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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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५६० * गीता-संग्रह *


अनेनैव प्रकारेण बुद्धिभेदो न सर्वगः।
दाता च धीरतामेति गीयते नामकोटिभिः॥ २२॥

जैसे पूर्णिमाका अति निर्मल एक ही चन्द्रमा दिखायी देता है, उसी प्रकार आत्मा भी अति निर्मल तथा एक ही है; अतः आत्माको उसी चन्द्रमाके समान एकरूप देखना चाहिये। दो चन्द्रमाका दिखायी देना जैसे नेत्रदोष है, वैसे ही द्वैतभाव रखना भ्रमज्ञान है। इस पूर्वोक्त प्रकारसे ही सर्वगत चेतनके प्रति किसी भी तरह भेदकी कल्पना नहीं हो सकती है। इस ज्ञानके प्रदाता धैर्यवान् गुरुकी करोड़ों नामोंसे प्रशंसा की जाती है॥ २१-२२॥

गुरुप्रज्ञाप्रसादेन मूर्खो वा यदि पण्डितः।
यस्तु सम्बुध्यते तत्त्वं विरक्तो भवसागरात्॥ २३॥
रागद्वेषविनिर्मुक्तः सर्वभूतहिते रतः।
दृढबोधश्च धीरश्च स गच्छेत्परमं पदम्॥ २४॥

मूर्ख अथवा विद्वान्—जो कोई भी यदि गुरुकी प्रज्ञाकी कृपासे परमतत्त्वका बोध प्राप्त कर लेता है तो वह राग-द्वेषसे रहित, सभी प्राणियोंके कल्याणमें रत रहनेवाला, स्थिर ज्ञानवाला और भवसागरसे विरक्त हो जाता है तथा प्रशान्त होकर परम पदको प्राप्त करता है॥ २३-२४॥

घटे भिन्ने घटाकाश आकाशे लीयते यथा।
देहाभावे तथा योगी स्वरूपे परमात्मनि॥ २५॥

जैसे घटका नाश होनेपर घटाकाश (घटके भीतरका आकाश) महाकाशमें विलीन हो जाता है, उसी प्रकार देहका नाश हो जानेपर (जीवन्मुक्त) योगी परमात्माके स्वरूपमें विलीन हो जाता है॥ २५॥

उक्तेयं कर्मयुक्तानां मतिर्यान्तेऽपि सा गतिः।
न चोक्ता योगयुक्तानां मतिर्यान्तेऽपि सा गतिः॥ २६॥