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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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  • अवधूतगीता ( १)* ५६५

इमां कथामुक्तवतो गुरोस्त-
द्युक्तस्य तत्त्वं हि समं प्रकाशते ॥ ४० ॥

मन और वाणी भी जिस चेतन आत्माका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं, वहाँ [शिष्यके लिये] गुरुकी उपदेशता कैसे गम्य हो सकती है ! चेतन आत्माका वर्णन करनेवाले और उस आत्मामें जुड़े हुए गुरुको निश्चय ही वह आत्मतत्त्व समरूपसे प्रकाशमान रहता है ॥ ४० ॥

॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायामात्मसंवित्त्युपदेशो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


तीसरा अध्याय

आत्मतत्त्वके ज्ञानरूपी अमृतत्व, समरसत्व एवं आकाश-सदृश व्यापकत्वका विवेचन, आत्मबोध तथा त्यागाभिमानके भी त्यागकी प्रेरणा

अवधूत उवाच

गुणविगुणविभागो वर्तते नैव किञ्चि-
द्रतिविरतिविहीनं निर्मलं निष्प्रपञ्चम् ।
गुणविगुणविहीनं व्यापकं विश्वरूपं
कथमहमिह वन्दे व्योमरूपं शिवं वै ॥ १ ॥

अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले—जिस चेतन आत्मामें सगुण तथा निर्गुणका कुछ भी भेद नहीं है, जो आसक्ति तथा विरक्तिसे विहीन है, निर्मल है, प्रपंचरहित है, गुण तथा विगुणसे रहित है, व्यापक है, विश्वरूप है, आकाशतुल्य व्यापक है और कल्याणस्वरूप है—उस [भेदरहित परमात्मा]-की वन्दना मैं कैसे करूँ? ॥ १ ॥

श्वेतादिवर्णरहितो नियतं शिवश्च
कार्यं हि कारणमिदं हि परं शिवश्च।