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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

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DevanagariHindipublished361 pages

Page 65 of 361

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Page 65

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३३
अग्निमित्यग्निम् ॥१३॥ तस्मिन्नरण्ये सपत्नक्षयणी-
रादधात्यश्वत्थबधकत्वाद्वङ्गाह्वखदिरशराणाम् ॥ १४॥
उक्ताः पाशाः॥१५॥आश्वत्थानि कूटानि भाङ्गानि जालानि
॥ १६ ॥ बाधकदण्डानि ॥ १७॥ स्वाहैभ्य इति मित्रेभ्यो
जुहोति ॥१८॥ दुराहामीभ्य इति सव्येनेङ्गडममित्रेभ्यो
बाधके ॥ १९ ॥ उत्तरतोऽग्नेर्लोहिताश्वत्थस्य शाखां
निहृत्य नीललोहिताभ्यां सूत्राभ्यां परितत्य नीललो-
हितेनामूनिति दक्षिणा प्रहापयति ॥ २० ॥ ये बाहव
उत्तिष्ठतेति·यथालिङ्गं सम्प्रेष्यति ॥२१॥ होमार्थे पृषदा-
ज्यम् ॥२२॥ प्रदानान्तानि वाप्यानि ॥२३॥ वाप्यैस्त्रिष-
न्धीनि वज्ररूपाण्यर्बुदरूपाणि ॥२४॥ शितिपदीं सम्पा-
मंत्रण करे ॥ १२ ॥ “अग्नि” इस आधी ऋचा से उत्पन्नाग्नि का
अनुमंत्रण करे ॥१३॥ इसी अग्नि में सेना कर्म करे । यह कर्म वन में होगा
न कि सेना में ॥ शत्रुक्षयणी कहे इध्मों का अर्थात् अश्वत्थ, वधक, एरण्ड,
पलाश, खदिर और शर इनका आधान करे ॥१४॥ इस कर्म में सूत्रोक्त
पाश काम में लाये जाय जो भाङ्ग एवं मौज का प्रयोग करे ॥१५॥ स्वाभा-
विक गर्त्त को कूट कहते हैं । सेनाकार्य्य में पीपल का कूट बनावे और
जानवरों को बांधने के लिये जाल होती है इसको भाङ्ग का बनावे॥१६॥
और बाधक वृक्ष का दण्ड करे ॥१७॥ स्वाहैभ्यः इत्यादि और “अमित्रेभ्यो”
से आहुति करे ॥१८॥ “दुराहामीभ्य०” को पढ़कर वधक के काठ से
प्रज्वलित अग्नि में वाम हाथ से इङ्गिड को और शत्रु के लिये बाधक
अग्नि में आहुति देवे ॥१९॥ अग्नि के उत्तर भाग में लाल अश्वत्थ की
शाखा को काटकर नीले एवं लाल रंग के सूतों से लपेट करके “नील
लोहितेनामून्”० इत्यादि से दक्षिण द्वार होकर छोड़ देवे ॥२०॥ “ये
बाहव उत्तिष्ठत”० इत्यादि इस अनुवाक को शुद्ध समय में कर्ता जप
करे ॥ और संकेतानुसार संप्रेषण करे ॥२१॥ होम के लिये पृषदाज्य
(दही का छिटा दिया घृत) लेवे ॥२२॥ सब स्थानों में—पाश में
अश्वत्थ के कूट में, भाङ्ग के जालों में, बाधक दण्डों में, वज्र रूप पात्रों
में और इङ्गिड के अलङ्करण में क्रुद्धानुमंत्रण करे ॥२३॥२४॥ शितिपदी
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