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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 520
  • अष्टावक्रगीता * ५१९

शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः।
न तु जानन्ति सम्मोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः॥ ४३॥
बुद्धिहीन पुरुष अज्ञानवश अपने शुद्ध अद्वितीय स्वरूपका ज्ञान तो प्राप्त करते नहीं, भावना करते हैं। उन्हें जीवनपर्यन्त शान्ति नहीं मिलती॥ ४३॥

मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते।
निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा॥ ४४॥
मुमुक्षु पुरुषकी बुद्धि कुछ-न-कुछ आलम्बन ग्रहण किये बिना नहीं रहती। मुक्त पुरुषकी बुद्धि तो सर्वथा निष्काम और निरालम्ब ही रहती है॥ ४४॥

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः।
विशन्ति झटिति क्रोडन्निरोधैकाग्र्यसिद्धये॥ ४५॥
अज्ञानी पुरुष विषयरूपी मतवाले हाथियोंको देखकर भयभीत हो जाते हैं और शरणके लिये तुरत निरोध और एकाग्रताकी सिद्धिहेतु झट-पट चित्तकी गुफामें घुस जाते हैं॥ ४५॥

निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः।
पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः॥ ४६॥
वासनाहीन ज्ञानी सिंह है, उसे देखकर विषयके मतवाले हाथी चुपचाप भाग जाते हैं। उनकी एक नहीं चलती। उलटे वे तरह-तरहसे खुशामद करके सेवा करते हैं॥ ४६॥

न मुक्तिकारिकान् धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम्॥ ४७॥
निःशंक तत्त्वज्ञ पुरुष मुक्तिके साधनोंका अभ्यास नहीं करता है, वह तो देखते, सुनते, छूते, सूँघते, भोगते हुए भी आनन्दमें मग्न रहता है॥ ४७॥