कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
प्रथम अध्याय
श्रीहरिः
विषय-सूची
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १. शान्तिपाठ | १ |
| २. सम्बन्ध-भाष्य | २ |
प्रथम अध्याय
प्रथमा वल्ली
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ३. वाजश्रवसका दान | ६ |
| ४. नचिकेताकी श्रद्धा | ८ |
| ५. पिता-पुत्र-संवाद | ९ |
| ६. यमलोकमें नचिकेता | १२ |
| ७. यमराजका वरप्रदान | १४ |
| ८. प्रथम वर—पितृपरितोष | १५ |
| ९. स्वर्गस्वरूपप्रदर्शन | १७ |
| १०. द्वितीय वर—स्वर्गसाधनभूत अग्निविद्या | १८ |
| ११. नाचिकेत अग्निचयनका फल | २२ |
| १२. तृतीय वर—आत्मरहस्य | २७ |
| १३. नचिकेताकी स्थिरता | २९ |
| १४. यमराजका प्रलोभन | ३० |
| १५. नचिकेताकी निरीहता | ३३ |
द्वितीया वल्ली
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १६. श्रेय-प्रेयविवेक | ३९ |
| १७. अविद्याग्रस्तोंकी दुर्दशा | ४४ |
| १८. आत्मज्ञानकी दुर्लभता | ४७ |
| १९. कर्मफलकी अनित्यता | ५२ |
( २ )
२०. नचिकेताके त्यागकी प्रशंसा ... ... ५३
२१. आत्मज्ञानका फल ... ... ५४
२२. सर्वातीत वस्तुविषयक प्रश्न ... ... ५७
२३. ओङ्कारोपदेश ... ... ५८
२४. आत्मस्वरूपनिरूपण ... ... ६०
२५. आत्मा आत्मकृपासाध्य है ... ... ६८
२६. आत्मज्ञानका अनधिकारी ... ... ६९
तृतीया वल्ली
२७. प्राप्ता और प्राप्तव्य भेदसे दो आत्मा ... ... ७२
२८. शरीरादिसे सम्बन्धित रथादि रूपक ... ... ७५
२९. अविवेकीकी विवशता ... ... ७७
३०. विवेकीकी स्वाधीनता ... ... ७८
३१. अविवेकीकी संसारप्राप्ति ... ... ७९
३२. विवेकीकी परमपदप्राप्ति ... ... ७९
३३. इन्द्रियादिका तारतम्य ... ... ८१
३४. आत्मा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है ... ... ८४
३५. लयचिन्तन ... ... ८६
३६. उद्बोधन ... ... ८८
३७. निर्विशेष आत्मज्ञानसे अमृतत्वप्राप्ति ... ... ९०
३८. प्रस्तुत विज्ञानकी महिमा ... ... ९२
द्वितीय अध्याय
प्रथमा वल्ली
३९. आत्मदर्शनका विघ्न—इन्द्रियोंकी बहिर्मुखता ... ... ९४
४०. अविवेकी और विवेकीका अन्तर ... ... ९७
४१. आत्मज्ञकी सर्वज्ञता ... ... ९९
४२. आत्मज्ञकी निःशोकता ... ... १०१
४३. आत्मज्ञकी निर्भयता ... ... १०२
( ३ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ४४. ब्रह्मज्ञका सर्वात्म्यदर्शन | १०३ |
| ४५. अरणिस्थ अग्निमें ब्रह्मदृष्टि | १०५ |
| ४६. प्राणमें ब्रह्मदृष्टि | १०६ |
| ४७. भेददृष्टिकी निन्दा | १०७ |
| ४८. हृदयपुण्डरीकस्थ ब्रह्म | १०९ |
| ४९. भेदापवाद | १११ |
| ५०. अभेददर्शनकी कर्तव्यता | ११२ |
| द्वितीया वल्ली | |
| ५१. प्रकारान्तरसे ब्रह्मानुसन्धान | ११४ |
| ५२. देहस्थ आत्मा ही जीवन है | १२० |
| ५३. मरणोत्तरकालमें जीवकी गति | १२२ |
| ५४. गुह्य ब्रह्मोपदेश | १२४ |
| ५५. आत्माका उपाधिप्रतिरूपत्व | १२५ |
| ५६. आत्माकी असङ्गता | १२७ |
| ५७. आत्मदर्शी ही नित्य सुखी है | १२९ |
| ५८. सर्वप्रकाशकका अप्रकाश्यत्व | १३३ |
| तृतीया वल्ली | |
| ५९. संसाररूप अश्वत्थ वृक्ष | १३६ |
| ६०. ईश्वरके ज्ञानसे अमरत्वप्राप्ति | १४० |
| ६१. सर्वशासक प्रभु | १४१ |
| ६२. ईश्वरज्ञानके बिना पुनर्जन्मप्राप्ति | १४२ |
| ६३. स्थानभेदसे भगवद्दर्शनमें तारतम्य | १४३ |
| ६४. आत्मज्ञानका प्रकार और प्रयोजन | १४४ |
| ६५. परमपदप्राप्ति | १४९ |
| ६६. आत्मोपलब्धिका साधन सद्बुद्धि ही है | १५२ |
| ६७. अमर कब होता है ? | १५५ |
| ६८. उपसंहार | १६० |
| ६९. शान्तिपाठ | १६३ |