कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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Read in context३२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
उच्चैर्घोष उपश्वासयेति सर्ववादित्राणि प्रक्षाल्य
तगरोशीरेण संधाव्य सम्पातवन्ति त्रिराहृत्य प्रयच्छति
॥१॥ विहृदयमित्युच्चैस्तरां हुत्वा स्रुवमुद्धर्तयन् ॥ २ ॥
सोमांशं हरिणचर्मण्युत्सीव्य क्षत्रियाय बध्नाति ॥३॥
परिवर्त्मानीन्द्रो जयातीति राजा त्रिः सेनां परियाति
॥४॥ उक्तः पूर्वस्य सोमांशूः ॥५॥ संदानं व आदानेनेति
पाशैरादानसंदानानि ॥ ६ ॥ मर्माणि त इति क्षत्रियं
संनाहयति ॥७॥ अभयानामप्ययः ॥८॥ इन्द्रो मन्थत्विति
॥६॥ पूतिरज्जुरिति पूतिरज्जुमवधाय ॥१०॥ अश्वत्थवध-
कयोरग्निं मन्थति ॥११॥ धूममिति धूममनुमन्त्रयते ॥१२ ।
और अन्तवाली इपिका फल-अपर पुरुषों की मृत्यु जानना ॥१७॥१८॥६
यह पन्द्रहवीं कण्डिका पूरी हुई ॥१५॥ “उच्चैर्घोष उप श्वासय०” इत्यादि
सब बाजाओं को प्रक्षालन करके तगर और वीर द्वारा संधापन कर
सम्पात वन्ति करके पुरोहित तीन बार लेकर दमयितृओं को देवे ॥१॥
विध्यम्०” इत्यादि मंत्र से ऊँचे स्वर से बोलकर आहुति देकर स्रुव ऊपर
को बर्तता हुआ होम करे ॥२॥ और सोमलत्ता को हरिण के चमड़े में
सीकर क्षत्रिय के लिये बांध देवे ॥३॥ परिवर्त्मानीन्द्रो जयति” से
राजा बैठी हुई सेना को “त्रिषप्तीय०” सूक्त से तीन बार परिक्रमा करे ॥
सोमलता के विषय में कहा गया सेना के आक्रमणों में केवल पचन का
ही आदेश किया जावे ॥६॥ मर्माणि त०” इत्यादि मंत्र से संनाह पहनावे
॥७॥ अब अभय कर्म को कहते हैं ॥ “स्वस्तिदा विशा ब्राह्मणेन
को प्रयुक्तासि न तना अवारिणुक कण्ठो अभयं मित्रावरुणावभयं द्यावा-
पृथिवी अस्मै ग्रामाय हत तर्ह्यपूषेमा आशा इन्द्रः सूत्रामा मैते पथा
स्वस्तिदा विशां पतिर्नमस्ते घोषिणीभ्य आ ते राष्ट्रमिदमुच्छ्रेयो यत इन्द्र
भयामह-”यह अभय गण है ॥८॥ ‘इन्द्रो मन्थ” से अग्नि मन्थन करे
और समिदाधान का प्रयोग करे ॥९॥ “पूति रज्जुः०” से पुरानी रज्जु
को अग्नि रखने की जगह लावे ॥१०॥ अश्वत्थ और वधक काष्ठों से
मन्थन कर अग्नि उत्पन्न करे ॥११॥ “धूमम्०” इत्यादि से धूम का अनु-