गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
Page 567 of 675
Read in context५६६
* गीता-संग्रह *
एवं विकल्परहितोऽहमलं शिवश्च
स्वात्मानमात्मनि सुमित्र कथं नमामि॥२॥
हे सुमित्र ! मैं श्वेत आदि वर्णोंसे रहित तथा सर्वदा कल्याणस्वरूप हूँ। 'मैं कार्य हूँ' अथवा कारण हूँ, यह श्रेष्ठ है अथवा कल्याणस्वरूप है। इस प्रकारके विकल्पसे रहित हूँ और मैं पूर्ण परमात्मस्वरूप हूँ; तब मैं अपने आत्माको अपने आत्मामें किस प्रकार नमस्कार करूँ ? ॥२॥
निर्मूलमूलरहितो हि सदोदितोऽहं
निर्धूमधूमरहितो हि सदोदितोऽहम्।
निर्दीपदीपरहितो हि सदोदितोऽहं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥३॥
मैं अजन्मा और कारणरहित होता हुआ सदा विद्यमान हूँ। निर्धूम और मलरहित मैं बिना दीपकके स्वप्रकाशित होकर सदा विद्यमान हूँ। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ३॥
निष्कामकाममिह नाम कथं वदामि
निःसङ्गसङ्गमिह नाम कथं वदामि।
निःसारसाररहितं च कथं वदामि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥४॥
निष्काम होकर मैं स्वयंको सकाम कैसे कहूँ, निःसंग होकर संगवाला कैसे कहूँ और निःसार (निर्गुण) होकर सारवान् कैसे कहूँ ? मैं तो ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ४॥
अद्वैतरूपमखिलं हि कथं वदामि
द्वैतस्वरूपमखिलं हि कथं वदामि।
नित्यं त्वनित्यमखिलं हि कथं वदामि
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोहऽम्॥५॥
मैं सम्पूर्ण प्रपंचको अद्वैतरूप कैसे कहूँ और सम्पूर्ण प्रपंचको द्वैतरूप