कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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Read in contextअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५
मस्तृहणं हृदयं दूशं उपनह्य तिस्रो रात्रीः पल्पूलने
वासयति ॥१६॥ चूर्णानि करोति ॥१७॥ मैश्रधान्ये मन्थ
ओप्य दधिमधुमिश्रमश्नाति ॥ १८ ॥ अस्मिन् वसु यदा
बध्नन्नव प्राणानिति युग्मकृष्णलं वासितं बध्नाति ॥१९॥
सारूपवत्सं पुरुषगात्रं द्वादशरात्रं सम्पातवन्तं कृत्वा-
˙नभिमुखमश्नाति ॥ २० ॥ २ ॥ ११ ॥
कथं मह इति मादानकश्रुतं क्षीरौदनमश्नाति ॥१॥
चमसे सरूपवत्साया दुग्धे व्रीहियवाववधाय मूर्च्छयि-
त्वा मध्वासिच्याशयति ॥ २ ॥ पृथिव्यै श्रोत्रायेति
जुहोति ॥३॥ वत्सो विराज इति मन्थान्तानि ॥४॥ सहृ-
दयं तदू षु संजानीध्वमेह यातु·सं वः पृच्यन्तां सं वो
मनांसि संज्ञानं न इति सांमनस्यानि ॥ ५ ॥ उदकुलिजं
संम्पातवन्तं ग्रामं परिहृत्य मध्ये निनयति ॥६॥ एवं सुरा-
लङ्कक में धूलक आदि को पुराने वस्त्र में बांधकर तीन रात तक गौ के
गोबर में वासे और चौथे दिन पुराने वस्त्र सहित को चूर्ण करे ॥ और
मैश्रधान्ये में मथन को डालकर दधि, मधु मिलाकर खावे ॥१॥१६॥१७॥१८॥
“अस्मिन्वसु यदा बध्नन्नव प्राणान् इस मंत्र से उक्त प्रतीकों में कृष्णमणि
को वास कर सब कामना सिद्धि चाहने वाला इस को हाथ या गले में
बांधे ॥१९॥ एक वर्ण बच्चे वाली गौके दूध में पके ओदन को पुरुषाकृति
बनाकर १२ दिन तक उस पर दूध में पके ओदन को ढारे ॥२०॥२॥११॥
दूसरी कण्डिका पूरी हुई ॥२॥
सम्पत्ति चाहने वाला “कथमहं” इत्यादि मादानक वृक्ष के काठ से
पके क्षीरोदन को खावे ॥१॥ चमसा में सरूप वत्सा गौ के दूध में
व्रीहि, यव डालकर मूर्च्छना देकर उस में मधु देकर खावे ॥२॥ और
“पृथिव्यै श्रोत्राय०” से आहुति देवे॥३॥ “त्रिज्योतिः कुरुते” इत्यादि से
पृश्निमंथ-तक कर्म्म होते हैं ॥४॥ “सहृदयम्०” इत्यादि से सांमनस्य
कर्म कहे गये हैं ॥५॥ चूने वाले घड़े को बनाकर गाँव में भ्रमण करावे
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