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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित

ॐ

तत्सद्ब्रह्मणे नमः

कठोपनिषद्

मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित


यस्मिन् सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वदृक्तथा ।
सर्वभावपदातीतं स्वात्मानं तं स्मराम्यहम् ॥


शान्तिपाठ

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

वह परमात्मा हम (आचार्य और शिष्य) दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करें । हम दोनोंका साथ-साथ पालन करें । हम साथ-साथ विद्या-सम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें ! हम दोनोंका पढ़ा हुआ तेजस्वी हो । हम द्वेष न करें । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।

२कठोपनिषद्

सम्बन्ध-भाष्य

संस्कृतहिन्दी
ॐ नमो भगवते वैवस्वताय मृत्यवे ब्रह्मविद्याचार्याय नचिकेतसे च।ॐ ब्रह्मविद्याके आचार्य सूर्यपुत्र भगवान् यम और नचिकेताको नमस्कार है।
अथ काठकोपनिषद्वल्लीनां सुखार्थप्रबोधनार्थम् अल्पग्रन्था वृत्तिरारभ्यते।अब कठोपनिषद्की वल्लियोंको सुगमतासे समझानेके लिये यह संक्षिप्त वृत्ति आरम्भ की जाती है।
(उपनिषच्छब्दार्थ-निरुक्तिः)<br>सदेर्धातोर्विशरणगत्यवसादनार्थस्योपनिपूर्वस्य क्विप्प्रत्ययान्तस्य रूपमुपनिषदिति। उपनिषच्छब्देन च व्याचिख्यासितग्रन्थप्रतिपाद्यवेद्यवस्तुविषया विद्योच्यते। केन पुनरर्थयोगेन उपनिषच्छब्देन विद्योच्यत इत्युच्यते।विशरण (नाश), गति और अवसादन (शिथिल करना)—इन तीन अर्थोंवाली तथा 'उप' और 'नि' उपसर्गपूर्वक एवं 'क्विप्' प्रत्ययान्त 'सद्' धातुका 'उपनिषद्' यह रूप बनता है। उपनिषद् शब्दसे, जिस ग्रन्थकी हम व्याख्या करना चाहते हैं उसके प्रतिपाद्य और वेद्य ब्रह्मविषयक विद्याका प्रतिपादन किया जाता है। किस अर्थका योग होनेके कारण उपनिषद् शब्दसे विद्याका कथन होता है, सो बतलाते हैं।
ये मुमुक्षवो दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णाः सन्त उपनिषच्छब्दवाच्यां वक्ष्यमाणलक्षणां विद्याम् उपसद्योपगम्य तन्निष्ठतया निश्चयेन शीलयन्ति तेषामविद्यादेःजो मोक्षकामी पुरुष लौकिक और पारलौकिक विषयोंसे विरक्त होकर उपनिषद्शब्दकी वाच्य तथा आगे कहे जानेवाले लक्षणोंसे युक्त विद्याके समीप जाकर अर्थात् उसे प्राप्त कर उसीकी निष्ठासे निश्चयपूर्वक उसका परिशीलन करते हैं

शाङ्करभाष्यार्थ


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
संसारबीजस्य विशरणाद्धिंसनाद् विनाशनादित्यनेनार्थयोगेन विद्या उपनिषदित्युच्यते। तथा च वक्ष्यति—"निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते" (क० उ० १।३।१५) इति।उनके अविद्या आदि संसारके बीजका विशरण—हिंसन अर्थात् विनाश करनेके कारण इस अर्थके योगसे ही 'उपनिषद्' शब्दसे वह विद्या कही जाती है। ऐसा ही आगे श्रुति कहेगी भी कि "उसे साक्षात् जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है।"
पूर्वोक्तविशेषणान्मुमुक्षून्वा परं ब्रह्म गमयतीति ब्रह्मगमयितृत्वेन योगाद्ब्रह्मविद्योपनिषत्। तथा च वक्ष्यति—"ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युः" (क० उ० २।३।१८) इति।अथवा पूर्वोक्त विशेषणोंसे युक्त मुमुक्षुओंको ब्रह्मविद्या परब्रह्मके पास पहुँचा देती है—इस प्रकार ब्रह्मके पास पहुँचानेवाली होनेके कारण इस अर्थके योगसे भी ब्रह्मविद्या 'उपनिषद्' है। ऐसा ही "ब्रह्मको प्राप्त हुआ पुरुष विरज (शुद्ध) और विमृत्यु (अमर) हो गया" इस वाक्यसे श्रुति आगे कहेगी भी।
लोकादिर्ब्रह्मजज्ञो योऽग्निस्तद्विषयाया विद्याया द्वितीयेन वरेण प्रार्थ्यमानायाः स्वर्गलोकफलप्राप्तिहेतुत्वेन गर्भवासजन्मजराद्युपद्रववृन्दस्य लोकान्तरे पौनःपुन्येन प्रवृत्तस्यावसादयितृत्वेन शैथिल्यापादनेन धात्वर्थ-जो अग्नि भूः भुवः आदि लोकोंसे पूर्वसिद्ध, ब्रह्मासे उत्पन्न और ज्ञाता है उससे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या, जो कि दूसरे वरसे माँगी गयी है, और स्वर्गलोकरूप फलकी प्राप्तिके कारणरूपसे लोकान्तरोंमें पुनः-पुनः प्राप्त होनेवाले गर्भवास, जन्म और वृद्धावस्था आदि उपद्रवसमूहका अवसादन अर्थात् शैथिल्य करनेवाली है, अतः वह अग्निविद्या भी 'सद्' धातुके
४कठोपनिषद्

योगादग्निविद्याप्युपनिषदित्युच्यते। तथा च वक्ष्यति—"स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते" (क० उ० १।१।१३) इत्यादि।अर्थके योगसे 'उपनिषद्' कही जाती है। "स्वर्गलोकको प्राप्त होनेवाले पुरुष अमरत्व प्राप्त करते हैं" ऐसा आगे कहेंगे भी।
ननु चोपनिषच्छब्देनाध्येतारो ग्रन्थमप्यभिलपन्ति। उपनिषदमधीमहेऽध्यापयाम इति च।शङ्का—किन्तु अध्ययन करनेवाले तो 'उपनिषद्' शब्दसे ग्रन्थका भी उल्लेख करते हैं, जैसे—'हम उपनिषद् पढ़ते हैं अथवा पढ़ाते हैं' इत्यादि।
एवं नैष दोषोऽविद्यादिसंसारहेतुविशरणादेः सदिधात्वर्थस्य ग्रन्थमात्रेऽसम्भवाद्विद्यायां च सम्भवात्। ग्रन्थस्यापि तादर्थ्येन तच्छब्दत्वोपपत्तेः, आयुर्वै घृतम् इत्यादिवत्। तस्माद्विद्यायां मुख्याया वृत्त्योपनिषच्छब्दो वर्तते ग्रन्थे तु भक्त्येति।समाधान—ऐसा कहना भी दोषयुक्त नहीं है। संसारके हेतुभूत अविद्या आदिके विशरण आदि, जो कि सद् धातुके अर्थ हैं, ग्रन्थमात्रमें तो सम्भव नहीं हैं किन्तु विद्यामें सम्भव हो सकते हैं। ग्रन्थ भी विद्याके ही लिये है; इसलिये वह भी उस शब्दसे कहा जा सकता है; जैसे [आयुवृद्धिमें उपयोगी होनेके कारण] 'घृत आयु ही है' ऐसा कहा जाता है। इसलिये 'उपनिषद्' शब्द विद्यामें मुख्य वृत्तिसे प्रयुक्त होता है तथा ग्रन्थमें गौणी वृत्तिसे।
एवमुपनिषन्निर्वचनेनैव विशिष्टोऽधिकारी विद्यायामुक्तः। विषयश्च विशिष्ट उक्तो विद्यायाः परंइस प्रकार 'उपनिषद्' शब्दका निर्वचन करनेसे ही विद्याका विशिष्ट अधिकारी बतला दिया गया। तथा विद्याका प्रत्यगात्मस्वरूप पर-

शाङ्करभाष्यार्थ
५


ब्रह्म प्रत्यगात्मभूतम् । प्रयोजनं चास्या उपनिषद आत्यन्तिकी संसारनिवृत्तिर्ब्रह्मप्राप्तिलक्षणा । सम्बन्धश्चैवंभूतप्रयोजनेनोक्तः । अतो यथोक्ताधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धाया विद्यायाः करतलन्यस्तामलकवत् प्रकाशकत्वेन विशिष्टाधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धा एता वल्ल्यो भवन्ति इत्यतस्ताः यथाप्रतिभानं व्याचक्ष्महे ।ब्रह्मरूप विशिष्टविषय भी कह दिया । इसी प्रकार इस उपनिषद्‌का संसारकी आत्यन्तिक निवृत्ति और ब्रह्मप्राप्तिरूप प्रयोजन, तथा इस प्रकारके प्रयोजनसे इसका [साध्य-साधनरूप] सम्बन्ध भी बतला दिया । अतः उपर्युक्त अधिकारी, विषय, प्रयोजन और सम्बन्धवाली विद्याको करामलकवत् प्रकाशित करनेवाली होनेसे ये कठोपनिषद्‌की वल्लियाँ विशिष्ट अधिकारी, विषय, प्रयोजन और सम्बन्धवाली हैं, सो हम उनकी यथामति व्याख्या करते हैं ।