कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
तीसरा अध्याय ३५
तीसरा अध्याय ३५
को अपनी अवस्था से नीचे गिराते हैं, वे अधर्म हैं। कोई कर्म ऐसे हैं कि जो हमको आर्य और सदाचारी बनाते हैं, कोई ऐसे भी कर्म हैं कि जिनके कारण हम नीच और पशु-तुल्य समझे जाते हैं। किन्तु प्रत्येक मनुष्य के लिए यह कह देना कि किन्हीं विशेष प्रकार के कर्मों से इसमें श्रेष्ठता और आर्यता आ जायगी, कठिन है। संस्कृत में एक उक्ति है जिसको प्रत्येक देश, जाति और प्रकार के मनुष्यों ने श्रेष्ठ माना है। वह यह है कि “मा हिंस्यात् सर्वप्राणिनः” “किसी प्राणी को मत सताओ। सताना या हिंसा करना पाप है।” केवल इतनी ही धर्म की व्याख्या की जा सकती है। इससे अधिक धर्म का विवरण करना कठिन है।
भगवद्गीता ने देश, काल और जाति की अवस्था के अनुसार धर्म की शिक्षा दी है। हमको उचित है कि हम ऐसे काम करें, जो हमारे देश, काल और समाज के विरुद्ध न हों। पर इस बात का स्मरण रखना चाहिए कि सब देश, काल और समाजों के आदर्श एक से नहीं होते। जो कि हम अपने से भिन्न देश, काल और समाज की रीति तथा व्यवहारों को नहीं जानते, इसलिए हम दूसरों से द्वेष या उनका अनादर करने लगते हैं। अमेरिकावाले समझते हैं कि जो कुछ अमेरिकन आचार-विचार हैं, वे ही सबसे उत्तम और सभ्यता के आदर्श हैं और जिनमें वे आचार-विचार नहीं हैं, वे असभ्य और अनादरणीय हैं। एक भारत-निवासी हिन्दू समझता है, उसी के कर्म धर्म श्रेष्ठ हैं और सबके हीन हैं। यह एक बड़ी भारी भूल है जो मनुष्यों की संकीर्णता और मात्सर्य से उत्पन्न हुई है। इस भूल के कारण बड़े अनर्थ और उत्पात हुए
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हैं और इसी के कारण भिन्न भिन्न जातियों में परस्पर द्वेष और वैमनस्य की आग प्रचण्ड हो रही है।
इसलिए हमको यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि जहाँ अपने धर्म-कर्म से हमको सच्चा प्रेम होना चाहिए, वहाँ दूसरों के धर्म-कर्म का भी उचित मान करना चाहिए और हम उनकी सामाजिक परिस्थिति की अपने जातीय आचार-विचारों से कभी तुलना न करें। "मैं सारे संसार का किसी दशा में आदर्श नहीं हो सकता।" यह बड़ी भारी शिक्षा है, जो हमको सीखनी चाहिए। संसार में तो क्या किसी देश में भी सर्वत्र एक ही रीति का प्रचार नहीं हो सकता। समय और सामयिक बातों के परिवर्त्तन से धर्म में भी परिवर्त्तन होता रहता है। इसलिए वर्त्तमान देश और समय के अनुसार जो कर्म उचित और आवश्यक हैं, वे ही हमारे प्रस्तुत धर्म हैं। वर्ण और आश्रम के अनुसार जो हमारा धर्म है, उस पर हमको दृढ़ रहना चाहिए। तत्पश्चात् अपने जीवन और अवस्था के अनुसार जो हमारा व्यक्तिगत धर्म है उसकी चिन्ता करें। इस जीवन में प्रत्येक मनुष्य की कुछ न कुछ स्थिति है; उसको उसी स्थिति में काम करना चाहिए। संसार में उस मनुष्य के लिए बहुत भय है, जो अपनी वास्तविक अवस्था पर दृष्टि नहीं देता और जैसा आप नहीं है वैसा अपने को समझने लगता है, या जैसा आप है वैसा अपने को नहीं समझता। जो मनुष्य अपने व्यक्तिगत धर्म एवं सामाजिक धर्म का पालन नहीं कर सकता, उससे कदापि यह आशा नहीं की जा सकती कि वह सामान्य धर्म का यथावत् पालन कर सकेगा। यदि मनुष्य किसी छोटे काम को योग्यता के