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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages
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५५८ * गीता-संग्रह *

अतिश्रेष्ठ, मन-बुद्धि तथा इन्द्रियोंसे अतीत, निष्कलंक तथा जगन्नियन्ता
है। जिसका इस प्रकारका स्वाभाविक स्वरूप है, उसमें 'मैं' और
'तुम' का भेद कैसे सम्भव है और फिर उसमें चराचर जगत् भी
कैसे सम्भव है?॥१०-११॥

गगनोपमं तु यत्प्रोक्तं तदेव गगनोपमम्।
चैतन्यं दोषहीनं च सर्वज्ञं पूर्णमेव च॥१२॥
जिसे गगनकी उपमावाला कहा गया है, वास्तवमें वही गगनके
तुल्य (विराट्) है; वह चैतन्य दोषरहित, सर्वज्ञ तथा पूर्ण है॥१२॥

पृथिव्यां चरितं नैव मारुतेन च वाहितम्।
वारिणा पिहितं नैव तेजोमध्ये व्यवस्थितम्॥१३॥
वह चेतन ब्रह्म पृथ्वीपर नहीं चलता, वायु उसे ले नहीं जा सकता,
जल उसे ढक नहीं सकता और अग्नि उसे जला नहीं सकता॥१३॥

आकाशं तेन संव्याप्तं न तद्व्याप्तं च केनचित्।
स बाह्याभ्यन्तरं तिष्ठत्यवच्छिन्नं निरन्तरम्॥१४॥
उस चेतन ब्रह्मके द्वारा आकाश पूर्ण रूपसे व्याप्त है; वह किसीके
भी द्वारा व्याप्त नहीं है। वह बाहर-भीतर सर्वत्र विराजमान है,
व्यवधानसे रहित है तथा असीम है॥१४॥

सूक्ष्मत्वात्तददृश्यत्वान्निर्गुणत्वाच्च योगिभिः।
आलम्बनादि यत्प्रोक्तं क्रमादालम्बनं भवेत्॥१५॥
सतताभ्यासयुक्तस्तु निरालम्बो यदा भवेत्।
तल्लयाल्लीयते चान्तर्गुणदोषविवर्जितः॥१६॥
योगियोंके द्वारा जिस चेतन ब्रह्मका आश्रयण करना बताया गया
है, उस ब्रह्मके सूक्ष्म, अदृश्य तथा निर्गुण होनेके कारण उसका आश्रयण
क्रमशः होना चाहिये। जब साधक निरन्तर अभ्यासरत रहते हुए
निरालम्ब हो जाता है और अन्तःकरणके गुण-दोषोंसे रहित हो जाता

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  • अवधूतगीता (१) * ५५९

है, तब उसके चित्तका लय हो जानेसे वह भी ब्रह्ममें लीन हो जाता है॥ १५-१६॥

विषविश्वस्य रौद्रस्य मोहमूर्च्छाप्रदस्य च।
एकमेव विनाशाय ह्यमोघं सहजामृतम्॥ १७॥

भयानक तथा अज्ञान एवं भ्रम प्रदान करनेवाले विषरूपी सांसारिक विषयोंके विनाशके लिये यह (ज्ञान) अमोघ तथा सहज अमृतरूप है॥ १७॥

भावगम्यं निराकारं साकारं दृष्टिगोचरम्।
भावाभावविनिर्मुक्तमन्तरालं तदुच्यते॥ १८॥

निराकारको भावगम्य, साकारको दृष्टिका विषय और जो भाव-अभावसे रहित है, उसे अन्तराल कहा जाता है॥ १८॥

बाह्यभावं भवेद्विश्वमन्तः प्रकृतिरुच्यते।
अन्तरादन्तरं ज्ञेयं नारिकेलफलाम्बुवत्॥ १९॥

बाह्य [दृश्यमान स्थूल] पदार्थोंको विश्व कहा जाता है और भीतर विद्यमान तत्त्वको प्रकृति कहा जाता है। नारिकेल फलके भीतर स्थित जलकी भाँति उस सूक्ष्म प्रकृतिके भीतर विद्यमान अतिसूक्ष्म वह ब्रह्म ही जाननेयोग्य है॥ १९॥

भ्रान्तिज्ञानं स्थितं बाह्ये सम्यग्ज्ञानं च मध्यगम्।
मध्यान्मध्यतरं ज्ञेयं नारिकेलफलाम्बुवत्॥ २०॥

बाह्य जगत्-प्रपंचमें स्थित ज्ञान भ्रान्ति ज्ञान है और भीतर स्थित ज्ञान यथार्थ ज्ञान है। नारिकेलके फलके भीतर स्थित जलकी भाँति मध्यसे भी मध्यतर (अतिसूक्ष्म) ब्रह्म ही [वस्तुतः] जाननेयोग्य है॥ २०॥

पौर्णमास्यां यथा चन्द्र एक एवातिनिर्मलः।
तेन तत्सदृशं पश्येद् द्विधा दृष्टिविपर्ययः॥ २१॥

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५६० * गीता-संग्रह *


अनेनैव प्रकारेण बुद्धिभेदो न सर्वगः।
दाता च धीरतामेति गीयते नामकोटिभिः॥ २२॥

जैसे पूर्णिमाका अति निर्मल एक ही चन्द्रमा दिखायी देता है, उसी प्रकार आत्मा भी अति निर्मल तथा एक ही है; अतः आत्माको उसी चन्द्रमाके समान एकरूप देखना चाहिये। दो चन्द्रमाका दिखायी देना जैसे नेत्रदोष है, वैसे ही द्वैतभाव रखना भ्रमज्ञान है। इस पूर्वोक्त प्रकारसे ही सर्वगत चेतनके प्रति किसी भी तरह भेदकी कल्पना नहीं हो सकती है। इस ज्ञानके प्रदाता धैर्यवान् गुरुकी करोड़ों नामोंसे प्रशंसा की जाती है॥ २१-२२॥

गुरुप्रज्ञाप्रसादेन मूर्खो वा यदि पण्डितः।
यस्तु सम्बुध्यते तत्त्वं विरक्तो भवसागरात्॥ २३॥
रागद्वेषविनिर्मुक्तः सर्वभूतहिते रतः।
दृढबोधश्च धीरश्च स गच्छेत्परमं पदम्॥ २४॥

मूर्ख अथवा विद्वान्—जो कोई भी यदि गुरुकी प्रज्ञाकी कृपासे परमतत्त्वका बोध प्राप्त कर लेता है तो वह राग-द्वेषसे रहित, सभी प्राणियोंके कल्याणमें रत रहनेवाला, स्थिर ज्ञानवाला और भवसागरसे विरक्त हो जाता है तथा प्रशान्त होकर परम पदको प्राप्त करता है॥ २३-२४॥

घटे भिन्ने घटाकाश आकाशे लीयते यथा।
देहाभावे तथा योगी स्वरूपे परमात्मनि॥ २५॥

जैसे घटका नाश होनेपर घटाकाश (घटके भीतरका आकाश) महाकाशमें विलीन हो जाता है, उसी प्रकार देहका नाश हो जानेपर (जीवन्मुक्त) योगी परमात्माके स्वरूपमें विलीन हो जाता है॥ २५॥

उक्तेयं कर्मयुक्तानां मतिर्यान्तेऽपि सा गतिः।
न चोक्ता योगयुक्तानां मतिर्यान्तेऽपि सा गतिः॥ २६॥

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  • अवधूतगीता ( १ ) * ५६१

या गतिः कर्मयुक्तानां सा च वागिन्द्रियाद्भवेत्।
योगिनां या गतिः क्वापि ह्यकथ्या भवतार्जिता ॥ २७ ॥

कर्मयुक्त मनुष्योंकी जैसी बुद्धि मरण-कालके समय होती है, उनकी वैसी ही गति कही गयी है; किंतु योगियोंकी जैसी मति अन्तकालमें होती है, उनकी वैसी गति नहीं कही गयी है (क्योंकि) कर्मयुक्त मनुष्योंकी जो गति शास्त्रोंमें उल्लिखित है, उसका कथन तो वाणीसे किया जा सकता है, किंतु योगियोंकी जो स्थिति तुमने प्राप्त कर ली है, वह वाणीसे नहीं कही जा सकती ॥ २६-२७ ॥

एवं ज्ञात्वा त्वमुं मार्गं योगिनां नैव कल्पितम्।
विकल्पवर्जनं तेषां स्वयं सिद्धिः प्रवर्तते ॥ २८ ॥

इस प्रकार उन योगियोंके विकल्परहित इस मार्गको जानकर (साधककी) स्वतः सिद्धि हो जाती है; यह मार्ग [कर्मियोंके मार्गकी भाँति] विकल्पयुक्त नहीं है ॥ २८ ॥

तीर्थे वान्त्यजगेहे वा यत्र कुत्र मृतोऽपि वा।
न योगी पश्यते गर्भं परे ब्रह्मणि लीयते ॥ २९ ॥

तीर्थमें अथवा चाण्डालके घरमें अथवा जहाँ-कहीं भी मरनेपर [जीवन्मुक्त] योगी पुनः गर्भमें नहीं जाता है; वह परब्रह्ममें लीन हो जाता है ॥ २९ ॥

सहजमजमचिन्त्यं यस्तु पश्येत् स्वरूपं
घटति यदि यथेष्टं लिप्यते नैव दोषैः।
सकृदपि तदभावात्कर्म किञ्चिन्न कुर्यात्
तदपि न च विबद्धः संयमी वा तपस्वी ॥ ३० ॥

जो साधक आत्माके स्वाभाविक, अनादि तथा अचिन्त्य स्वरूपको एक बार भी देख लेता है, तब यदि वह यथेष्ट कर्म करता है तो भी दोषोंसे लिप्त नहीं होता। संयमी या तपस्वी होकर यदि वह कुछ

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५६२ * गीता-संग्रह *


भी कर्म नहीं करता तो भी दोषोंका अभाव हो जानेसे वह किसीसे
भी बद्ध नहीं होता ॥ ३० ॥

निरामयं निष्प्रतिमं निराकृतिं
निराश्रयं निर्वपुषं निराशिषम् ।
निर्द्वन्द्वनिर्मोहमलुप्तशक्तिकं
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३१ ॥

जीवन्मुक्त योगी विकाररहित, अप्रतिम, निराकार, निरालम्ब
देहरहित, इच्छारहित, द्वन्द्वरहित, मोहरहित तथा सर्वशक्तिमान् उस
परमेश्वर शाश्वत आत्माको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥

वेदो न दीक्षा न च मुण्डनक्रिया
गुरुर्न शिष्यो न च यन्त्रसम्पदः ।
मुद्रादिकं चापि न यत्र भासते
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३२ ॥

जहाँ वेद, मन्त्र-दीक्षा, मुण्डन-क्रिया, गुरु-शिष्य-व्यवहार, यन्त्र
आदि सम्पदाएँ और मुद्रा आदिका भी आभास नहीं रह जाता, उस
परमेश्वर शाश्वत आत्माको साधक प्राप्त होता है ॥ ३२ ॥

न शाम्भवं शाक्तिकमानवं न वा
पिण्डं च रूपं च पदादिकं न वा ।
आरम्भनिष्पत्तिघटादिकं च नो
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥ ३३ ॥

जो न शम्भुसे, न शक्तिसे और न मनुसे उत्पन्न हुआ है; जो
न पिण्ड है, न रूपयुक्त है और न पैर आदि इन्द्रियोंसे युक्त है और
जो आरम्भ तथा निष्पत्तिसे युक्त घट आदि पदार्थ भी नहीं है, उस
परमेश्वर शाश्वत आत्माको साधक प्राप्त होता है ॥ ३३ ॥

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  • अवधूतगीता (१)* ५६३

यस्य स्वरूपात्सचराचरं जग-
दुत्पद्यते तिष्ठति लीयतेऽपि वा।
पयोविकारादिव फेनबुद्बुदा-
स्तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्॥ ३४॥

जिसके स्वरूपसे चराचर सम्पूर्ण जगत् जलके विकारसे फेन तथा बुद्बुदोंकी भाँति उत्पन्न होता है, उसीमें स्थिर रहता है और अन्तमें उसीमें विलीन हो जाता है; उस परमेश्वर शाश्वत आत्माको साधक प्राप्त होता है॥ ३४॥

नासानिरोधो न च दृष्टिरासनं
बोधोऽप्यबोधोऽपि न यत्र भासते।
नाडीप्रचारोऽपि न यत्र किञ्चित्
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्॥ ३५॥

जिसमें प्राणायाम, दृष्टिसंयम, आसन, ज्ञान अथवा अज्ञान कुछ भी नहीं भासता और जिसमें नाड़ियोंकी गतिविधि भी नहीं है, उस परमेश्वर शाश्वत आत्माको साधक प्राप्त होता है॥ ३५॥

नानात्वमेकत्वमुभत्वमन्यता
अणुत्वदीर्घत्वमहत्त्वशून्यता।
मानत्वमेयत्वसमत्ववर्जितं
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्॥ ३६॥

जिसमें अनेकत्व, एकत्व, उभयत्व, अन्यताभाव, अणुत्व, दीर्घत्व, महत्त्व और शून्यता—ये सब नहीं है; जो मान, मेय और समत्वसे रहित है, उस परमेश्वर शाश्वत आत्माको साधक प्राप्त होता है॥ ३६॥

सुसंयमी वा यदि वा न संयमी
सुसंग्रही वा यदि वा न संग्रही।

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५६४ * गीता-संग्रह *


निष्कर्मको वा यदि वा सकर्मक-
स्तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्॥ ३७॥

ज्ञानी साधक सम्यक् संयम करनेवाला हो अथवा संयम करनेवाला न हो; संग्रह करनेवाला हो अथवा संग्रह करनेवाला न हो; कर्मरहित हो या कर्मयुक्त हो—वह उस परमेश्वर शाश्वत आत्माको प्राप्त होता है॥ ३७॥

मनो न बुद्धिर्न शरीरमिन्द्रियं
तन्मात्रभूतानि न भूतपञ्चकम्।
अहङ्कृतिश्चापि वियत्स्वरूपकं
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्॥ ३८॥

जो मन नहीं है, बुद्धि नहीं है, शरीर नहीं है, इन्द्रियाँ नहीं हैं, तन्मात्राएँ नहीं हैं, पाँच महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश) नहीं हैं तथा अहंकार भी नहीं है; और जो आकाशके स्वरूपवाला है, उस परमेश्वर शाश्वत आत्माको साधक प्राप्त होता है॥ ३८॥

विधौ निरोधे परमात्मतां गते
न योगिनश्चेतसि भेदवर्जिते।
शौचं न वाशौचमलिङ्गभावना
सर्वं विधेयं यदि वा निषिध्यते॥ ३९॥

योगीके परमात्मभावको प्राप्त तथा भेदरहित चित्तमें विधि तथा निषेधका विचार नहीं रहता है, उनके लिये पवित्रता तथा अपवित्रताका भी भाव नहीं रहता, उनमें विशिष्ट पहचान बनानेकी भावना नहीं रहती। उनके लिये सब कुछ विधेय अथवा निषिद्ध हो जाता है॥ ३९॥

मनो वचो यत्र न शक्तमीरितुं
नूनं कथं तत्र गुरूपदेशता।

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  • अवधूतगीता ( १)* ५६५

इमां कथामुक्तवतो गुरोस्त-
द्युक्तस्य तत्त्वं हि समं प्रकाशते ॥ ४० ॥

मन और वाणी भी जिस चेतन आत्माका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं, वहाँ [शिष्यके लिये] गुरुकी उपदेशता कैसे गम्य हो सकती है ! चेतन आत्माका वर्णन करनेवाले और उस आत्मामें जुड़े हुए गुरुको निश्चय ही वह आत्मतत्त्व समरूपसे प्रकाशमान रहता है ॥ ४० ॥

॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायामात्मसंवित्त्युपदेशो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


तीसरा अध्याय

आत्मतत्त्वके ज्ञानरूपी अमृतत्व, समरसत्व एवं आकाश-सदृश व्यापकत्वका विवेचन, आत्मबोध तथा त्यागाभिमानके भी त्यागकी प्रेरणा

अवधूत उवाच

गुणविगुणविभागो वर्तते नैव किञ्चि-
द्रतिविरतिविहीनं निर्मलं निष्प्रपञ्चम् ।
गुणविगुणविहीनं व्यापकं विश्वरूपं
कथमहमिह वन्दे व्योमरूपं शिवं वै ॥ १ ॥

अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले—जिस चेतन आत्मामें सगुण तथा निर्गुणका कुछ भी भेद नहीं है, जो आसक्ति तथा विरक्तिसे विहीन है, निर्मल है, प्रपंचरहित है, गुण तथा विगुणसे रहित है, व्यापक है, विश्वरूप है, आकाशतुल्य व्यापक है और कल्याणस्वरूप है—उस [भेदरहित परमात्मा]-की वन्दना मैं कैसे करूँ? ॥ १ ॥

श्वेतादिवर्णरहितो नियतं शिवश्च
कार्यं हि कारणमिदं हि परं शिवश्च।

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* गीता-संग्रह *


एवं विकल्परहितोऽहमलं शिवश्च
स्वात्मानमात्मनि सुमित्र कथं नमामि॥२॥

हे सुमित्र ! मैं श्वेत आदि वर्णोंसे रहित तथा सर्वदा कल्याणस्वरूप हूँ। 'मैं कार्य हूँ' अथवा कारण हूँ, यह श्रेष्ठ है अथवा कल्याणस्वरूप है। इस प्रकारके विकल्पसे रहित हूँ और मैं पूर्ण परमात्मस्वरूप हूँ; तब मैं अपने आत्माको अपने आत्मामें किस प्रकार नमस्कार करूँ ? ॥२॥

निर्मूलमूलरहितो हि सदोदितोऽहं
निर्धूमधूमरहितो हि सदोदितोऽहम्।
निर्दीपदीपरहितो हि सदोदितोऽहं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥३॥

मैं अजन्मा और कारणरहित होता हुआ सदा विद्यमान हूँ। निर्धूम और मलरहित मैं बिना दीपकके स्वप्रकाशित होकर सदा विद्यमान हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३॥

निष्कामकाममिह नाम कथं वदामि
निःसङ्गसङ्गमिह नाम कथं वदामि।
निःसारसाररहितं च कथं वदामि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥४॥

निष्काम होकर मैं स्वयंको सकाम कैसे कहूँ, निःसंग होकर संगवाला कैसे कहूँ और निःसार (निर्गुण) होकर सारवान् कैसे कहूँ ? मैं तो ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ४॥

अद्वैतरूपमखिलं हि कथं वदामि
द्वैतस्वरूपमखिलं हि कथं वदामि।
नित्यं त्वनित्यमखिलं हि कथं वदामि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोहऽम्॥५॥

मैं सम्पूर्ण प्रपंचको अद्वैतरूप कैसे कहूँ और सम्पूर्ण प्रपंचको द्वैतरूप

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  • अवधूतगीता ( १ ) * ५६७

भी कैसे कहूँ? इसी प्रकार इसे नित्य अथवा अनित्य भी कैसे कहूँ? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥५॥

स्थूलं हि नो नहि कृशं न गतागतं हि
आद्यन्तमध्यरहितं न परापरं हि।
सत्यं वदामि खलु वै परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥६॥

आत्मा न स्थूल है, न सूक्ष्म है और न तो गमनागमनवाला ही है; यह आदि, अन्त और मध्यसे रहित है; यह पर अथवा अपर भी नहीं है। मैं सत्य कहता हूँ कि मैं परमार्थ तत्त्व-स्वरूप हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥६॥

संविद्धि सर्वकरणानि नभोनिभानि
संविद्धि सर्वविषयांश्च नभोनिभांश्च।
संविद्धि चैकममलं न हि बन्धमुक्तं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥७॥

तुम समस्त इन्द्रियोंको आकाशतुल्य शून्य जानो तथा सभी विषयोंको आकाशतुल्य शून्य जानो। आत्माको विशुद्ध जानो; यह बन्धन तथा मुक्तिसे युक्त नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥७॥

दुर्बोधबोधगहनो न भवामि तात
दुर्लक्ष्यलक्ष्यगहनो न भवामि तात।
आसन्नरूपगहनो न भवामि तात
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥८॥

हे तात! मैं दुर्बोध हूँ, किंतु अति कठिनतासे जाना जानेवाला भी नहीं हूँ, मैं दुर्लक्ष्य हूँ, किंतु कठिनाईसे दिखायी देनेवाला भी नहीं हूँ, मैं अति समीप हूँ और अपनेको छिपाता नहीं हूँ। मैं तो ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥८॥

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५६८ * गीता-संग्रह *


निष्कर्मकर्मदहनो ज्वलनो भवामि
निर्दुःखदुःखदहनो ज्वलनो भवामि।
निर्देहदेहदहनो ज्वलनो भवामि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ९ ॥

मैं कर्मरहित हूँ और कर्मोंको जलानेहेतु अग्निरूप हूँ; मैं दुःखरहित हूँ और दुःखोंको जलानेके लिये अग्निरूप हूँ; मैं देहरहित हूँ और देहाभिमानको जलानेके लिये अग्निरूप हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ९॥

निष्पापपापदहनो हि हुताशनोऽहं
निर्धर्मधर्मदहनो हि हुताशनोऽहम्।
निर्बन्धबन्धदहनो हि हुताशनोऽहं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १० ॥

मैं पापसे रहित हूँ, फिर भी पापको दग्ध करनेके लिये अग्निरूप हूँ, मैं धर्मरहित हूँ फिर भी धर्मका दाह करनेहेतु अग्निरूप हूँ और मैं बन्धनरहित हूँ फिर भी बन्धनको जलानेके लिये अग्निरूप हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १०॥

निर्भावभावरहितो न भवामि वत्स
निर्योगयोगरहितो न भवामि वत्स।
निश्चित्तचित्तरहितो न भवामि वत्स
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ११ ॥

हे वत्स! मैं भावरहित होकर भी भावरहित नहीं हूँ, मैं योगरहित होकर भी योगरहित नहीं हूँ और चित्तसे रहित होकर भी चित्तरहित नहीं हूँ। (अर्थात मैं इनसे युक्त भी और इनसे रहित भी हूँ)। हे वत्स! मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ११॥

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* अवधूतगीता ( १ )* ५६९


निर्मोहमोहपदवीति न मे विकल्पो
निःशोकशोकपदवीति न मे विकल्पः।
निर्लोभलोभपदवीति न मे विकल्पो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १२ ॥

मोहशून्य अथवा मोहयुक्त—इस प्रकारका विकल्प मुझमें नहीं है, शोकरहित अथवा शोकयुक्त—इस प्रकारका भी विकल्प मुझमें नहीं है और लोभरहित अथवा लोभयुक्त—इस प्रकारका भी विकल्प मुझमें नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १२॥

संसारसन्ततिलता न च मे कदाचित्
सन्तोषसन्ततिसुखं न च मे कदाचित्।
अज्ञानबन्धनमिदं न च मे कदाचित्
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १३ ॥

संसाररूपी प्रवाहकी निरन्तरता मुझमें कभी नहीं है, सन्तोषरूपी प्रवाहका सुख भी मुझमें कभी नहीं है और यह अज्ञानबन्धन मुझमें किंचित् भी नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १३॥

संसारसन्ततिरजो न च मे विकारः
सन्तापसन्ततितमो न च मे विकारः।
सत्त्वं स्वधर्मजनकं न च मे विकारो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ १४ ॥

संसाररूपी प्रवाहका रजोगुण मुझे विकृत नहीं करता, संसार-परम्पराका तम (अज्ञान) भी मुझे विकृत नहीं करता और अपने धर्मका जनक सत्त्वगुण भी मुझे प्रभावित नहीं करता। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १४॥

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५७० * गीता-संग्रह *


सन्तापदुःखजनको न विधिः कदाचित्
सन्तापयोगजनितं न मनः कदाचित्।
यस्मादहङ्कृतिरियं न च मे कदाचि-
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १५॥

सन्ताप तथा दुःखको उत्पन्न करनेवाली जो विधि है, वह मेरे लिये कभी नहीं है, सन्तापके सम्बन्धसे उत्पन्न जो संकल्परूप मन है, वह भी मेरा कभी नहीं है और जो यह अहंकार है, वह भी मुझमें कभी नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १५॥

निष्कम्पकम्पनिधनं न विकल्पकल्पं
स्वप्नप्रबोधनिधनं न हिताहितं हि।
निःसारसारनिधनं न चराचरं हि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १६॥

मैं कम्परहित और कम्पयुक्त दोनोंका नाशरूप नहीं हूँ, मैं विकल्प तथा कल्परूप भी नहीं हूँ, मैं स्वप्न और जाग्रत्का नाशरूप भी नहीं हूँ, मैं हित तथा अहितरूप भी नहीं हूँ, मैं निःसार तथा सारका नाशरूप नहीं हूँ और मैं चर और अचररूप भी नहीं हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १६॥

नो वेद्यवेदकमिदं न च हेतुतर्क्यं
वाचामगोचरमिदं न मनो न बुद्धिः।
एवं कथं हि भवतः कथयामि तत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १७॥

यह आत्मस्वरूप चेतन ब्रह्म न ज्ञानका विषय है और न जाननेवाला ही है, यह वाणीसे अगम्य है, इसे न मन जान सकता है और न बुद्धि ही जान सकती है; इस प्रकारके आत्मतत्त्वका वर्णन मैं

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  • अवधूतगीता (१) * ५७१

आपके समक्ष कैसे करूँ? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १७॥

निर्भिन्नभिन्नरहितं परमार्थतत्त्व-
मन्तर्बहिर्न हि कथं परमार्थतत्त्वम्।
प्राक्सम्भवं न च रतं नहि वस्तु किञ्चि-
ज्ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १८॥

यह परमतत्त्व भेदाभेदसे रहित और भीतर तथा बाहरके व्यवहारसे शून्य है, पूर्वमें यह कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ, यह किसी भी पदार्थसे लिप्त नहीं है और यह कोई वस्तु भी नहीं है। [आत्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १८॥

रागादिदोषरहितं त्वहमेव तत्त्वं
दैवादिदोषरहितं त्वहमेव तत्त्वम्।
संसारशोकरहितं त्वहमेव तत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ १९॥

मैं राग आदि दोषोंसे रहित आत्मतत्त्व हूँ, मैं दैव आदि दोषोंसे रहित आत्मतत्त्व हूँ और मैं सांसारिक दुःखोंसे रहित आत्मतत्त्व हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ १९॥

स्थानत्रयं यदि च नेति कथं तुरीयं
कालत्रयं यदि च नेति कथं दिशश्च।
शान्तं पदं हि परमं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ २०॥

चेतन ब्रह्ममें यदि तीन अवस्थाएँ (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) नहीं हैं तो चौथी तुरीयावस्था कैसे हो सकती है? यदि उसमें तीनों काल नहीं हैं तो दिशाएँ कैसे हो सकती हैं? वह ब्रह्म शान्तपद, अतिश्रेष्ठ

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५७२ * गीता-संग्रह *

तथा परमार्थतत्त्वस्वरूप है। [आत्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ,
समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥२०॥

दीर्घो लघुः पुनरितीह न मे विभागो
विस्तारसङ्कटमितीह न मे विभागः।
कोणं हि वर्तुलमितीह न मे विभागो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥२१॥

यह दीर्घ है और यह लघु है—इस प्रकारका भेद इसी लोकमें
है, मुझमें नहीं है, विस्तार और संकोच—ऐसा विभाग भी इस लोकमें
है, मुझमें नहीं है और कोण तथा गोलाकार—ऐसा विभाग भी इसी
संसारमें है, मुझमें नहीं है; मैं तो ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और
आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥२१॥

मातापितादि तनयादि न मे कदाचि-
ज्जातं मृतं न च मनो न च मे कदाचित्।
निर्व्याकुलं स्थिरमिदं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥२२॥

मेरे माता, पिता, पुत्र आदि न तो कभी उत्पन्न हुए और न मृत्युको
ही प्राप्त हुए, मेरा मन कभी व्याकुलतासे रहित तथा स्थिर भी नहीं है।
[एकमात्र] यह आत्मा ही परमार्थतत्त्वस्वरूप है; मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ,
समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥२२॥

शुद्धं विशुद्धमविचारमनन्तरूपं
निर्लेपलेपमविचारमनन्तरूपम् ।
निष्खण्डखण्डमविचारमनन्तरूपं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥२३॥

यह चेतन आत्मा शुद्ध है, अति शुद्ध है, विचाररहित और
अनन्तरूप है। यह निर्लेप होकर भी सम्बन्धयुक्त है, विचारसे परे

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* अवधूतगीता ( १ ) * ५७३

और अनन्तरूप है। यह नाशसे रहित और नाशवान्, अचिन्त्य तथा अनन्तरूप है। [आत्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ २३ ॥

ब्रह्मादयः सुरगणाः कथमत्र सन्ति
स्वर्गादयो वसतयः कथमत्र सन्ति।
यद्येकरूपममलं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २४ ॥

जब यह आत्मतत्त्व एकरूप, विशुद्ध तथा परमार्थस्वरूप है, तब ब्रह्मा आदि देववृन्द इसमें कैसे हो सकते हैं और स्वर्ग आदि स्थान भी इसमें कैसे हो सकते हैं? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ २४ ॥

निर्नेति नेति विमलो हि कथं वदामि
निःशेषशेषविमलो हि कथं वदामि।
निर्लिङ्गलिङ्गविमलो हि कथं वदामि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २५ ॥

यह आत्मतत्त्व नेति और इतिसे परे है, यह सम्पूर्ण और शेषसे भी परे है तथा यह आकार और निराकारसे भी परे है। इसे मैं कैसे अभिव्यक्त करूँ? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ २५ ॥

निष्कर्मकर्मपरमं सततं करोमि
निःसङ्गसङ्गरहितं परमं विनोदम्।
निर्देहदेहरहितं सततं विनोदं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २६ ॥

आत्मस्वरूप मैं कर्मसे रहित होकर भी सदा महत्कर्म करता रहता हूँ, मैं निःसंग होकर भी परमलीलाका आनन्द लेता हूँ,

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५७४ * गीता-संग्रह *


देहरहित और निराकार होकर मैं निरन्तर विनोदका रस लेता हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ २६॥

मायाप्रपञ्चरचना न च मे विकारः
कौटिल्यदम्भरचना न च मे विकारः।
सत्यानृतेति रचना न च मे विकारो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ २७॥

माया-प्रपंचकी रचना मेरा विकार नहीं है, कुटिलता तथा दम्भकी रचना भी मेरा विकार नहीं है और सत्य तथा मिथ्याकी रचना भी मेरा विकार नहीं है; मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ २७॥

सन्ध्यादिकालरहितं न च मे वियोगो
ह्यन्तःप्रबोधरहितं बधिरो न मूकः।
एवं विकल्परहितं न च भावशुद्धं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ २८॥

मैं सन्ध्या, मध्याह्न आदि कालोंसे रहित हूँ, किसीके साथ मेरा वियोग नहीं है; मैं अन्तःकरणके ज्ञानसे रहित हूँ, किंतु बधिर और मूक नहीं हूँ। इस प्रकार मैं विकल्पोंसे रहित हूँ (इसलिये अन्तःकरणके अभावमें) मुझमें भाव-शुद्धि भी नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ २८॥

निर्नाथनाथरहितं हि निराकुलं वै
निश्चिन्तचित्तविगतं हि निराकुलं वै।
संविद्धि सर्वविगतं हि निराकुलं वै
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ २९॥

मैं स्वामीसे रहित हूँ और मैं भी किसीका स्वामी नहीं हूँ। मैं

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  • अवधूतगीता ( १ ) * ५७५

व्याकुलतासे रहित हूँ। मैं चिन्तासे रहित हूँ और चित्तसे भी रहित हूँ। मैं प्रशान्त हूँ, तुम मुझे सर्वसे रहित तथा आकुलतारहित जानो। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ २९ ॥

कान्तारमन्दिरमिदं हि कथं वदामि
संसिद्धसंशयमिदं हि कथं वदामि।
एवं निरन्तरसमं हि निराकुलं वै
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३० ॥

यह जगत् निर्जन वनस्थली है, यह मैं कैसे कहूँ; यह वास्तवमें है या इसमें संशय है—ऐसा भी मैं किस प्रकार कहूँ? इसी प्रकार यह निरन्तर सम है तथा निराकुल है—ऐसा भी मैं किस प्रकार कहूँ? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३० ॥

निर्जीवजीवरहितं सततं विभाति
निर्बीजबीजरहितं सततं विभाति।
निर्वाणबन्धरहितं सततं विभाति
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३१ ॥

(मुझे यह संसार) निर्जीव (जड़) और जीव (चेतन) सभीसे सदा रहित ही प्रतीत होता है, निर्बीज और सबीज (पदार्थों)-से सदा रहित प्रतीत होता है और निर्वाण तथा बन्धनसे भी सदा रहित प्रतीत होता है (क्योंकि यह मायामात्र है)। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३१ ॥

सम्भूतिवर्जितमिदं सततं विभाति
संसारवर्जितमिदं सततं विभाति।
संहारवर्जितमिदं सततं विभाति
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३२ ॥

यह परमतत्त्व मुझे निरन्तर उत्पत्तिसे रहित प्रतीत होता है, यह

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५७६ * गीता-संग्रह *


मुझे निरन्तर नाशसे रहित भी प्रतीत होता है और यह मुझे निरन्तर संसारसे रहित प्रतीत होता है, [ब्रह्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥३२॥

उल्लेखमात्रमपि ते न च नामरूपं
निर्भिन्नभिन्नमपि ते न हि वस्तु किञ्चित्।
निर्लज्जमानस करोषि कथं विषादं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३३॥

किंचिन्मात्र भी तुम्हारा नाम तथा रूप नहीं है, तुम्हारे भेदरहित स्वरूपमें भेद उत्पन्न करनेवाली कोई भी वस्तु नहीं है; तब हे निर्लज्ज मन! तुम क्यों विषाद करते हो, [ब्रह्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३३॥

किं नाम रोदिषि सखे न जरा न मृत्युः
किं नाम रोदिषि सखे न च जन्मदुःखम्।
किं नाम रोदिषि सखे न च ते विकारो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३४॥

हे सखे! तुम क्यों रोते हो, तुम्हें न तो जरा और न तो मृत्यु ही व्याप्त कर सकती है। हे सखे! तुम क्यों रोते हो, तुम्हें तो जन्मका दुःख भी नहीं हो सकता है। हे सखे! तुम क्यों रोते हो, तुम्हें कोई विकार नहीं हो सकता। [ब्रह्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३४॥

किं नाम रोदिषि सखे न च ते स्वरूपं
किं नाम रोदिषि सखे न च ते विरूपम्।
किं नाम रोदिषि सखे न च ते वयांसि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३५॥

हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, (यह शरीर) तुम्हारा

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  • अवधूतगीता ( १ ) * ५७७

[वास्तविक] स्वरूप नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते
हो, तुम्हारा रूप नष्ट होनेवाला नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये
रुदन करते हो, आयु आदि भी तुम्हारे नहीं हैं। मैं ज्ञानरूपी अमृत
हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३५ ॥

किं नाम रोदिषि सखे न च ते वयांसि
किं नाम रोदिषि सखे न च ते मनांसि।
किं नाम रोदिषि सखे न तवेन्द्रियाणि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३६॥

हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, आयु आदि तुम्हारे नहीं
हैं। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, मन आदि भी तुम्हारे
नहीं हैं। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, इन्द्रियाँ भी तुम्हारी
नहीं हैं। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान
[व्यापक] हूँ॥ ३६ ॥

किं नाम रोदिषि सखे न च तेऽस्ति कामः
किं नाम रोदिषि सखे न च ते प्रलोभः।
किं नाम रोदिषि सखे न च ते विमोहो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥ ३७॥

हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम्हारे अन्तःकरणमें
कामना नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम्हारे
अन्तःकरणमें लोभ नहीं है। हे सखे! तुम किसलिये रुदन करते हो,
तुम्हारे अन्तःकरणमें मोह नहीं है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ
तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३७॥

ऐश्वर्यमिच्छसि कथं न च ते धनानि
ऐश्वर्यमिच्छसि कथं न च ते हि पत्नी।