कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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Read in contextअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २७
सप्तमर्माणि स्थालीपाके पृक्तान्यश्नाति ॥६॥ अकुशलं
यो ब्राह्मणो लोहितमश्नीयादिति गार्ग्यः ॥७॥ उक्तो
लोममणिः ॥८॥ सर्वैराप्लावयति ॥६॥ अवसिञ्चति ॥१०॥
चतुरङ्गुलं तृणं रजोहरणं बिन्दुनाभिश्रोद्ध्योवमध्य ॥११॥
शुनि किलासमजे पलितं तृणे ज्वरो यो ऽस्मान्द्वेष्टि यं च
वयं द्विष्मस्तस्मिन् राजयक्ष्म इति दक्षिणा तृणं निरस्य-
ति गन्धप्रवादाभिरलंकुरुते ॥१२॥४॥१३॥
पूर्वस्य हस्तित्रसनानि ॥१ रथचक्रेण सम्पातवता-
खावे ॥६॥ इस रुधिर को जो ब्राह्मण खावे उसका कल्याण नहीं होता है
ऐसा गार्ग्य—कहते हैं ॥७॥ लोमणि के विषय में कहा गया ॥८॥ यह
कर्म क्षत्रियों के लिये है ब्राह्मण के लिये नहीं ॥८॥ पाँच प्रतीकों से
( मंत्रों से ) जल से नहवा कर, जलसे उस को सेक करे ॥९॥१०॥ चार
अङ्गुल परिमाण के तृण को—"रजउदक” कहते हैं । जिस के द्वारा धूलि
निकल जाती है। आकाश के जल ( मेघ-का पानी ) द्वारा किसी पात्रमें
नीचे छिद्रकर के उस में चार अङ्गुल वाला तृण लटका देवे और तृण के
नीचे दूसरा जलपात्र धर देवे जिस में शुद्ध जल गिरेगा। "शुनि किलास
समये" इत्यादि मंत्र से उस शुद्ध जल को मथकर तृण को दक्षिण दिशा में
फेक देवे एवं यस्ते गन्धः" इत्यादि तीन ऋचाओं से यक्ष्मा रोग वाले के
शरीर में सुगन्धित-पदार्थ उस जल में मिलाकर नित्य अनुलेपन करे
तो रोग छूट जावेगा ॥९॥१०॥११॥१२॥४॥१३॥ यह तेरहवीं कण्डिका
पूरी हुई ॥१३॥
अब राज कर्मों को कहेगे ॥ इन में से युद्ध सम्बन्धि कर्मों के तंत्र
को पहिले कहेंगे ॥१॥ अश्वत्थ वधक के वृक्ष के काठ की अरणियो द्वारा
अग्नि मन्थन कर "इन्द्रो मन्थतु" ० इत्यादि मंत्र से मन्थन करते हुए
अनुमंत्रण करे और "पूति रज्जूः”० इत्यादि आधी ऋचा से अग्नि गिरने
के स्थान में रज्जु को धरे । 'धूर्म परादृश्य०" आधी ऋचा से उत्पन्न अग्नि
को अनुमंत्रण करे । इस अग्निका नाम "सेनाग्नि" है ॥ अव्यचसश्च०”
सेना अग्नि का प्रणयन, ग्रहण, पंच गृहीत आज्य । अभ्यातानान्त आहु-
तियाँ करके लाल अश्वत्थ की शाखा को उत्तर भाग में रोपन कर