गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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निष्कर्मको वा यदि वा सकर्मक-
स्तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्॥ ३७॥
ज्ञानी साधक सम्यक् संयम करनेवाला हो अथवा संयम करनेवाला न हो; संग्रह करनेवाला हो अथवा संग्रह करनेवाला न हो; कर्मरहित हो या कर्मयुक्त हो—वह उस परमेश्वर शाश्वत आत्माको प्राप्त होता है॥ ३७॥
मनो न बुद्धिर्न शरीरमिन्द्रियं
तन्मात्रभूतानि न भूतपञ्चकम्।
अहङ्कृतिश्चापि वियत्स्वरूपकं
तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम्॥ ३८॥
जो मन नहीं है, बुद्धि नहीं है, शरीर नहीं है, इन्द्रियाँ नहीं हैं, तन्मात्राएँ नहीं हैं, पाँच महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश) नहीं हैं तथा अहंकार भी नहीं है; और जो आकाशके स्वरूपवाला है, उस परमेश्वर शाश्वत आत्माको साधक प्राप्त होता है॥ ३८॥
विधौ निरोधे परमात्मतां गते
न योगिनश्चेतसि भेदवर्जिते।
शौचं न वाशौचमलिङ्गभावना
सर्वं विधेयं यदि वा निषिध्यते॥ ३९॥
योगीके परमात्मभावको प्राप्त तथा भेदरहित चित्तमें विधि तथा निषेधका विचार नहीं रहता है, उनके लिये पवित्रता तथा अपवित्रताका भी भाव नहीं रहता, उनमें विशिष्ट पहचान बनानेकी भावना नहीं रहती। उनके लिये सब कुछ विधेय अथवा निषिद्ध हो जाता है॥ ३९॥
मनो वचो यत्र न शक्तमीरितुं
नूनं कथं तत्र गुरूपदेशता।