदक” कहते हैं । जिस के द्वारा धूलि
निकल जाती है। आकाश के जल ( मेघ-का पानी ) द्वारा किसी पात्रमें
नीचे छिद्रकर के उस में चार अङ्गुल वाला तृण लटका देवे और तृण के
नीचे दूसरा जलपात्र धर देवे जिस में शुद्ध जल गिरेगा। "शुनि किलास
समये" इत्यादि मंत्र से उस शुद्ध जल को मथकर तृण को दक्षिण दिशा में
फेक देवे एवं यस्ते गन्धः" इत्यादि तीन ऋचाओं से यक्ष्मा रोग वाले के
शरीर में सुगन्धित-पदार्थ उस जल में मिलाकर नित्य अनुलेपन करे
तो रोग छूट जावेगा ॥९॥१०॥११॥१२॥४॥१३॥ यह तेरहवीं कण्डिका
पूरी हुई ॥१३॥
अब राज कर्मों को कहेगे ॥ इन में से युद्ध सम्बन्धि कर्मों के तंत्र
को पहिले कहेंगे ॥१॥ अश्वत्थ वधक के वृक्ष के काठ की अरणियो द्वारा
अग्नि मन्थन कर "इन्द्रो मन्थतु" ० इत्यादि मंत्र से मन्थन करते हुए
अनुमंत्रण करे और "पूति रज्जूः”० इत्यादि आधी ऋचा से अग्नि गिरने
के स्थान में रज्जु को धरे । 'धूर्म परादृश्य०" आधी ऋचा से उत्पन्न अग्नि
को अनुमंत्रण करे । इस अग्निका नाम "सेनाग्नि" है ॥ अव्यचसश्च०”
सेना अग्नि का प्रणयन, ग्रहण, पंच गृहीत आज्य । अभ्यातानान्त आहु-
तियाँ करके लाल अश्वत्थ की शाखा को उत्तर भाग में रोपन कर
२८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
प्रतिप्रवर्तयति ॥२॥ यानेनाभियाति ॥३॥ वादित्रैः ॥४॥
दृतिवस्त्योरोप्य शर्कराः ॥५॥ तोत्रेण नग्नप्रच्छन्नः ॥६॥
विद्मा शरस्य मा नो विदन्नदारसृत्स्वस्तिदा अवमन्यु-
र्निर्हस्तः परिवर्त्मान्यभिभूरिन्द्रो जयात्यभित्वेन्द्रोति सा-
ङ्ग्रामिकानि ॥७॥ आज्यसक्तूञ्जुहोति ॥८॥ धनुरिध्मे
धनुःसमिधमादधाति ॥६॥ एवमिष्विध्मे ॥१०॥ धनुःस-
म्पातवद्विमृज्य प्रयच्छति ॥११॥ प्रथमस्येषुपर्ययणानि
॥१२॥ द्रुघ्न्यार्त्तीज्यापाशत्तृणमूलानि बध्नाति ॥१३॥ आ-
प्रधान कर्म करे। इस के अनन्तर उत्तर तंत्र में विशेषता है। संनति
होमांत तक करके "इमे जयंतु स्वाहेभ्य०" इत्यादि मंत्र से आज्य की आहुति
देवे। पश्चात् वधक काष्ठ प्रज्वलित अग्नि में बायें हाथ से इङ्गिड की
'पराभिजयन्तादुराहामोभ्यः ओं स्वाहेति" मंत्र से आहुति देवे। तब
शाखाओं पर दक्षिणा में- "नीललोहितेनामून्" मंत्र से डाले स्विष्ट-
कृत् आदि उत्तर तंत्र-हुआ। यह सांग्रामिकतंत्र है। सांग्रामिक तंत्रों
में सब जगह मंत्रों का उच्चारण ऊंचे स्वर से होगा परन्तु प्रधान
मंत्रों ही को ऊंचे स्वर से बोलना चाहिये ॥ अब शत्रु के हाथियों को
डराने के कर्मों का विधि कहेंगे ॥१॥ शत्रु सेना के हाथियों को युद्ध
में प्रवर्त्तमान के सम्मुख राजा अपनी सेना की हस्तिनियों को आगे करे
और रथचक्र के आगे हाथियों को प्रवृत्त करे घोड़े आदि को सम्पात् से
संस्कृत करके शत्रु सैन्य के सम्मुख करे ॥ पुरोहित बाजों के (भेरी,
मृदङ्ग झलरि आदि) साथ जावें, दृति (चमड़े का मोट) अनुवासना
चर्म इन दोनों में शर्करा (अस्त्र विशेष) को डाल कर हाथी पर प्रतोद
लेकर लग्न हो छिपाकर, हाथी को अङ्कुशादि से दण्ड देकर आगे शीघ्र
चलावे ॥२॥३॥४॥५॥६॥ "विद्मा शरस्य०" इत्यादि सूक्तों से आज्य
आहुतियाँ देवे ॥८॥ प्रादेशमात्र लम्बी सरपत की इध्म अग्नि में डाले
॥१०॥ और धनुष को सम्पात की तरह करके (अग्नि पर झुका कर)
राजा को देवे ये विजय कर्म समाप्त हुए ॥ इन कर्मों से शत्रु से न लड़ने
पर भी विजय होता है क्योंकि शत्रु सेना इन कर्मों को देखते ही
भाग जायेगी॥११॥ इषु निवारण कर्म को कहते हैं। द्रुघ्नी, आर्त्ती, ज्या,
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २९
रेऽसावित्यपनोदनानि ॥१४॥ फलीकरणतुषबुसावतक्ष-
णान्यावपति ॥१५॥ अन्वाह ॥१६॥ अग्निर्नः शत्रूनग्निनों
दूत इति मोहनानि ॥१७॥ ओदनेनोपयम्य फलीकर-
णानुलूखलेन जुहोति ॥१८॥ एवमणून् ॥१९ एकविंश-
त्या शर्कराभिः प्रतिनिष्पुनाति ॥२०॥ अप्वां यजते
॥२१॥ संशितमिति शितिपदीं सम्पातवतीमवसृजति
॥२२॥ उद्वहत्सुयोजयेत् ॥२३॥ इममिन्द्रेति युक्तयोः
प्रदानान्तानि ॥२४॥ दिग्युक्ताभ्यां नमो देववधेभ्य
इत्युपतिष्ठते ॥२५॥ त्वया मन्यो यस्ते मन्यो इति संर-
म्भणानि ॥२६॥ सेने समीक्षमाणो जपति ॥२७॥ भाङ्ग-
पाश, इन तृणों में किसी एक की जड़ को बांधे इस का फल शत्रु प्रयुक्त
शस्त्र
३० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मौञ्जान् पाशानिङ्गिडालंकृतान् सम्पातवतोऽनूक्तान्सेना-
क्रमेषु वपति ॥२८॥ एवमामपात्राणि ॥२९॥ इङ्गिडेन
संप्रोक्ष्य तृणान्याङ्गिरसेनाग्निना दीपयति ॥३०॥ यां धूमो
ऽवतनोति तां जयन्ति ॥३१॥५॥१४॥
ऋधद्धान्त्रस्तदिदासेत्याश्वत्थ्यां पात्र्यां त्रिवृतिगो-
मयपरिचये हस्तिपृष्ठे पुरुषशिरसि वामित्राञ्जुह्वदभि-
प्रक्रम्य निवपति ॥१॥ वराहविहिताद्राजानो वेदिं कुर्व-
न्ति ॥२॥ तस्यां प्रदानान्तानि ॥३॥ एकेष्वाहतास्यादहन
उपसमाधाय दीर्घदण्डेन स्रुवेण रथचक्रस्य खेन समधा
जुहोति ॥४॥ योजनीयां श्रुत्वा योजयेत् ॥५॥ यदि
चिन्जु त्वा नमो देववधेभ्य इत्यन्वाह ॥६॥ वैश्याय प्रदाना-
हारती हुई देख कर जप करे ॥२७॥ और भाङ्ग मौञ्जपाशों को इंगिड से
अलंकृत करके सम्पात वान् करके जिस ओर सेना आक्रमण करती
हो, उसी प्रदेश में डाले ॥२८॥ इसी प्रकार कच्चे पात्रों को डाले ॥२९॥
इङ्गिड से संप्रोक्षण कर शर तृणों को चाण्डालाग्नि से जलावे ॥३०॥
जलाने पर धूम जिस सेना को ढाक लेवे उसकी हार समझो ॥३१॥
यह चौदहवी कण्डिका समाप्त हुई ॥५॥१४॥
“ऋधद्धान्त्रस्तदिदाम०” इत्यादि मंत्र से तीन बार धरे हुए अश्वत्थ
की पात्री हाथी के पीठ पर या पुरुष के शिर पर धर कर उसमें शत्रुओं
के प्रति हवन करता हुआ धावा करे और पैदल चलने वाले पुरुष के
शिर पर पात्री को धर कर उसमें भी आहुतियाँ करता जावे ॥१॥ यह
जय कर्म है॥ सूकर द्वारा निकाली हुई मिट्टी से राजा लोग यज्ञ वेदि
बनावें और उस में प्रदानान्त मंत्रों को पढ़ कर हवन करें ॥३॥ संग्राम
में एक बाण से मरे हुए को दहन करने पर्य्यन्त इध्मों का आधान कर
ने पर चक्र को रख कर बड़े दण्डे वाले स्रुव से रथ चक्र के छिद्र द्वारा
पास ही आहुति देवे ॥४॥ और शत्रु सैन्य की तय्यारी देख कर अपनी
सेना को धावा बोल देवे ॥५॥ पर सैन्य को लक्ष्य कर यदि “चिनुत्वा
नमो देव वधेभ्यः” इस को प्रति दिन जप करें ॥६॥ वैश्य राजा प्रदानान्त
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३१
न्तानि ॥७॥ त्वया वयमित्यायुधिग्रामण्ये ॥८॥ नि तह-
धिष इति राज्ञोदपात्रं द्वौ द्वाववेक्षयेत् ॥६॥ यन्न पश्येन्न
युध्येत ॥ १० ॥ नि तद्दधिषे वनस्पते ऽद्याविष्ठाग्न इन्द्रो
दिशश्चतस्र इति नवं रथं राजानं ससारथिमास्थापयति
॥११॥ ब्रह्म जज्ञानमिति जोवितविज्ञानम् ॥१२॥ तिस्रः
स्नाव्रज्जूरङ्गारेष्ववधाय ॥१३॥ उत्कुचतीषु कल्याणम्
॥१४॥ साङ्ग्रामिकमेता व्यादिशति मध्ये मृत्युरितरे सेने
॥१५॥ पराजेष्यमाणान्मृत्युरतिवर्तते ज्येष्यन्तो मृत्युम्
॥१६॥ अग्रेषूत्कुचत्सु मुख्या हन्यन्ते मध्येषु मध्या
अन्तेष्ववरे ॥१७॥ एवमिषीकाः ॥१८॥६॥१५॥
तक करे ॥७॥ “त्वयावयं०” इत्यादि अस्त्र पर ग्राम में करें ॥८॥ अपनी
सेना का जय पराजय और पुरुषों के मारे जाने की शंका में इसका
विज्ञान यह है कि राजा अपने जलपात्र को अभिमंत्रण करके दो २
योद्धाओं को राजा देखे जिसको न देखे अर्थात् रहते हुए जो न दीख
पड़े उसको न लड़ने देवे ॥९॥१०॥” नितद्दधिषे०” इत्यादि मंत्र पढ़
कर नये रथ को तय्यार कर पुरोहित राजा को उस पर सवार करावे
॥११॥ रोगी पुरुप के अच्छा होने का ज्ञान होने की विधि-पुरोहित
“ब्रह्मजज्ञानं०” इत्यादि से जीवित ज्ञान के लिये कि यह रोगी जीवित
रहेगा या नहीं ? इस संशय में तत्त्व जानने की चिन्ताकरके चमड़े के
ताँत की तीन रज्जू को आग में डाल कर चिन्ता करे कि यह जीयेगा या
नहीं ? यदि अङ्गार में की ज्वाला ऊपर को उठे तो जानना यह रोगी
जीवेगा ॥१४॥ अब सांग्रामिक विधान को कहते हैं-तीन रज्जुओँ में से
एक अपनी सेना की रज्जू दूसरी मध्य में मृत्यु सूचक तीसरी रज्जू पर
सेना सूचक हो । इस प्रकार संकल्प करके आग में तीनों रज्जुओं को
डालकर जिसके ऊपर मृत्यु वाली रस्सी जावे उसकी सेना का जय होगा
॥१५॥१६॥ मृत्यु रज्जुके आगे सरपत की तीन इषिका अग्नि में डाले
यदि पहिली इषिका-जल कर ऊपर को उठे तो सेना के प्रधानों की मृत्यु
जानो, मध्यम इषिका फल-सेना के मध्यम पुरुषों की मृत्यु जानो
३२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
उच्चैर्घोष उपश्वासयेति सर्ववादित्राणि प्रक्षाल्य
तगरोशीरेण संधाव्य सम्पातवन्ति त्रिराहृत्य प्रयच्छति
॥१॥ विहृदयमित्युच्चैस्तरां हुत्वा स्रुवमुद्धर्तयन् ॥ २ ॥
सोमांशं हरिणचर्मण्युत्सीव्य क्षत्रियाय बध्नाति ॥३॥
परिवर्त्मानीन्द्रो जयातीति राजा त्रिः सेनां परियाति
॥४॥ उक्तः पूर्वस्य सोमांशूः ॥५॥ संदानं व आदानेनेति
पाशैरादानसंदानानि ॥ ६ ॥ मर्माणि त इति क्षत्रियं
संनाहयति ॥७॥ अभयानामप्ययः ॥८॥ इन्द्रो मन्थत्विति
॥६॥ पूतिरज्जुरिति पूतिरज्जुमवधाय ॥१०॥ अश्वत्थवध-
कयोरग्निं मन्थति ॥११॥ धूममिति धूममनुमन्त्रयते ॥१२ ।
और अन्तवाली इपिका फल-अपर पुरुषों की मृत्यु जानना ॥१७॥१८॥६
यह पन्द्रहवीं कण्डिका पूरी हुई ॥१५॥ “उच्चैर्घोष उप श्वासय०” इत्यादि
सब बाजाओं को प्रक्षालन करके तगर और वीर द्वारा संधापन कर
सम्पात वन्ति करके पुरोहित तीन बार लेकर दमयितृओं को देवे ॥१॥
विध्यम्०” इत्यादि मंत्र से ऊँचे स्वर से बोलकर आहुति देकर स्रुव ऊपर
को बर्तता हुआ होम करे ॥२॥ और सोमलत्ता को हरिण के चमड़े में
सीकर क्षत्रिय के लिये बांध देवे ॥३॥ परिवर्त्मानीन्द्रो जयति” से
राजा बैठी हुई सेना को “त्रिषप्तीय०” सूक्त से तीन बार परिक्रमा करे ॥
सोमलता के विषय में कहा गया सेना के आक्रमणों में केवल पचन का
ही आदेश किया जावे ॥६॥ मर्माणि त०” इत्यादि मंत्र से संनाह पहनावे
॥७॥ अब अभय कर्म को कहते हैं ॥ “स्वस्तिदा विशा ब्राह्मणेन
को प्रयुक्तासि न तना अवारिणुक कण्ठो अभयं मित्रावरुणावभयं द्यावा-
पृथिवी अस्मै ग्रामाय हत तर्ह्यपूषेमा आशा इन्द्रः सूत्रामा मैते पथा
स्वस्तिदा विशां पतिर्नमस्ते घोषिणीभ्य आ ते राष्ट्रमिदमुच्छ्रेयो यत इन्द्र
भयामह-”यह अभय गण है ॥८॥ ‘इन्द्रो मन्थ” से अग्नि मन्थन करे
और समिदाधान का प्रयोग करे ॥९॥ “पूति रज्जुः०” से पुरानी रज्जु
को अग्नि रखने की जगह लावे ॥१०॥ अश्वत्थ और वधक काष्ठों से
मन्थन कर अग्नि उत्पन्न करे ॥११॥ “धूमम्०” इत्यादि से धूम का अनु-
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३३
अग्निमित्यग्निम् ॥१३॥ तस्मिन्नरण्ये सपत्नक्षयणी-
रादधात्यश्वत्थबधकत्वाद्वङ्गाह्वखदिरशराणाम् ॥ १४॥
उक्ताः पाशाः॥१५॥आश्वत्थानि कूटानि भाङ्गानि जालानि
॥ १६ ॥ बाधकदण्डानि ॥ १७॥ स्वाहैभ्य इति मित्रेभ्यो
जुहोति ॥१८॥ दुराहामीभ्य इति सव्येनेङ्गडममित्रेभ्यो
बाधके ॥ १९ ॥ उत्तरतोऽग्नेर्लोहिताश्वत्थस्य शाखां
निहृत्य नीललोहिताभ्यां सूत्राभ्यां परितत्य नीललो-
हितेनामूनिति दक्षिणा प्रहापयति ॥ २० ॥ ये बाहव
उत्तिष्ठतेति·यथालिङ्गं सम्प्रेष्यति ॥२१॥ होमार्थे पृषदा-
ज्यम् ॥२२॥ प्रदानान्तानि वाप्यानि ॥२३॥ वाप्यैस्त्रिष-
न्धीनि वज्ररूपाण्यर्बुदरूपाणि ॥२४॥ शितिपदीं सम्पा-
मंत्रण करे ॥ १२ ॥ “अग्नि” इस आधी ऋचा से उत्पन्नाग्नि का
अनुमंत्रण करे ॥१३॥ इसी अग्नि में सेना कर्म करे । यह कर्म वन में होगा
न कि सेना में ॥ शत्रुक्षयणी कहे इध्मों का अर्थात् अश्वत्थ, वधक, एरण्ड,
पलाश, खदिर और शर इनका आधान करे ॥१४॥ इस कर्म में सूत्रोक्त
पाश काम में लाये जाय जो भाङ्ग एवं मौज का प्रयोग करे ॥१५॥ स्वाभा-
विक गर्त्त को कूट कहते हैं । सेनाकार्य्य में पीपल का कूट बनावे और
जानवरों को बांधने के लिये जाल होती है इसको भाङ्ग का बनावे॥१६॥
और बाधक वृक्ष का दण्ड करे ॥१७॥ स्वाहैभ्यः इत्यादि और “अमित्रेभ्यो”
से आहुति करे ॥१८॥ “दुराहामीभ्य०” को पढ़कर वधक के काठ से
प्रज्वलित अग्नि में वाम हाथ से इङ्गिड को और शत्रु के लिये बाधक
अग्नि में आहुति देवे ॥१९॥ अग्नि के उत्तर भाग में लाल अश्वत्थ की
शाखा को काटकर नीले एवं लाल रंग के सूतों से लपेट करके “नील
लोहितेनामून्”० इत्यादि से दक्षिण द्वार होकर छोड़ देवे ॥२०॥ “ये
बाहव उत्तिष्ठत”० इत्यादि इस अनुवाक को शुद्ध समय में कर्ता जप
करे ॥ और संकेतानुसार संप्रेषण करे ॥२१॥ होम के लिये पृषदाज्य
(दही का छिटा दिया घृत) लेवे ॥२२॥ सब स्थानों में—पाश में
अश्वत्थ के कूट में, भाङ्ग के जालों में, बाधक दण्डों में, वज्र रूप पात्रों
में और इङ्गिड के अलङ्करण में क्रुद्धानुमंत्रण करे ॥२३॥२४॥ शितिपदी
५