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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७
पृष्ठ 139स्थायी लिंक
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥
जिस प्रकार इस लोकमें प्रविष्ट हुआ वायु प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है और उनसे बाहर भी है ॥ १० ॥
| वायुर्यथैक इत्यादि। प्राणात्मना देहेष्वनुप्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूवेत्यादि समानम् ॥ १० ॥ | जिस प्रकार एक ही वायु प्राणरूपसे देहोंमें अनुप्रविष्ट होकर प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है [उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है] इत्यादि पूर्ववत् ही समझना चाहिये ॥ १० ॥ |
|---|---|
| एकस्य सर्वात्मत्वे संसारदुःखित्वं परस्यैव तदिति प्राप्तमत इदमुच्यते— | इस प्रकार एकहीकी सर्वात्मकता होनेपर संसारदुःखसे युक्त होना भी परमात्माका ही सिद्ध होता है; इसलिये ऐसा कहा जाता है— |
आत्माकी असङ्गता
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षु-
र्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥