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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

About this granth

Beyond the Bhagavad Gita, the epics and Puranas contain many other dialogues called 'Gitas'. Gita Sangraha (गीता-संग्रह, Gita Press book no. 1958) gathers twenty-five of them, each with its original text and a Hindi translation.

The contents show the range: the Ganesha Gita from the Ganesha Purana; the Bhikshu, Paramahamsa, Hamsa and Avadhuta Gitas from the Bhagavata; from the Mahabharata the Shadja, Pingala, Shampaka, Manki, Ajagara, Harita, Vritra, Putra, Kama and Narada Gitas, a second Hamsa Gita and the Uttara Gita; two Yama Gitas from the Vishnu and Agni Puranas; two Rama Gitas from the Adhyatma and Adbhuta Ramayanas; the Bhagavati (Parvati) Gita from the Devi Purana; and the Ashtavakra Gita and Dattatreya's Avadhuta Gita.

Many of these are short teachings on detachment, contentment, self-knowledge and devotion, such as the courtesan Pingala's awakening or the sage who lives like a python. The copy here is the sixth reprint, of Samvat 2074, and its 675 pages bring these scattered texts together in one volume.

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५०२ * गीता-संग्रह *

त्वय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः।
उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः॥ ११॥
तुम अनन्त महासमुद्र हो और तुममें यह विश्व एक नन्हीं-सी तरंग। यह स्वभावसे ही उठे या न उठे, इससे न तो तुम्हारा कोई लाभ है और न हानि॥ ११॥

तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत्।
अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना॥ १२॥
वत्स! तुम केवल चित्स्वरूप हो। यह जगत् तुमसे भिन्न नहीं है। ऐसी स्थितिमें किसे, कहाँ, क्यों हेय और उपादेयकी कल्पना हो॥ १२॥

एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि।
कुतो जन्म कुतः कर्म कुतोऽहङ्कार एव च॥ १३॥
तुम एक अविनाशी, शान्त एवं निर्मल चिदाकाश हो। तुममें जन्म कहाँ? कर्म कहाँ? और अहंकार ही कहाँ?॥ १३॥

यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे।
किं पृथग्भासते स्वर्णात्कटकाङ्गदनूपुरम्॥ १४॥
जो कुछ तुम देखते हो उस दीखनेवाले पदार्थके रूपमें एकमात्र तुम्हीं प्रतीत हो रहे हो। क्या कड़े, बाजूबन्द और पायजेब स्वर्णसे पृथक् प्रतीत होते हैं?॥ १४॥

अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति सन्त्यज।
सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव॥ १५॥
यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूँ, इस बँटवारेको छोड़ दो। सब आत्मा ही है—ऐसा निश्चय करके निःसंकल्प और सुखी हो जाओ॥ १५॥

तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः।
त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन॥ १६॥
तुम्हारे निज स्वरूपके अज्ञानसे ही विश्वकी सत्ता है। परमार्थतः

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* अष्टावक्रगीता * ५०३


एकमात्र तुम ही हो, तुमसे भिन्न न तो कोई संसारी (जीव) है और न कोई असंसारी (ईश्वर) ॥ १६ ॥

भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति॥ १७॥

यह विश्व भ्रान्तिमात्र है। वस्तुतः कुछ नहीं है। जिसका ऐसा निश्चय हो गया है, उसकी वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं। वह स्फूर्ति-मात्र रहता है, वह ‘न कुछ’ के समान निर्वाणका अनुभव करता है॥ १७॥

एक एव भवाम्भोधावासीदस्ति भविष्यति।
न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृतकृत्यः सुखं चर॥ १८॥

इस संसार-समुद्रमें एक ही था, है और रहेगा। न तुम्हारा बन्धन है और न तो मोक्ष। तुम कृतकृत्य हो, सुखसे विचरो॥ १८॥

मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय।
उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे॥ १९॥

हे चित्स्वरूप! संकल्प और विकल्पके द्वारा अपना चित्त क्षुब्ध मत करो। उपशम—शान्त हो जाओ और अपने आनन्दस्वरूप आत्मामें सुखसे रहो॥ १९॥

त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद्धृदि धारय।
आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि॥ २०॥

तुम कहीं भी किसीका भी ध्यान मत करो। कहीं कुछ भी हृदयमें धारण मत करो। तुम नित्य मुक्त आत्मा हो। विचार करके भी क्या करोगे॥ २०॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां तत्त्वोपदेशविंशतिकं नाम पञ्चदशं प्रकरणं समाप्तम्॥ १५॥

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५०४ * गीता-संग्रह *


सोलहवाँ प्रकरण

स्वरूपस्थितिमें सुख-शान्ति

आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकnames/शः।
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणादृते ॥ १॥
वत्स! चाहे तुम बार-बार अनेक शास्त्रोंका अध्ययन करो या श्रवण करो। फिर भी जबतक तुम सबको भूल नहीं जाओगे, तबतक तुम्हारी स्वरूप-स्थिति नहीं हो सकती ॥ १॥

भोगं कर्म समाधिं वा कुरु विज्ञ तथापि ते।
चित्तं निरस्तसर्वाशमत्यर्थं रोचयिष्यति ॥ २॥
विवेकी! तुम भोग करो, कर्म करो या समाधि लगाओ। तुम्हें परम सुख-शान्तिका अनुभव तो तभी होगा, जब तुम्हारे चित्तसे सभी आशाएँ सर्वथा मिट जायँगी ॥ २॥

आयासात्सकलो दुःखी नैनं जानाति कश्चन।
अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम् ॥ ३॥
कर्म-प्रयत्नसे ही सब दुःखी हैं, परंतु इस बातको कोई समझता ही नहीं है। शुद्धान्तःकरण पुरुष केवल इसी उपदेशसे परम सुख-शान्तिकी प्राप्ति करते हैं ॥ ३॥

व्यापारे खिद्यते यस्तु निमेषोन्मेषयोरपि।
तस्यालस्यधुरीणस्य सुखं नान्यस्य कस्यचित् ॥ ४॥
जो महापुरुष आँख खोलने और मूँदनेमें भी खेदका अनुभव करता है, उसी आलसी-शिरोमणिको सुख है और किसीको नहीं ॥ ४॥

इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तं यदा मनः।
धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत् ॥ ५॥
'जब यह किया और यह नहीं किया'—इन द्वन्द्वोंसे मन मुक्त हो जाता है, तब वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंसे निरपेक्ष हो जाता है ॥ ५॥

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* अष्टावक्रगीता * ५०५


विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः।
ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान्॥ ६॥

विरक्त पुरुष विषयमें द्वेष करता है और रागी पुरुष विषयोंके लिये मचलता रहता है, परंतु जो ग्रहण और त्यागके भावसे रहित है, वह तो न विरक्त है और न रागी है॥ ६॥

हेयोपादेयता तावत्संसारविटपाङ्कुरः।
स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम्॥ ७॥

त्याज्य और ग्राह्यका भेद संसाररूप वृक्षका अंकुर है, जबतक अविवेकजन्य स्पृहा जीवित रहती है, तभीतक इसका अस्तित्व रहता है॥ ७॥

प्रवृत्तौ जायते रागो निवृत्तौ द्वेष एव हि।
निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमानेवमेव व्यवस्थितः॥ ८॥

प्रवृत्तिमें राग हो जाता है और निवृत्तिमें द्वेष हो जाता है, परंतु विवेकी पुरुष तो बालकके समान निर्द्वन्द्व होकर यों ही (प्रवृत्ति-निवृत्तिमें समान) रहता है॥ ८॥

हातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया।
वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति॥ ९॥

रागी पुरुष दुःखसे छूटनेकी इच्छासे संसारका त्याग करना चाहता है, परंतु वीतराग पुरुष दुःखरहित होनेके कारण संसारमें भी खेदका अनुभव नहीं करता॥ ९॥

यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा।
न च योगी न वा ज्ञानी केवलं दुःखभागसौ॥ १०॥

जिसको अपनी मुक्तिका भी अभिमान है और शरीरमें भी ममता है—वह न तो योगी है न ज्ञानी, केवल दुःखका ही वह हकदार है॥ १०॥

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५०६ * गीता-संग्रह *


हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा।
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणादृते ॥ ११ ॥

चाहे तुम्हें शिवजी, भगवान् विष्णु अथवा ब्रह्मा ही उपदेश क्यों न करें; फिर भी सबका विस्मरण हुए बिना तुम्हारी स्वरूप-स्थिति नहीं हो सकती ॥ ११ ॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां विशेषोपदेशं नाम षोडशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १६ ॥


सत्रहवाँ प्रकरण

जीवन्मुक्त महापुरुषके लक्षण

तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा।
तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकी रमते तु यः॥ १ ॥

जो अपने आपमें तृप्त है, जिसकी इन्द्रियाँ पवित्र हैं और जो हमेशा अपने एकाकीपनेमें ही रमता है, उसने ज्ञानका तथा योगाभ्यासका फल प्राप्त कर लिया ॥ १ ॥

न कदाचिज्जगत्यस्मिंस्तत्त्वज्ञो हन्त खिद्यति।
यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥ २ ॥

बड़े आश्चर्यकी बात है कि तत्त्वज्ञ पुरुष इस जगत्में कभी खेदका अनुभव नहीं करता; क्योंकि उस एकके ही द्वारा यह समस्त ब्रह्माण्ड-मण्डल परिपूर्ण हो रहा है ॥ २ ॥

न जातु विषयाः केऽपि स्वरामं हर्षयन्त्यमी।
सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निम्बपल्लवाः॥ ३ ॥

आत्माराम पुरुषको दृश्य जगत्के कोई भी विषय कभी हर्षित करनेमें समर्थ नहीं हैं, ठीक वैसे ही जैसे मीठी-मीठी सल्लकी लताके पत्तोंसे तृप्त हाथीको नीमके कड़वे पत्ते ॥ ३ ॥

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  • अष्टावक्रगीता * ५०७

यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासितः।
अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी तादृशो भवदुर्लभः ॥४॥

जो महापुरुष भोगोंका भोग समाप्त हो जानेपर उनकी वासनासे युक्त नहीं रहता और भोगोंके न मिलनेपर उनकी आकांक्षा नहीं करता, ऐसा (महापुरुष) संसारमें दुर्लभ है॥४॥

बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते।
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी विरलो हि महाशयः ॥५॥

इस जगत्में भोगके इच्छुक और मुमुक्षु दोनों ही मिलते हैं, परंतु ऐसा महापुरुष जो भोग और मोक्ष दोनों नहीं चाहता हो कोई विरला ही होता है॥५॥

धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा।
कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि॥६॥

किसी भी उदारचित्त तत्त्वज्ञानी पुरुषकी धर्म, अर्थ, काम, मोक्षरूप पुरुषार्थों तथा जीवन-मरणमें हेयोपादेय बुद्धि नहीं होती॥६॥

वाञ्छा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ।
यथा जीविकया तस्माद्धन्य आस्ते यथासुखम् ॥७॥

न विश्वके विलयकी इच्छा है और न तो इसकी स्थितिसे कोई द्वेष है, इसलिये कृतकृत्य पुरुष जैसे जीवन-निर्वाह हो, वैसे ही यथा-प्राप्तमें मौजसे रहते हैं॥७॥

कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती।
पश्यञ्शृण्वन् स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥८॥

इस ज्ञानसे मैं कृतार्थ हूँ—ऐसा निश्चय होते ही बुद्धि-वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं, इसलिये कृतार्थ पुरुष नेत्रसे दर्शन, श्रोत्रसे श्रवण, त्वचासे स्पर्श, नासिकासे घ्राण और रसनासे रस ग्रहण करता हुआ भी मस्तीसे रहता है॥८॥

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५०८

  • गीता-संग्रह *

शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च।
न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे ॥ ९ ॥

जिसके लिये संसार-सागर सूख गया है, उसकी दृष्टि शून्य रहती है, चेष्टाएँ व्यर्थ हैं अथवा इन्द्रियाँ विकल हैं—इन बातोंमें न तो उसे स्पृहा है न तो विरक्ति ॥ ९ ॥

न जागर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति।
अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः ॥ १० ॥

बड़े आश्चर्यकी बात है कि मुक्तचित्त पुरुषकी कुछ विलक्षण ही अनिर्वचनीय-सी दशा होती है, वह न जागता है न सोता है, न आँखें खोलता है न मीचता है ॥ १० ॥

सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः।
समस्तवासनामुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते ॥ ११ ॥

मुक्तपुरुष सर्वत्र स्वस्थ रहता है। सर्वत्र उसका हृदय निर्मल रहता है। लेशमात्र भी वासना उसका स्पर्श नहीं कर सकती। वह सर्वत्र एक-सा शोभायमान होता है ॥ ११ ॥

पश्यञ्शृण्वन् स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन् गृह्णन् वदन् व्रजन्।
ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः ॥ १२ ॥

जीवन्मुक्त महापुरुष देखते, सुनते, छूते, सूँघते, भोगते, पकड़ते, बोलते और चलते हुए भी इच्छा एवं अनिच्छासे मुक्त ही रहता है। वास्तवमें वह मुक्त ही है ॥ १२ ॥

न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति।
न ददाति न गृह्णाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः ॥ १३ ॥

मुक्तपुरुषको किसी भी (अनात्माके समान प्रतीयमान) वस्तुमें रस नहीं है। इसलिये वह निन्दा-स्तुति, हर्ष-क्रोध, दान और आदानसे सर्वथा रहित होता है ॥ १३ ॥

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  • अष्टावक्रगीता * ५०९

सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वा मृत्युं वा समुपस्थितम्।
अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः॥१४॥
जो महापुरुष अपने सामने अनुरागवती युवती अथवा मृत्युको भी उपस्थित देखकर विह्वल नहीं होता, स्वस्थ रहता है; वह मुक्त ही है॥१४॥

सुखे दुःखे नरे नार्यां सम्पत्सु च विपत्सु च।
विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः॥१५॥
स्थितप्रज्ञ एवं सर्वत्र समदर्शी पुरुषके लिये सुख-दुःख, स्त्री-पुरुष और सम्पत्ति-विपत्तिमें कोई अन्तर नहीं रहता है॥१५॥

न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता।
नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे॥१६॥
जिस पुरुषका संसार-भाव नष्ट हो चुका है—उसमें न हिंसा है और न करुणा, न उच्छृंखलता है और न दीनता। उसके लिये न तो कहीं आश्चर्यकी बात है और न क्षोभकी॥१६॥

न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः।
असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते॥१७॥
मुक्तपुरुष न तो विषयोंमें द्वेष करता है और न तो उनके लिये लोलुप होता है। उसका मन कहीं भी आसक्त नहीं होता। वह सदा प्राप्त एवं अप्राप्त परिस्थितिका समादर करता है॥१७॥

समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः ।
शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः॥१८॥
जिसका चित्त शून्य हो गया है और जो अपने कैवल्य-स्वरूपमें मानो स्थित है, वह पुरुष समाधि और विक्षेप, हित और अहितकी झूठी कल्पनाओंको जानता ही नहीं है॥१८॥

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५१० * गीता-संग्रह *


निर्ममो निरहङ्कारो न किञ्चिदिति निश्चितः।
अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि न लिप्यते॥१९॥
जिसकी अहंता और ममता नष्ट हो चुकी है, जिसका यह निश्चय है कि यह दृश्य संसार कुछ है नहीं, जिसकी सब आशा भीतर ही गल गयी हैं, वह करता हुआ भी कर्तृत्व (कर्म अथवा फल)-से लिप्त नहीं होता॥ १९॥

मनःप्रकाशसम्मोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः।
दशां कामपि सम्प्राप्तो भवेद् गलितमानसः॥२०॥
जिसका मन सत्ताशून्य हो चुका है, वह किसी ऐसी अनिर्वचनीय अवस्थामें स्थित हो जाता है कि न तो उसे मनकी प्रकाश, मोह अथवा स्वप्नावस्था कह सकते हैं और न तो जड़ अवस्था ही कह सकते हैं॥ २०॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां तत्त्वज्ञस्वरूपविंशतिकं नाम सप्तदशं प्रकरणं समाप्तम्॥ १७॥


अठारहवाँ प्रकरण

तत्त्वज्ञ पुरुषका लक्षण

यस्य बोधोदये तावत्स्वप्नवद् भवति भ्रमः।
तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे॥१॥
जिसको बोधका उदय होनेपर, जागनेपर स्वप्नके समान भ्रमकी निवृत्ति हो जाती है, उस एकमात्र सुखस्वरूप शान्त प्रकाशको नमस्कार है॥ १॥

अर्जयित्वाखिलानर्थान् भोगानाप्नोति पुष्कलान्।
न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत्॥२॥
कोई जगत्‌के समस्त पदार्थोंका उपार्जन करके अधिक-से-अधिक भोग प्राप्त कर सकता है, परंतु सबका परित्याग किये बिना कोई सुखी नहीं हो सकता॥ २॥

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  • अष्टावक्रगीता * ५११

कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः ।
कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम् ॥ ३ ॥

जिसका चित्त यह कर्तव्य है, यह अकर्तव्य है इत्यादि दुःखोंकी तीव्र ज्वालासे झुलस रहा है, उसे भला कर्म-त्यागरूप शान्तिकी पीयूष-धाराका सेवन किये बिना सुखकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? ॥ ३ ॥

भवोऽयं भावनामात्रो न किञ्चित्परमार्थतः ।
नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम् ॥ ४ ॥

यह संसार केवल भावना है, परमार्थतः कुछ नहीं है। भाव और अभावके रूपमें स्वभावतः स्थित पदार्थोंका कभी अभाव नहीं हो सकता ॥ ४ ॥

न दूरं न च सङ्कोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम् ।
निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम् ॥ ५ ॥

आत्माका स्वरूप न दूर है न निकट। वह तो प्राप्त ही है, तुम स्वयं ही हो। उसमें न विकल्प है, न प्रयत्न है, न विकार है और न मल ॥ ५ ॥

व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः ।
वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥ ६ ॥

अज्ञानमात्रकी निवृत्ति होते ही तथा स्वरूपका बोध होते ही दृष्टिका आवरणभंग हो जाता है और तत्त्वज्ञ-पुरुष शोकरहित होकर शोभायमान होते हैं ॥ ६ ॥

समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्तः सनातनः ।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत् ॥ ७ ॥

सब कुछ कल्पनामात्र है और आत्मा नित्य मुक्त है, धीरपुरुष इस बातको जानकर फिर बालकके समान क्या अभ्यास करे ? अर्थात् ज्ञानीके लिये अभ्यास निरर्थक है ॥ ७ ॥

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५१२ * गीता-संग्रह *


आत्मा ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ च कल्पितौ।
निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥ ८॥
आत्मा ही ब्रह्म है और भाव-अभाव कल्पित हैं—ऐसा निश्चय होते ही निष्काम ज्ञानी फिर क्या जाने, क्या कहे, क्या करे?॥ ८॥

अयं सोऽहमयं नाहमिति क्षीणा विकल्पनाः।
सर्वमात्मेति निश्चित्य तृष्णींभूतस्य योगिनः॥ ९॥
सब आत्मा ही है—ऐसा निश्चय करके जो चुप हो गया है, उस पुरुषके लिये यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूँ इत्यादि विकल्पनाएँ शान्त हो जाती हैं॥ ९॥

न विक्षेपो न चैकाग्र्यं नातिबोधो न मूढता।
न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः॥ १०॥
अपने स्वरूपमें स्थित होकर शान्त हुए तत्त्वज्ञके लिये न विक्षेप है और न तो एकाग्रता, न ज्ञान है, न अज्ञान, न सुख है न दुःख॥ १०॥

स्वाराज्ये भैक्ष्यवृत्तौ च लाभालाभे जने वने।
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः॥ ११॥
जो तत्त्वज्ञ योगी स्वभावसे ही निर्विकल्प है, उसके लिये अपने राज्यमें अथवा भिक्षामें, लाभ-हानिमें, भीड़में अथवा सूने जंगलमें कोई अन्तर नहीं है॥ ११॥

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकिता।
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः॥ १२॥
यह कर लिया और वह कार्य शेष है—इन द्वन्द्वोंसे जो (तत्त्वज्ञ) मुक्त है, उसके लिये धर्म कहाँ, काम कहाँ, अर्थ कहाँ और विवेक भी कहाँ है?॥ १२॥

कृत्यं किमपि नैवास्ति न कापि हृदि रञ्जना।
यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः॥ १३॥
जीवन्मुक्त ज्ञानीके लिये न तो कुछ कर्तव्य है और न तो उसके

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* अष्टावक्रगीता * ५१३

हृदयमें कोई अनुराग है। जिस प्रकार जीवन बीते, वही उसकी स्थिति है॥ १३॥

क्व मोहः क्व च वा विश्वं क्व तद्ध्यानं क्व मुक्तता।
सर्वसङ्कल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः॥ १४॥

जो महात्मा समस्त संकल्पोंकी सीमापर विश्राम कर रहा है (साक्षीमात्र है), उसके लिये अज्ञान कहाँ, विश्व कहाँ, ध्यान कहाँ और मुक्ति भी कहाँ है?॥ १४॥

येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै।
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥ १५॥

जिसने इस विश्वको कभी यथार्थ देखा हो, वह कहा करे कि यह नहीं है, नहीं है। जिसे विषय-वासना ही नहीं है, वह क्या करे? वह तो देखता हुआ भी नहीं देखता॥ १५॥

येन दृष्टं परं ब्रह्म सोऽहं ब्रह्मेति चिन्तयेत्।
किं चिन्तयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न पश्यति॥ १६॥

जिसने अपनेसे भिन्न परब्रह्मको देखा हो, वह इस तरह चिन्तन किया करे कि मैं ही ब्रह्म हूँ—सोऽहं सोऽहं, किंतु जिसे कुछ दूसरा दीखता ही नहीं, वह निश्चिन्त क्या चिन्तन करे?॥ १६॥

दृष्टो येनात्मविक्षेपो निरोधं कुरुते त्वसौ।
उदारस्तु न विक्षिप्तः साध्याभावात्करोति किम्॥ १७॥

जिसने अपने स्वरूपमें कभी विक्षेप देखा हो, वही निरोध करे। तत्त्वज्ञ पुरुष तो कभी विक्षिप्त ही नहीं हुआ। उसके लिये कुछ साध्य ही नहीं है, फिर वह करे क्या?॥ १७॥

धीरो लोकविपर्यस्तो वर्तमानोऽपि लोकवत्।
न समाधिं न विक्षेपं न लेपं स्वस्य पश्यति॥ १८॥

तत्त्वज्ञ-पुरुष तो संसारियोंसे उलटा ही होता है। वह सामान्य

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५१४ * गीता-संग्रह *


लोगों-जैसा व्यवहार करता हुआ भी अपने स्वरूपमें न समाधि देखता
है, न विक्षेप और न तो लेप ही ॥ १८ ॥
भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः।
नैव किञ्चित् कृतं तेन लोकदृष्ट्या विकुर्वता ॥ १९ ॥
तत्त्वज्ञ-पुरुष भाव और अभावसे रहित, तृप्त एवं वासनारहित
होता है। लोक-दृष्टिसे सीधा-उल्टा बहुत कुछ करते रहनेपर भी
वस्तुतः वह कुछ नहीं करता ॥ १९ ॥
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठतः सुखम् ॥ २० ॥
तत्त्वज्ञ-पुरुषका प्रवृत्ति अथवा निवृत्तिसे दुराग्रह नहीं होता है।
जब जो सामने आ जाता है, तब उसे करके वह मौजसे रहता है ॥ २० ॥
निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः।
क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ॥ २१ ॥
ज्ञानी पुरुष वासना, आलम्बन, परतन्त्रता आदिके बन्धनोंसे सर्वथा
मुक्त होता है। प्रारब्धरूपी वायुके वेगसे उसका शरीर उसी प्रकार
गतिशील रहता है, जैसे वायुवेगसे सूखा पत्ता ॥ २१ ॥
असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादिता।
स शीतलमना नित्यं विदेह इव राजते ॥ २२ ॥
संसारमुक्त पुरुषको न कभी कहीं हर्ष होता है और न विषाद।
उसका मन सर्वदा शीतल रहता है और वह (सदेह होनेपर भी)
विदेहके समान शोभायमान होता है ॥ २२ ॥
कुत्रापि न जिहासास्ति आशा वापि न कुत्रचित्।
आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः ॥ २३ ॥
जिसका अन्तःकरण शीतल एवं स्वच्छ है, जो आत्माराम है,
उस धीर पुरुषकी न तो किसी वस्तुके त्यागकी इच्छा होती है और

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  • अष्टावक्रगीता * ५१५

न तो कभी कुछ पानेकी आशा॥ २३॥

प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया।
प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानिता ॥ २४॥

जिस धीरका चित्त स्वभावसे ही शून्य (निर्विषय) है, वह साधारण पुरुषके समान प्रारब्धवश बहुतसे काम करता रहता है, परंतु न उसे मान होता है और न तो अपमान ही॥ २४॥

कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा।
इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न॥ २५॥

‘यह कर्म शरीरने किया है मैंने नहीं, मैं तो शुद्ध स्वरूप हूँ’— इस प्रकार जिसने निश्चय कर लिया है, वह कर्म करता हुआ भी नहीं करता॥ २५॥

अतद्वादीव कुरुते न भवेदपि बालिशः।
जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते ॥ २६॥

सुखी एवं श्रीमान् जीवन्मुक्त पुरुष असत्यवादी विषयीके समान काम करता है; परंतु विषयी नहीं होता। यह तो संसारका कार्य करता हुआ भी अतिशय शोभाको प्राप्त होता है॥ २६॥

नानाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः।
न कल्पते न जानाति न शृणोति न पश्यति ॥ २७ ॥

जो धीर पुरुष अनेक विचारोंसे थककर अपने स्वरूपमें विश्राम पा चुका है, वह न कल्पना करता है, न जानता है, न सुनता है और न देखता है॥ २७॥

असमाधेरविक्षेपान्न मुमुक्षुर्न चेतरः।
निश्चित्य कल्पितं पश्यन् ब्रह्मैवास्ते महाशयः ॥ २८ ॥

ज्ञानी महापुरुष समाहित चित्तमें आग्रह न होनेके कारण मुमुक्षु

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५१६ * गीता-संग्रह *

नहीं और विक्षेप नहीं होनेके कारण विषयी नहीं है। मेरे सिवाय जो कुछ दीख रहा है सब कल्पित ही है—ऐसा निश्चय करके सबको देखता हुआ वह वास्तवमें ब्रह्म ही है॥ २८॥
यस्यान्तः स्यादहङ्कारो न करोति करोति सः।
निरहङ्कारधीरेण न किञ्चिद्वि कृतं कृतम्॥ २९॥
जिसके भीतर अहंकार है वह देखनेमें कर्म न करे तो भी करता है, पर जो धीर-पुरुष निरहंकार है; वह सब कुछ करते हुए भी कर्मरहित है॥ २९॥
नोद्विग्नं न च सन्तुष्टं कर्तृत्वमदवर्जितम्।
निराशं गतसन्देहं चित्तं मुक्तस्य राजते॥ ३०॥
मुक्त पुरुषके चित्तमें न उद्वेग है, न सन्तोष और न कर्तृत्वका अभिमान ही रहता है। उसके चित्तमें न आशा है, न सन्देह। वास्तवमें ऐसे चित्तकी ही शोभा है॥ ३०॥
निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते।
निर्निमित्तमिदं किन्तु निर्ध्यायति विचेष्टते॥ ३१॥
जीवन्मुक्तका चित्त ध्यानसे विरत होनेके लिये और व्यवहार करनेके लिये प्रवृत्त नहीं होता है, किंतु निमित्त-शून्य होनेपर भी वह ध्यानसे विरत भी होता है और व्यवहार भी करता है॥ ३१॥
तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम्।
अथवायाति सङ्कोचममूढः कोऽपि मूढवत्॥ ३२॥
बुद्धिशून्य पुरुष यथार्थ-तत्त्वका वर्णन सुनकर और अधिक मूढ़ता (संशय-विपर्यय) को प्राप्त होता है अथवा संकुचित हो जाता है। कभी-कभी तो कोई-कोई बुद्धिमान् पुरुष भी उसी मूढ़के समान व्यवहार करने लगते हैं॥ ३२॥

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  • अष्टावक्रगीता * ५१७

एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम्।
धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः ॥ ३३ ॥

मूढ़ पुरुष बार-बार एकाग्रता तथा निरोधका अभ्यास करते रहते हैं। धीर पुरुष सुषुप्तके समान अपने स्वरूपमें स्थित रहते हुए कुछ भी कर्तव्यरूपसे नहीं देखते ॥ ३३ ॥

अप्रयत्नात्प्रयत्नाद्वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिम्।
तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः ॥ ३४ ॥

मूढ़ पुरुष प्रयत्नसे अथवा प्रयत्न-त्यागसे शान्ति नहीं प्राप्त करता। प्रज्ञावान् पुरुष तत्त्वके निश्चयमात्रसे शान्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ३४ ॥

शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपञ्चं निरामयम्।
आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जनाः ॥ ३५ ॥

आत्माके सम्बन्धमें जो लोग अभ्यासमें लग रहे हैं, वे अपने शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपंच और निरामय ब्रह्म-स्वरूपको बिलकुल ही नहीं जानते हैं ॥ ३५ ॥

नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा।
धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः ॥ ३६ ॥

अज्ञानी मनुष्य कर्मरूप अभ्यासके द्वारा मुक्ति नहीं पा सकता और ज्ञानी कर्मरहित होनेपर भी केवल ज्ञानसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ३६ ॥

मूढो नाप्नोति तद् ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति।
अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्म स्वरूपभाक् ॥ ३७ ॥

अज्ञानीको ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं हो सकता; क्योंकि वह ब्रह्म होना चाहता है (इच्छामात्र ही ब्रह्मत्वमें प्रतिबन्धक है)। ज्ञानी पुरुष इच्छा न करनेपर भी परब्रह्म-बोध-स्वरूप रहता है ॥ ३७ ॥

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५१८ * गीता-संग्रह *


निराधाराग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः।
एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः॥ ३८॥
अज्ञानी निराधार आग्रहोंमें पड़कर संसारका पोषण करते रहते हैं। ज्ञानियोंने समस्त अनर्थोंकी जड़ संसार-सत्ताका ही सर्वथा उच्छेद कर दिया है॥ ३८॥

न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति।
धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्य सर्वदा शान्तमानसः॥ ३९॥
अज्ञानीको शान्ति नहीं मिल सकती; क्योंकि वह शान्त होनेकी इच्छासे युक्त है (इच्छा ही अशान्ति है)। ज्ञानी पुरुष तत्त्वका दृढ़ निश्चय करके सर्वदा शान्तचित्त ही रहता है॥ ३९॥

क्वात्मनो दर्शनं तस्य यद्दृष्टमवलम्बते।
धीरास्ते तं न पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम्॥ ४०॥
अज्ञानीको आत्मसाक्षात्कार कैसे हो सकता है, जबकि वह दृश्य पदार्थोंका आलम्बन स्वीकार करता है। ज्ञानी पुरुष वे हैं, जो उन दृश्य पदार्थोंको देखते ही नहीं और अपने अविनाशी स्वरूपको ही देखते हैं॥ ४०॥

क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः॥ ४१॥
जो आग्रह करता है, उस मूर्खका चित्त निरुद्ध कहाँ है? स्थित-प्रज्ञ आत्मारामका चित्त तो सर्वदा स्वाभाविक ही निरुद्ध रहता है॥ ४१॥

भावस्य भावकः कश्चिन्न किञ्चिद्भावकोऽपरः।
उभयाभावकः कश्चिदेवमेव निराकुलः॥ ४२॥
कोई पदार्थ-सत्ताकी भावना करता है और कोई पदार्थोंकी असत्ताकी भावना करता है। ज्ञानीपुरुष तो भाव-अभाव दोनोंकी भावना छोड़कर यों ही निश्चिन्त (मस्त) रहता है॥ ४२॥

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  • अष्टावक्रगीता * ५१९

शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः।
न तु जानन्ति सम्मोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः॥ ४३॥
बुद्धिहीन पुरुष अज्ञानवश अपने शुद्ध अद्वितीय स्वरूपका ज्ञान तो प्राप्त करते नहीं, भावना करते हैं। उन्हें जीवनपर्यन्त शान्ति नहीं मिलती॥ ४३॥

मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते।
निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा॥ ४४॥
मुमुक्षु पुरुषकी बुद्धि कुछ-न-कुछ आलम्बन ग्रहण किये बिना नहीं रहती। मुक्त पुरुषकी बुद्धि तो सर्वथा निष्काम और निरालम्ब ही रहती है॥ ४४॥

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः।
विशन्ति झटिति क्रोडन्निरोधैकाग्र्यसिद्धये॥ ४५॥
अज्ञानी पुरुष विषयरूपी मतवाले हाथियोंको देखकर भयभीत हो जाते हैं और शरणके लिये तुरत निरोध और एकाग्रताकी सिद्धिहेतु झट-पट चित्तकी गुफामें घुस जाते हैं॥ ४५॥

निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः।
पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः॥ ४६॥
वासनाहीन ज्ञानी सिंह है, उसे देखकर विषयके मतवाले हाथी चुपचाप भाग जाते हैं। उनकी एक नहीं चलती। उलटे वे तरह-तरहसे खुशामद करके सेवा करते हैं॥ ४६॥

न मुक्तिकारिकान् धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम्॥ ४७॥
निःशंक तत्त्वज्ञ पुरुष मुक्तिके साधनोंका अभ्यास नहीं करता है, वह तो देखते, सुनते, छूते, सूँघते, भोगते हुए भी आनन्दमें मग्न रहता है॥ ४७॥

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५२० * गीता-संग्रह *


वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः।
नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति ॥ ४८ ॥
शुद्धबुद्धि पुरुष वस्तुतत्त्वका श्रवण करनेमात्रसे आकुलतारहित हो जाता है, फिर आचार-अनाचार अथवा उदासीनतापर उसकी दृष्टि नहीं जाती है॥ ४८ ॥

यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजुः।
शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत् ॥ ४९ ॥
स्वभावस्थ ज्ञानी शुभ हो चाहे अशुभ, जो जब करनेके लिये सामने आ जाता है तब वह उसे सरलतासे कर डालता है। उसकी चेष्टा बच्चेके समान होती है॥ ४९ ॥

स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम्।
स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत् स्वातन्त्र्यात्परमं पदम् ॥ ५० ॥
स्वतन्त्रतासे ही सुखकी प्राप्ति होती है। स्वतन्त्रतासे ही परतत्त्वकी उपलब्धि होती है। स्वतन्त्रतासे ही परम शान्तिकी प्राप्ति होती है। स्वतन्त्रतासे ही परम पद मिलता है॥ ५० ॥

अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा।
तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः ॥ ५१ ॥
जब जिज्ञासु पुरुष अपने-आपको अकर्ता और अभोक्ता निश्चय कर लेता है, तब चित्तकी समस्त वृत्तियाँ क्षीण हो ही जाती हैं॥ ५१ ॥

उच्छृङ्खलाप्याकृतिका स्थितिर्धीरस्य राजते।
न तु सस्पृहचित्तस्य शान्तिर्मूढस्य कृत्रिमा ॥ ५२ ॥
स्थितप्रज्ञ पुरुषकी स्वाभाविक स्थिति उच्छृंखल होनेपर भी श्रेष्ठ है। अज्ञानी पुरुषकी, जिसके चित्तमें अनेक इच्छाएँ भरी हैं बनावटी शान्ति सुशोभित नहीं होती॥ ५२ ॥

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  • अष्टावक्रगीता * ५२१

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरि‌गह्वरान्।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः ॥ ५३ ॥

स्थितप्रज्ञ पुरुष महान् भोगोंमें विलास करते हैं और पर्वतोंकी गहन गुफाओंमें भी प्रवेश करते हैं, किंतु वे कल्पना, बन्धन एवं बुद्धि-वृत्तियोंसे मुक्त होते हैं॥ ५३॥

श्रोत्रियं देवतां तीर्थमङ्गनां भूपतिं प्रियम्।
दृष्ट्वा सम्पूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना ॥ ५४ ॥

स्थितप्रज्ञ पुरुष श्रोत्रिय, देवता, तीर्थ, स्त्री, राजा और प्रियको देखकर उनका सत्कार करता है, परंतु उसके हृदयमें कोई वासना नहीं होती है॥ ५४॥

भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजैः।
विहस्य धिक्कृतो योगी न याति विकृतिं मनाक् ॥ ५५ ॥

सेवक, पुत्र, स्त्री, दौहित्र और सगोत्रके द्वारा हँसी उड़ाये जानेपर, धिक्कार देनेपर भी तत्त्वज्ञ-पुरुषके चित्तमें तनिक भी विकार नहीं होता॥ ५५॥

सन्तुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते।
तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते ॥ ५६ ॥

लोगोंकी दृष्टिसे प्रसन्न दीखनेपर भी वह प्रसन्न नहीं होता और खिन्न दीखनेपर भी खिन्न नहीं होता। उसकी उन आश्चर्यकारी दशाओंको वैसे लोग ही जानते हैं॥ ५६॥

कर्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः।
शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ ५७ ॥

कर्तव्यबुद्धिका नाम ही संसार है। विद्वान् लोग उस कर्तव्यताको ही नहीं देखते; क्योंकि वे शून्याकार, निराकार, निर्विकार एवं निरामय होते हैं॥ ५७॥