कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
दूसरा अध्याय ३१
दूसरा अध्याय ३१
भोजन देते हैं। दीन ब्राह्मण ने अभ्यागत का स्वागत करके अपने भाग का सत्तू उसके सामने रख दिया। अभ्यागत भूखा था, एक सपाटे में सब खा गया और कहने लगा—"तुमने मुझको मार डाला। मैं दस दिन से भूखा हूँ। इस लघु भोजन ने मेरी भूख को और भी भड़का दिया।" तब ब्राह्मण की स्त्री ने अपने पति से कहा कि "मेरा भाग भी इसको दे दो।" पति ने कहा, "नहीं।" स्त्री हठ करने लगी "देखो, यह दीन मनुष्य आज हमारा अतिथि है, भूखा है। हमारा धर्म है कि हम इसको भोजन दें। क्योंकि मैं आपकी अर्द्धाङ्गिनी हूँ, इसलिए मुझको अधिकार है कि आपकी अतिथि-सेवा में भाग लूँ।" यह कह कर उसने भी अपना भाग अतिथि को अर्पण कर दिया। उसको भी खाकर अतिथि ने कहा कि मेरी भूख शान्त नहीं हुई। तब पुत्र ने कहा कि "मेरा भाग भी ले लो। क्योंकि मैं पिता के दाय का भागी हूँ, इसलिए अपने कर्त्तव्य-पालन में उसकी सहायता करना मेरा धर्म है।" किन्तु पुत्र के भाग को भी पा कर अतिथि की तृप्ति नहीं हुई। तब पुत्र की स्त्री ने भी अपना भाग उठा कर उसको दे दिया। अभ्यागत ने तृप्त हो कर भोजन किया और आशिष देकर वह वहाँ से प्रस्थित हो गया। उसी रात को ये चारों भूख का कष्ट सहते सहते मर गये। उस सत्तू की भूसी वहाँ भूमि पर पड़ी हुई थी। मैं उस पर लोटने लगा और मेरा आधा शरीर, जैसा कि तुम देख रहे हो, सुवर्ण का हो गया। उस समय से लेकर मैं बराबर संसार में इस उद्देश से भ्रमण कर रहा हूँ कि कहीं और ऐसा ही यज्ञ हुआ हो तो वहाँ लोट लगाऊँ और यह शेष आधा शरीर भी सुवर्ण का हो जावे। पर इस तुम्हारे
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कर्मयोग
यज्ञ में लोटने से ऐसा नहीं हुआ, इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम झूठे हो और यह यज्ञ नहीं है।
शोक कि उदारता और अतिथि-सेवा का यह आदर्श दिन प्रति दिन आर्यावर्त्त से लुप्त होता जा रहा है। जब मैंने पहले अँगरेज़ी पढ़ना आरम्भ किया, तब एक लड़के का वृत्तान्त पढ़ा जो बाहर काम करने के लिए गया हुआ था और विदेश से रुपया भेज कर माता की सहायता करता रहा। उसकी प्रशंसा में एक पुस्तक के चार पृष्ठ रँगे गये थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह क्या बात है। हिन्दू-सन्तान की दृष्टि में तो यह कोई असाधारण बात नहीं। पर अब मैंने समझा कि क्यों इस लड़के की इतनी प्रशंसा की गई थी। यूरोप में यह शिक्षा दी जाती है कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी चिन्ता आप करनी चाहिए। वहाँ प्रायः लोग केवल अपनी ही चिन्ता करते हैं और उनको इस बात की परवा तक नहीं होती कि माँ-बाप लड़के-बाले और घरवाली की क्या दशा होगी। यह अत्यन्त ही निन्दनीय प्रथा है। गृहस्थ के लिए यह आदर्श कभी न होना चाहिए।
अब तुम विचार करो कि कर्मयोग क्या वस्तु है? अन्तिम समय तक दूसरों का उपकार करना और प्रत्युपकार (बदले) का नाम तक मुँह पर न आने देना कर्मयोग है। दीनों को दान देकर कभी उनसे धन्यवाद या कृतज्ञता की आशा न करो। किन्तु तुम आप उनके कृतज्ञ बनो कि उनके कारण तुमको उदारता और दया के अभ्यास करने का अवसर हाथ आया। इसलिए गृहस्थाश्रम का धर्म संन्यासाश्रम के धर्म से कहीं कठिन है। कार्मिक जीवन त्याग के जीवन से कहीं दुराराध्य है।