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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 517

५१६ * गीता-संग्रह *

नहीं और विक्षेप नहीं होनेके कारण विषयी नहीं है। मेरे सिवाय जो कुछ दीख रहा है सब कल्पित ही है—ऐसा निश्चय करके सबको देखता हुआ वह वास्तवमें ब्रह्म ही है॥ २८॥
यस्यान्तः स्यादहङ्कारो न करोति करोति सः।
निरहङ्कारधीरेण न किञ्चिद्वि कृतं कृतम्॥ २९॥
जिसके भीतर अहंकार है वह देखनेमें कर्म न करे तो भी करता है, पर जो धीर-पुरुष निरहंकार है; वह सब कुछ करते हुए भी कर्मरहित है॥ २९॥
नोद्विग्नं न च सन्तुष्टं कर्तृत्वमदवर्जितम्।
निराशं गतसन्देहं चित्तं मुक्तस्य राजते॥ ३०॥
मुक्त पुरुषके चित्तमें न उद्वेग है, न सन्तोष और न कर्तृत्वका अभिमान ही रहता है। उसके चित्तमें न आशा है, न सन्देह। वास्तवमें ऐसे चित्तकी ही शोभा है॥ ३०॥
निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते।
निर्निमित्तमिदं किन्तु निर्ध्यायति विचेष्टते॥ ३१॥
जीवन्मुक्तका चित्त ध्यानसे विरत होनेके लिये और व्यवहार करनेके लिये प्रवृत्त नहीं होता है, किंतु निमित्त-शून्य होनेपर भी वह ध्यानसे विरत भी होता है और व्यवहार भी करता है॥ ३१॥
तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम्।
अथवायाति सङ्कोचममूढः कोऽपि मूढवत्॥ ३२॥
बुद्धिशून्य पुरुष यथार्थ-तत्त्वका वर्णन सुनकर और अधिक मूढ़ता (संशय-विपर्यय) को प्राप्त होता है अथवा संकुचित हो जाता है। कभी-कभी तो कोई-कोई बुद्धिमान् पुरुष भी उसी मूढ़के समान व्यवहार करने लगते हैं॥ ३२॥