कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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Read in context३० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मौञ्जान् पाशानिङ्गिडालंकृतान् सम्पातवतोऽनूक्तान्सेना-
क्रमेषु वपति ॥२८॥ एवमामपात्राणि ॥२९॥ इङ्गिडेन
संप्रोक्ष्य तृणान्याङ्गिरसेनाग्निना दीपयति ॥३०॥ यां धूमो
ऽवतनोति तां जयन्ति ॥३१॥५॥१४॥
ऋधद्धान्त्रस्तदिदासेत्याश्वत्थ्यां पात्र्यां त्रिवृतिगो-
मयपरिचये हस्तिपृष्ठे पुरुषशिरसि वामित्राञ्जुह्वदभि-
प्रक्रम्य निवपति ॥१॥ वराहविहिताद्राजानो वेदिं कुर्व-
न्ति ॥२॥ तस्यां प्रदानान्तानि ॥३॥ एकेष्वाहतास्यादहन
उपसमाधाय दीर्घदण्डेन स्रुवेण रथचक्रस्य खेन समधा
जुहोति ॥४॥ योजनीयां श्रुत्वा योजयेत् ॥५॥ यदि
चिन्जु त्वा नमो देववधेभ्य इत्यन्वाह ॥६॥ वैश्याय प्रदाना-
हारती हुई देख कर जप करे ॥२७॥ और भाङ्ग मौञ्जपाशों को इंगिड से
अलंकृत करके सम्पात वान् करके जिस ओर सेना आक्रमण करती
हो, उसी प्रदेश में डाले ॥२८॥ इसी प्रकार कच्चे पात्रों को डाले ॥२९॥
इङ्गिड से संप्रोक्षण कर शर तृणों को चाण्डालाग्नि से जलावे ॥३०॥
जलाने पर धूम जिस सेना को ढाक लेवे उसकी हार समझो ॥३१॥
यह चौदहवी कण्डिका समाप्त हुई ॥५॥१४॥
“ऋधद्धान्त्रस्तदिदाम०” इत्यादि मंत्र से तीन बार धरे हुए अश्वत्थ
की पात्री हाथी के पीठ पर या पुरुष के शिर पर धर कर उसमें शत्रुओं
के प्रति हवन करता हुआ धावा करे और पैदल चलने वाले पुरुष के
शिर पर पात्री को धर कर उसमें भी आहुतियाँ करता जावे ॥१॥ यह
जय कर्म है॥ सूकर द्वारा निकाली हुई मिट्टी से राजा लोग यज्ञ वेदि
बनावें और उस में प्रदानान्त मंत्रों को पढ़ कर हवन करें ॥३॥ संग्राम
में एक बाण से मरे हुए को दहन करने पर्य्यन्त इध्मों का आधान कर
ने पर चक्र को रख कर बड़े दण्डे वाले स्रुव से रथ चक्र के छिद्र द्वारा
पास ही आहुति देवे ॥४॥ और शत्रु सैन्य की तय्यारी देख कर अपनी
सेना को धावा बोल देवे ॥५॥ पर सैन्य को लक्ष्य कर यदि “चिनुत्वा
नमो देव वधेभ्यः” इस को प्रति दिन जप करें ॥६॥ वैश्य राजा प्रदानान्त