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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६१
पृष्ठ 173स्थायी लिंक
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६१
| अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरा-<br>त्मा सदा जनानां सम्बन्धिनि<br>हृदये संनिविष्टो यथाव्याख्यातः<br>तं स्वादात्मीयाच्छरीरात्प्रवृहेत्<br>उद्यच्छेन्निष्कर्षेत्पृथक्कुर्यादित्यर्थः।<br>किमिवेत्युच्यते मुञ्जादिव<br>इषीकामन्तस्थां धैर्येणाप्रमादेन ।<br>तं शरीरान्निष्कृष्टं चिन्मात्रं विद्या-<br>द्विजानीयाच्छुक्रममृतं यथोक्तं<br>ब्रह्मेति । द्विर्वचनमुपनिषत्परि-<br>समाप्त्यर्थमितिशब्दश्च ॥१७॥ | अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जिसकी व्याख्या पहले (क० उ० २ । १ । १२-१३ में) की जा चुकी है और जो जीवोंके हृदयमें स्थित उनका अन्तरात्मा है उसे अपने शरीरसे बाहर करे—ऊपर नियन्त्रित करे—निकाले अर्थात् शरीरसे पृथक् करे । किस प्रकार पृथक् करे? इसपर कहते हैं—धैर्य अर्थात् अप्रमादपूर्वक इस प्रकार अलग करे जैसे मूँजसे उसके भीतर रहनेवाली सींक की जाती है। शरीरसे पृथक् किये हुए उस (अङ्गुष्ठमात्र पुरुष) को ही पूर्वोक्त चिन्मात्र विशुद्ध और अमृतमय ब्रह्म जाने। यहाँ 'तं विद्याच्छुक्रममृतम्' इस पदकी द्विरुक्ति और 'इति' शब्द उपनिषद्की समाप्तिके लिये हैं ॥ १७ ॥ |
| विद्यास्तुत्यर्थोऽयमाख्यायि-<br>कार्थोपसंहारोऽधुनोच्यते— | अब विद्याकी स्तुतिके लिये यह आख्यायिकाके अर्थका उपसंहार कहा जाता है— |
मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा
विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ।
ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्यु-
रन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥