गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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निर्ममो निरहङ्कारो न किञ्चिदिति निश्चितः।
अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि न लिप्यते॥१९॥
जिसकी अहंता और ममता नष्ट हो चुकी है, जिसका यह निश्चय है कि यह दृश्य संसार कुछ है नहीं, जिसकी सब आशा भीतर ही गल गयी हैं, वह करता हुआ भी कर्तृत्व (कर्म अथवा फल)-से लिप्त नहीं होता॥ १९॥
मनःप्रकाशसम्मोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः।
दशां कामपि सम्प्राप्तो भवेद् गलितमानसः॥२०॥
जिसका मन सत्ताशून्य हो चुका है, वह किसी ऐसी अनिर्वचनीय अवस्थामें स्थित हो जाता है कि न तो उसे मनकी प्रकाश, मोह अथवा स्वप्नावस्था कह सकते हैं और न तो जड़ अवस्था ही कह सकते हैं॥ २०॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां तत्त्वज्ञस्वरूपविंशतिकं नाम सप्तदशं प्रकरणं समाप्तम्॥ १७॥
अठारहवाँ प्रकरण
तत्त्वज्ञ पुरुषका लक्षण
यस्य बोधोदये तावत्स्वप्नवद् भवति भ्रमः।
तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे॥१॥
जिसको बोधका उदय होनेपर, जागनेपर स्वप्नके समान भ्रमकी निवृत्ति हो जाती है, उस एकमात्र सुखस्वरूप शान्त प्रकाशको नमस्कार है॥ १॥
अर्जयित्वाखिलानर्थान् भोगानाप्नोति पुष्कलान्।
न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत्॥२॥
कोई जगत्के समस्त पदार्थोंका उपार्जन करके अधिक-से-अधिक भोग प्राप्त कर सकता है, परंतु सबका परित्याग किये बिना कोई सुखी नहीं हो सकता॥ २॥