गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- अवधूतगीता ( १ ) * ५६१
या गतिः कर्मयुक्तानां सा च वागिन्द्रियाद्भवेत्।
योगिनां या गतिः क्वापि ह्यकथ्या भवतार्जिता ॥ २७ ॥
कर्मयुक्त मनुष्योंकी जैसी बुद्धि मरण-कालके समय होती है, उनकी वैसी ही गति कही गयी है; किंतु योगियोंकी जैसी मति अन्तकालमें होती है, उनकी वैसी गति नहीं कही गयी है (क्योंकि) कर्मयुक्त मनुष्योंकी जो गति शास्त्रोंमें उल्लिखित है, उसका कथन तो वाणीसे किया जा सकता है, किंतु योगियोंकी जो स्थिति तुमने प्राप्त कर ली है, वह वाणीसे नहीं कही जा सकती ॥ २६-२७ ॥
एवं ज्ञात्वा त्वमुं मार्गं योगिनां नैव कल्पितम्।
विकल्पवर्जनं तेषां स्वयं सिद्धिः प्रवर्तते ॥ २८ ॥
इस प्रकार उन योगियोंके विकल्परहित इस मार्गको जानकर (साधककी) स्वतः सिद्धि हो जाती है; यह मार्ग [कर्मियोंके मार्गकी भाँति] विकल्पयुक्त नहीं है ॥ २८ ॥
तीर्थे वान्त्यजगेहे वा यत्र कुत्र मृतोऽपि वा।
न योगी पश्यते गर्भं परे ब्रह्मणि लीयते ॥ २९ ॥
तीर्थमें अथवा चाण्डालके घरमें अथवा जहाँ-कहीं भी मरनेपर [जीवन्मुक्त] योगी पुनः गर्भमें नहीं जाता है; वह परब्रह्ममें लीन हो जाता है ॥ २९ ॥
सहजमजमचिन्त्यं यस्तु पश्येत् स्वरूपं
घटति यदि यथेष्टं लिप्यते नैव दोषैः।
सकृदपि तदभावात्कर्म किञ्चिन्न कुर्यात्
तदपि न च विबद्धः संयमी वा तपस्वी ॥ ३० ॥
जो साधक आत्माके स्वाभाविक, अनादि तथा अचिन्त्य स्वरूपको एक बार भी देख लेता है, तब यदि वह यथेष्ट कर्म करता है तो भी दोषोंसे लिप्त नहीं होता। संयमी या तपस्वी होकर यदि वह कुछ