गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
About this granth
Beyond the Bhagavad Gita, the epics and Puranas contain many other dialogues called 'Gitas'. Gita Sangraha (गीता-संग्रह, Gita Press book no. 1958) gathers twenty-five of them, each with its original text and a Hindi translation.
The contents show the range: the Ganesha Gita from the Ganesha Purana; the Bhikshu, Paramahamsa, Hamsa and Avadhuta Gitas from the Bhagavata; from the Mahabharata the Shadja, Pingala, Shampaka, Manki, Ajagara, Harita, Vritra, Putra, Kama and Narada Gitas, a second Hamsa Gita and the Uttara Gita; two Yama Gitas from the Vishnu and Agni Puranas; two Rama Gitas from the Adhyatma and Adbhuta Ramayanas; the Bhagavati (Parvati) Gita from the Devi Purana; and the Ashtavakra Gita and Dattatreya's Avadhuta Gita.
Many of these are short teachings on detachment, contentment, self-knowledge and devotion, such as the courtesan Pingala's awakening or the sage who lives like a python. The copy here is the sixth reprint, of Samvat 2074, and its 675 pages bring these scattered texts together in one volume.
४६६ * गीता-संग्रह *
अनन्यचेतसो ये मां भजन्ते भक्तिसंयुताः।
तेषां मुक्तिप्रदा नित्यमहमस्मि महामते ॥ ३३ ॥
राजन्! निरन्तर एकनिष्ठ चित्तवाला होकर जो नित्य मेरा स्मरण करता है, उस भक्तिपरायण योगीको मैं मुक्ति प्रदान करती हूँ। भक्तिपूर्वक मेरा स्मरण करते हुए जो अन्तमें प्राणत्याग करता है, वह कभी भी (पुनर्जन्मादि) सांसारिक दुःखसमूहोंसे पीड़ित नहीं होता। महामते! मेरे प्रति अनन्य चित्तसे जो लोग भक्तिपूर्ण होकर नित्य मुझको भजते हैं, उन्हें मैं मोक्ष प्रदान करती हूँ॥ ३१—३३॥
शक्त्यात्मकं हि मे रूपमनायासेन मुक्तिदम्।
समाश्रय महाराज ततो मोक्षमवाप्स्यसि ॥ ३४ ॥
महाराज! मेरा वह शक्त्यात्मक रूप बिना किसी श्रमके ही मुक्ति देनेवाला है, इसलिये आप उस रूपका आश्रय लीजिये। इससे आप अवश्य ही मोक्ष प्राप्त कर लेंगे॥ ३४ ॥
येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेऽपि मामेव राजेन्द्र यजन्ते नात्र संशयः ॥ ३५ ॥
अहं सर्वमयी यस्मात्सर्वयज्ञफलप्रदा।
किंतु तेष्वेव ये भक्तास्तेषां मुक्तिः सुदुर्लभा ॥ ३६ ॥
राजेन्द्र! जो लोग श्रद्धासे युक्त होकर भक्तिपूर्वक अन्य देवताओंकी भी उपासना करते हैं, वे भी प्रकारान्तरसे मेरी ही उपासना करते हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है। समस्त यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाली मैं यद्यपि सर्वव्यापिनी हूँ, फिर भी जो लोग एकमात्र उन्हीं अन्य देवताओंकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं, उनकी मुक्ति अत्यन्त दुर्लभ है॥ ३५-३६॥
ततो मामेव शरणं देहबन्धविमुक्तये।
याहि संयतचेतास्त्वं मामेष्यसि न संशयः ॥ ३७ ॥
* भगवतीगीता *
४६७
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
सर्वं मदर्पणं कृत्वा मोक्ष्यसे कर्मबन्धनात्॥ ३८॥
अतः देह-बन्धनसे मुक्तिके लिये आप अपने मनको नियन्त्रित करके मेरी ही शरणमें जाइये। ऐसा करनेसे आप मुझे प्राप्त कर लेंगे, इसमें संशय नहीं है। आप जो कुछ करते हैं, खाते हैं, हवन करते हैं और दान करते हैं, वह सब मुझे अर्पण करके आप कर्मबन्धनसे छूट जायँगे॥ ३७-३८॥
ये मां भजन्ति सद्भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।
न च मेऽस्ति प्रियः कश्चिदप्रियोऽपि महामते॥ ३९॥
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
सोऽपि पापविनिर्मुक्तो मुच्यते भवबन्धनात्॥ ४०॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शनैस्तरति सोऽपि च।
मयि भक्तिमतां मुक्तिः सुलभा पर्वताधिप॥ ४१॥
जो लोग सच्ची भक्तिसे मेरी आराधना करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें स्थित हूँ। महामते! मेरे लिये कोई भी प्रिय और अप्रिय नहीं है। अत्यन्त दुराचारी रहा हुआ मनुष्य भी यदि अनन्यभावसे मेरी उपासना करने लगता है तो वह भी पापरहित होकर भवबन्धनसे छूट जाता है।* वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और धीरे-धीरे संसार-सागरको पार भी कर जाता है। पर्वतराज! मुझमें भक्ति रखनेवाले प्राणियोंके लिये मुक्ति सुलभ हो जाती है॥ ३९-४१॥
* पूर्वकालमें दुराचारपरायण रहनेपर भी यदि सत्संगादिके प्रभावसे उसके चित्तमें पश्चात्तापका उदय हो जाता है और दुराचरणसे निवृत्त होकर उसका जगदम्बाके प्रति अनन्यचित्तताका सम्बन्ध बन जाता है तो उस व्यक्तिके सारे पापोंका प्रक्षालन होकर उसकी मुक्ति असंदिग्धरूपसे हो जाती है।
४६८ * गीता-संग्रह *
ततस्त्वं परया भक्त्या मां भजस्व महामते।
अहं त्वां जन्मजलधेस्तारयामि सुनिश्चितम्॥ ४२॥
मन्मना भव मद्याजी मां नमस्कुरु मत्परः।
मामेवैष्यसि संसारदुःखैर्नैव हि बाध्यसे॥ ४३॥
अतः महामते! आप पराभक्तिसे युक्त होकर मेरी आराधना कीजिये। मैं आपको जन्म-मरणरूपी समुद्रसे निश्चितरूपसे पार कर दूँगी। आप मुझमें अनुरक्त मनवाले होइये, मेरे उपासक बनिये, मुझे नमस्कार कीजिये और मेरे परायण होइये। ऐसा करनेसे आप मुझे ही प्राप्त होंगे और सांसारिक कष्ट आपको कभी पीड़ित नहीं कर सकेंगे॥ ४२-४३॥
॥ इति श्रीदेवीपुराणे श्रीभगवतीगीतायां श्रीपार्वती-हिमालयसंवादे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
पाँचवाँ अध्याय
भगवतीगीता (पार्वतीगीता)-के पाठकी महिमा
श्रीमहादेव उवाच
एवं श्रीपार्वतीवक्त्राद्योगसारं परं मुने।
निशम्य पर्वतश्रेष्ठो जीवन्मुक्तो बभूव ह॥ १॥
सापीयं शैलराजाय योगमुक्त्वा महेश्वरी।
मातृस्तन्यं पपौ बाला प्राकृतेव हि लीलया॥ २॥
श्रीमहादेवजी बोले— मुने! इस प्रकार श्रीपार्वतीजीके मुखसे श्रेष्ठ योगसारको सुनकर पर्वतश्रेष्ठ हिमालय जीवन्मुक्त हो गये। वे महेश्वरी भी गिरिराजसे योगका वर्णन करके लीलापूर्वक प्राकृत (सामान्य) बच्चीकी भाँति माताका दूध पीने लगीं॥ १-२॥
* भगवतीगीता * ४६९
गिरीन्द्रस्तु महाहर्षादकरोत्सुमहोत्सवम्।
यथा न दृष्टं केनापि श्रुतं वा केनचित्क्वचित्॥ ३॥
षष्ठेऽह्नि षष्ठीं सम्पूज्य सम्प्राप्ते दशमेऽहनि।
पार्वतीत्यकरोन्नाम सान्वयं पर्वताधिपः॥ ४॥
गिरिराज हिमालयने भी अत्यन्त हर्षोल्लासके साथ बड़ा भारी उत्सव किया, जैसा किसीने कहीं भी न तो देखा था और न सुना था। छठें दिन षष्ठीदेवीकी पूजाकर दसवाँ दिन आनेपर पर्वतराज हिमालयने उनका ‘पार्वती’—ऐसा सार्थक नाम रखा॥ ३-४॥
एवं त्रिजगतां माता नित्या प्रकृतिरुत्तमा।
सम्भूय मेनकागर्भाद्धिमालयगृहे स्थिता॥ ५॥
इस प्रकार तीनों लोकोंकी जननी नित्यस्वरूपिणी श्रेष्ठ प्रकृति मेनकाके गर्भसे उत्पन्न होकर हिमालयके घरमें रहने लगीं॥ ५॥
हिमालयाय पार्वत्या कथितं योगमुत्तमम्।
यः पठेत्सुलभा मुक्तिस्तस्य नारद जायते॥ ६॥
तुष्टा भवति शर्वाणी नित्यं मङ्गलदायिनी।
जायते च दृढा भक्तिः पार्वत्यां मुनिपुङ्गव॥ ७॥
नारद! जो मनुष्य पार्वतीके द्वारा हिमालयसे कहे गये उत्तम योगका पाठ करता है, उसके लिये मुक्ति सुलभ हो जाती है। मुनिवर! भगवती शर्वाणी उस मनुष्यपर सदा प्रसन्न रहती हैं और देवी पार्वतीके प्रति उसके मनमें दृढ़ भक्ति उत्पन्न हो जाती है॥ ६-७॥
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां भक्तिसंयुतः।
पठन् श्रीपार्वतीगीतां जीवन्मुक्तो भवेन्नरः॥ ८॥
शरत्काले महाष्टम्यां यः पठेत्समुपोषितः।
रात्रौ जागरितो भूत्वा तस्य पुण्यं ब्रवीमि किम्॥ ९॥
स सर्वदेवपूज्यश्च दुर्गाभक्तिपरायणः।
इन्द्रादयो लोकपालास्तदाज्ञावशवर्तिनः॥ १०॥
४७० * गीता-संग्रह *
स्वयं दैवीकलामेति साक्षाद्देव्याः प्रसादतः।
नश्यन्ति तस्य पापानि ब्रह्महत्यादिकान्यपि ॥ ११ ॥
पुत्रं सर्वगुणोपेतं लभते चिरजीविनम्।
नश्यन्ति रिपवस्तस्य नित्यं प्राप्नोति मङ्गलम् ॥ १२ ॥
अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथिको भक्तिपरायण होकर श्रीपार्वतीगीताका पाठ करनेवाला मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। शरत्कालमें महाष्टमी तिथिको उपवास करके तथा रातभर जागरण करके जो मनुष्य इसका पाठ करता है, उसके पुण्यका वर्णन मैं क्या करूँ? दुर्गा-भक्तिपरायण वह मनुष्य सभी देवताओंका पूज्य हो जाता है और इन्द्र आदि लोकपाल उसकी आज्ञाके अधीन हो जाते हैं। वह साक्षात् भगवतीकी कृपासे दैवीकलाको स्वयं प्राप्त हो जाता है और उसके ब्रह्महत्या आदि पाप भी नष्ट हो जाते हैं। वह सर्वगुणसम्पन्न तथा दीर्घजीवी पुत्र प्राप्त करता है, उसके शत्रु नष्ट हो जाते हैं और वह नित्य कल्याणकी प्राप्ति करता है॥ ८—१२॥
अमावास्यां तिथिं प्राप्य यः पठेद्भक्तिसंयुतः।
सर्वपापविनिर्मुक्तः स दुर्गातुल्यतामियात् ॥ १३ ॥
निशीथे पठते यस्तु बिल्ववृक्षस्य सन्निधौ।
तस्य संवत्सराद्दुर्गा स्वयं प्रत्यक्षमेति वै ॥ १४ ॥
अमावास्या तिथिके आनेपर जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस श्रीपार्वतीगीताका पाठ करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर दुर्गातुल्य हो जाता है। जो बेलके वृक्षकी संनिधिमें बैठकर अर्धरात्रिमें इसका पाठ करता है; उसे एक वर्षमें ही दुर्गा साक्षात् दर्शन देती हैं॥ १३-१४॥
किमत्र बहुनोक्तेन शृणु नारद तत्त्वतः।
अस्याः पाठसमं पुण्यं नास्त्येव पृथिवीतले ॥ १५ ॥
नारद! इसके विषयमें अधिक क्या कहा जाय ? तत्त्वकी बात
२२- अष्टावक्रगीता (महर्षि अष्टावक्र)
- भगवतीगीता * ४७१
यह है कि पृथ्वीतलपर इस (श्रीपार्वतीगीता)-के पाठके समान कोई भी पुण्य नहीं है॥ १५॥
तपसां यज्ञदानादिकर्मणामिह विद्यते।
फलस्य संख्या नैतस्य विद्यते मुनिपुङ्गव॥ १६॥
मुनिश्रेष्ठ! इस लोकमें तप, यज्ञ-दान आदि कर्मोंके फल तो परिमित हैं, किंतु इस (भगवतीगीता)-के पाठके फलकी कोई सीमा नहीं है॥ १६॥
॥ इति श्रीदेवीपुराणे भगवतीगीतायां श्रीमहादेव-नारदसंवादे पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
॥ भगवतीगीता सम्पूर्णा॥
अष्टावक्रगीता
[ महर्षि अष्टावक्रद्वारा प्रणीत यह गीता अत्यन्त प्राचीनकालसे वेदान्त-मार्गी मुमुक्षु-साधकोंके लिये चिन्तामणिके सदृश प्रकाशमान है। महाभारतके वनपर्वमें प्राप्त अष्टावक्रगीतासे यह सर्वथा भिन्न एक स्वतन्त्र स्तरीय ग्रन्थ है। राजर्षि जनक और अष्टावक्रजीके संवादरूपमें निबद्ध प्रस्तुत गीता अत्यन्त उत्कृष्ट मनोभूमिमें प्रकट हुई है। इसके एक-एक श्लोकमें चिन्तनकी गहराईकी मनोहारी छाप दृष्टिगोचर होती है। अद्वैतज्ञानका निरूपण, उसकी प्राप्तिके चरणबद्ध उपाय तथा ब्रह्मज्ञानीके लक्षण इसमें स्पष्ट रूपसे वर्णित हैं। आत्मकल्याणके इच्छुक साधकोंके लिये परमोपयोगी तथा इक्कीस प्रकरणोंमें विभक्त यह गीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत है— ]
पहला प्रकरण
महर्षि अष्टावक्रका राजा जनकको 'तुम देह नहीं, आत्मा हो'—यह उपदेश देना
जनक उवाच
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् ब्रूहि मम प्रभो॥ १॥
**जनकजी बोले—**हे प्रभो! ज्ञानप्राप्तिका क्या उपाय है? मेरी मुक्ति किस प्रकार होगी? वैराग्य कैसे प्राप्त होता है? आप (कृपा करके) मुझे बतलाइये॥ १॥
अष्टावक्र उवाच
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज।
क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद्भज॥ २॥
**अष्टावक्रजीने कहा—**हे तात! यदि तुम मुक्ति चाहते हो तो विषयोंको विषके समान छोड़ दो और क्षमा, सरलता, दया, सन्तोष एवं सत्यका अमृतके समान सेवन करो॥ २॥
- अष्टावक्रगीता * ४७३
न पृथ्वी न जलं नाग्निं वायुर्द्यौर्न वा भवान्।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये॥ ३॥
तुम न पृथिवी हो, न जल हो, न अग्नि हो, न वायु हो और न आकाश ही हो; मुक्तिके लिये तुम अपने-आपको इन सबका चित्-स्वरूप साक्षी समझो॥ ३॥
यदि देहं पृथक्कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि।
अधुनैव सुखी शान्तः बन्धमुक्तो भविष्यसि॥ ४॥
यदि तुम देहको अलग करके अपने चित्स्वरूपमें शान्त होकर स्थित हो जाओ (अनात्म-तादात्म्यका परित्याग कर दो) तो अभी तत्काल तुम सुखी, शान्त एवं बन्धनमुक्त हो जाओगे॥ ४॥
न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचरः।
असङ्गोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव॥ ५॥
न तुम ब्राह्मणादि किसी वर्णके हो, न ब्रह्मचारी आदि आश्रमी हो, न तुम दृश्य पदार्थ ही हो। तुम असंग हो, निराकार हो, विश्वसाक्षी हो, अतः तुम सुखी और निश्चिन्त हो जाओ॥ ५॥
धर्माधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो।
न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा॥ ६॥
हे विभो! धर्म-अधर्म एवं सुख-दुःखका केवल मनसे ही सम्बन्ध है, तुमसे नहीं। तुम न कर्ता हो और न भोक्ता हो। तुम स्वरूपतः नित्य मुक्त ही हो॥ ६॥
एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।
अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम्॥ ७॥
तुम सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंचके एकमात्र द्रष्टा एवं सर्वदा-सर्वथा मुक्त ही हो। तुम्हारा बन्धन यही है कि तुम द्रष्टाको अपनेसे पृथक् समझते हो। (द्रष्टा अपने-आपसे पृथक् कभी नहीं हो सकता; ऐसा होते ही वह दृश्य हो जायगा।)॥ ७॥
४७४ * गीता-संग्रह *
अहं कर्तेत्यहंमानमहाकृष्णााहिदंशितः।
नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव ॥ ८ ॥
मैं कर्ता हूँ—इस मिथ्याभिमानरूप महान् अजगरने तुमको डँस लिया है। मैं कर्ता नहीं हूँ—इस विश्वासरूपी अमृतका पान करके तुम सुखी हो जाओ॥ ८॥
एको विशुद्धबोधोऽहमिति निश्चयवह्निना।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव ॥ ९ ॥
मैं अद्वितीय एवं विशुद्ध बोधस्वरूप हूँ—इस श्रेष्ठ निश्चयकी आगसे अज्ञानका घोर जंगल जलाकर तुम शोकरहित एवं सुखी हो जाओ॥ ९॥
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत्।
आनन्दपरमानन्दः स बोधस्त्वं सुखं चर ॥ १० ॥
जिस अधिष्ठान आत्मामें यह सम्पूर्ण विश्व रज्जुमें सर्पके समान कल्पित होकर दीख रहा है, वह आनन्द-परमानन्द बोधस्वरूप तुम्हीं हो। अतः सुखी हो जाओ॥ १०॥
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
किंवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत् ॥ ११ ॥
जिसे ‘मैं मुक्त हूँ’—ऐसा अभिमान है, वह मुक्त है और जिसमें ‘मैं बद्ध हूँ’—ऐसा अभिमान है, वह बद्ध है। यह लोकोक्ति सत्य है कि जैसी मति वैसी गति॥ ११॥
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः।
असङ्गो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव ॥ १२ ॥
आत्मा तो साक्षी, विभु, पूर्ण, अद्वितीय, मुक्त, चेतन, निष्क्रिय, असंग, निस्पृह एवं शान्त है। वह भ्रमसे ही संसारी मालूम पड़ता है॥ १२॥
- अष्टावक्रगीता * ४७५
कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय।
आभासोऽहं भ्रमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथान्तरम्॥ १३॥
मैं चिदाभास कर्ता, भोक्ता जीव हूँ—इस भ्रमको तथा बाह्य और भीतरके द्वन्द्व-भावको छोड़कर तुम अपने-आपको अद्वितीय बोधस्वरूप एवं कूटस्थ अनुभव करो॥ १३॥
देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक।
बोधोऽहं ज्ञानखड्गेन तन्निष्कृत्य सुखी भव॥ १४॥
वत्स! तुम चिरकालसे देहाभिमानके फन्देमें फँस रहे हो। 'मैं बोधस्वरूप हूँ' ज्ञानकी इस तलवारसे उसे काटकर सुखी हो जाओ॥ १४॥
निःसङ्गो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरञ्जनः।
अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि॥ १५॥
तुम असंग, अक्रिय, स्वयंप्रकाश एवं मलरहित अत्यन्त शुद्ध हो। तुम्हारा बन्धन तो यही है कि तुम समाधिका अनुष्ठान करते हो। (स्व-स्वरूप स्वतःसिद्ध है, साध्य नहीं)॥ १५॥
त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः।
शुद्धबुद्धस्वरूपस्त्वं मा गमः क्षुद्रचित्तताम्॥ १६॥
यह सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच तुमसे भरपूर है और वस्तुतः तुममें ही ओत-प्रोत है। तुम शुद्ध-बुद्ध स्वरूप हो। तुम क्षुद्र चित्तवाले मत बनो॥ १६॥
निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः।
अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः॥ १७॥
तुम किसीसे अपेक्षा मत रखो, विकृत मत होओ, चिन्ता मत करो और भाररहित हो जाओ। अन्तःकरणको शीतल रखो। तुम्हारी बुद्धिकी थाह किसीको न मिले, वह अनन्तमें लगी रहे। किसी कारणसे क्षुब्ध मत होओ। तुम एकमात्र अपने चित्-स्वरूपमें ही निष्ठा रखो॥ १७॥
४७६ * गीता-संग्रह *
साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलम्।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः ॥ १८ ॥
समस्त साकार वस्तुको मिथ्या समझो और जो निराकार है, वह अचल है। इस तत्त्वका उपदेश प्राप्त कर लेनेपर पुनर्जन्मकी सम्भावना मिट जाती है ॥ १८ ॥
यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेऽन्तः परितस्तु सः।
तथैवास्मिञ्छरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः ॥ १९ ॥
जैसे दर्पणमें दीखनेवाले रूपमें बाहर और भीतर एकमात्र दर्पण ही होता है, ठीक वैसे ही इस शरीरके सम्बन्धमें भी है। इसके बाहर-भीतर भी एकमात्र (परमात्मा) परमेश्वर ही हैं ॥ १९ ॥
एकं सर्वगतं व्योम बहिरन्तर्यथा घटे।
नित्यं निरन्तरं ब्रह्म सर्वभूतगणे तथा ॥ २० ॥
जैसे एक सर्वगत आकाश ही घड़ेके भीतर और बाहर स्थित है, वैसे ही देश, काल और वस्तुके परिच्छेदसे रहित, सजातीय-विजातीय-स्वगत-भेदशून्य नित्य, निरन्तर ब्रह्म ही समस्त दृश्य-पदार्थोंके बाहर और भीतर स्थित है ॥ २० ॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां आत्मानुभवोपदेशवर्णनं नाम प्रथमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १ ॥
दूसरा प्रकरण
दृश्यमान प्रपंच और आत्मसत्ता
अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः।
एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडम्बितः ॥ १ ॥
आश्चर्य है कि मैं तो शुद्ध, शान्त, ज्ञानस्वरूप एवं प्रकृतिसे परे हूँ, किंतु इतने समयतक अज्ञानने ही मुझे भ्रमित कर रखा था ॥ १ ॥
* अष्टावक्रगीता *
४७७
यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत्।
अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किञ्चन॥ २॥
जैसे मैं अकेला ही इस शरीरको प्रकाशित करता हूँ, वैसे ही सम्पूर्ण जगत्को भी प्रकाशित करता हूँ। एकमात्र मैं प्रकाशक हूँ, इसलिये सम्पूर्ण जगत् मेरा है अथवा कुछ भी मेरा नहीं है॥ २॥
सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाधुना।
कुतश्चित्कौशलादेव परमात्मा विलोक्यते॥ ३॥
बड़े आश्चर्यकी बात है कि मैं शरीर और सम्पूर्ण दृश्यजगत्का परित्याग करके किसी अनिर्वचनीय कौशलसे वर्तमान क्षणमें ही परमात्माका दर्शन कर रहा हूँ॥ ३॥
यथा न तोयतो भिन्नास्तरङ्गा फेनबुद्बुदाः।
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम्॥ ४॥
जैसे तरंग, फेन और बुद्बुदे जलसे भिन्न नहीं हैं, वैसे ही यह दृश्यमान प्रपंच भी आत्मसत्तासे पृथक् नहीं है; क्योंकि यह अपना ही बनाया हुआ है॥ ४॥
तन्तुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारतः।
आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम्॥ ५॥
जैसे विचार करनेपर वस्त्र तन्तुमात्र ही है, वैसे ही विचार करनेपर यह सम्पूर्ण विश्व आत्म-सत्तामात्र ही है॥ ५॥
यथैवेक्षुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा।
तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम्॥ ६॥
जैसे शर्करा गन्नेके रससे बनी है और उससे व्याप्त ही है, वैसे ही यह सम्पूर्ण विश्व मुझसे बना है और मुझसे ही व्याप्त है॥ ६॥
४७८ * गीता-संग्रह *
आत्मज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्न भासते।
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद्भासते न हि॥७॥
अपने-आपको न जाननेसे ही जगत्की सत्यताकी प्रतीति होती है। अपने-आपको जान लेनेपर नहीं होती। रस्सीको न जाननेसे साँपकी प्रतीति होती है, जाननेपर नहीं॥७॥
प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः।
यदा प्रकाशते विश्वं तदाहंभास एव हि॥८॥
प्रकाश मेरा निज स्वरूप है। मैं उससे पृथक् नहीं हूँ। जब-जब यह विश्व प्रकाशित होता है, तब-तब ऐसा मेरे प्रकाशसे ही होता है॥८॥
अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते।
रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा॥९॥
आश्चर्य है कि जैसे सीपमें चाँदी, रस्सीमें साँप एवं सूर्यकी किरणोंमें जलकी प्रतीति होती है, वैसे ही यह अज्ञानसे कल्पित विश्व मुझमें भास रहा है॥९॥
मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति।
मृदि कुम्भो जले वीचिः कनके कटकं यथा॥१०॥
जैसे मिट्टीमें घड़ा, जलमें तरंग और स्वर्णमें कंकण समा जाता है, वैसे ही मुझसे प्रकाशित यह विश्व मुझमें ही समा जायगा॥१०॥
अहो अहं नमो मह्यं विनाशो यस्य नास्ति मे।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगन्नाशेऽपि तिष्ठतः॥११॥
मैं आश्चर्यस्वरूप हूँ, मुझे नमस्कार है; क्योंकि मेरा कभी विनाश नहीं है। ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक सम्पूर्ण विश्वका नाश होनेपर भी मैं स्थित रहता हूँ॥११॥
- अष्टावक्रगीता * ४७९
अहो अहं नमो मह्यमेकोऽहं देहवानपि।
क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः ॥ १२ ॥
मैं आश्चर्यस्वरूप हूँ, मुझे नमस्कार है; क्योंकि मैं देहधारी होनेपर भी अद्वितीय हूँ। मैं न कहीं जाता हूँ, न आता हूँ। मैं तो सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त होकर स्थित हूँ॥ १२॥
अहो अहं नमो मह्यं दक्षो नास्तीह मत्समः।
असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम् ॥ १३ ॥
मैं आश्चर्यस्वरूप हूँ, मुझे नमस्कार है। मेरे समान चतुर और कोई नहीं है; क्योंकि मैं तो शरीरका स्पर्श भी नहीं करता फिर भी चिरकालसे विश्वको धारण किये हुए हूँ॥ १३॥
अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किञ्चन।
अथवा यस्य मे सर्वं यद्वाङ्मनसगोचरम् ॥ १४ ॥
मैं आश्चर्यस्वरूप हूँ, मुझे नमस्कार है; क्योंकि मेरा कुछ नहीं है अथवा जो कुछ वाणी और मनका विषय है, वह सब मेरा ही है॥ १४॥
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम्।
अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरञ्जनः ॥ १५ ॥
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता वास्तवमें तीनों नहीं हैं। जिस अधिष्ठानमें अज्ञानसे ये तीनों प्रतीत होते हैं, वह मायामलसे रहित शुद्ध ब्रह्म मैं हूँ॥ १५॥
द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्यास्ति भेषजम्।
दृश्यमेतन्मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोऽमलः ॥ १६ ॥
आश्चर्य है कि समस्त दुःखका कारण एकमात्र द्वैत ही है। उसकी कोई दूसरी दवा नहीं है। बस, ऐसा ज्ञान ही उसकी दवा है कि यह सम्पूर्ण दृश्य मिथ्या है और मैं अद्वितीय, शुद्ध एवं चिदान्दस्वरूप हूँ॥ १६॥
४८० * गीता-संग्रह *
बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया।
एवं विमृश्यतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम ॥ १७॥
मैं वस्तुतः बोधस्वरूप हूँ। अपने स्वरूपके अज्ञानसे मैंने उपाधिकी कल्पना कर ली है, नित्य ऐसा विचार करते रहनेपर यह सिद्ध हो जाता है कि मेरी स्थिति निर्विकल्पमें ही है॥ १७॥
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्।
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्ता निराश्रया ॥ १८॥
कितने आश्चर्य की बात है कि मुझमें सम्पूर्ण विश्वकी प्रतीति होते रहनेपर भी वह वस्तुतः मुझमें नहीं है। न तो कभी मुझे बन्धन हुआ और न तो मोक्ष। आश्रयहीन होनेके कारण भ्रान्ति स्वयं शान्त हो गयी॥ १८॥
सशरीरमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चितम्।
शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन्कल्पनाधुना ॥ १९॥
यह निश्चय है कि इस शरीरके साथ यह सम्पूर्ण विश्व कुछ भी नहीं है और आत्मा शुद्ध चिन्मात्र है। फिर अब यह कल्पना किसमें सम्भव है ? अर्थात् किसीमें नहीं ॥ १९॥
शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा।
कल्पनामात्रमेवैतत्किं मे कार्यं चिदात्मनः ॥ २०॥
यह शरीर, स्वर्ग-नरक, बन्ध-मोक्ष और भय—यह सब केवल कल्पनामात्र है। फिर मुझ चिदात्माके लिये क्या कुछ कर्तव्य शेष है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ॥ २०॥
अहो जनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम।
अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम् ॥ २१॥
आश्चर्य तो यह है कि भीड़-भाड़में भी मुझे द्वैत नहीं दीखता,
* अष्टावक्रगीता * ४८१
सब सूने जंगलके समान हो गया। अब मैं प्रीति किससे करूँ? ॥ २१ ॥
नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित्।
अयमेव हि मे बन्ध आसीद्या जीविते स्पृहा॥ २२॥
न मैं देह हूँ और न तो यह देह मेरा है। मैं जीव भी नहीं हूँ। मैं तो शुद्ध चेतन हूँ। मेरा बन्ध तो केवल इतना ही था कि मैं जीवित रहना चाहता था॥ २२॥
अहो भुवनकल्लोलैर्विचित्रैर्द्वाक् समुत्थितम्।
मय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते समुद्यते॥ २३॥
आश्चर्य है, मुझ अनन्त महासमुद्रमें जब चित्तरूपी वायु चलने लगती है तब झटपट बहुत-से दृश्य पदार्थोंकी तरंगें उठने लगती हैं॥ २३॥
मय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते प्रशाम्यति।
अभाग्याज्जीववणिजो जगतपोतो विनश्वरः॥ २४॥
मुझ अनन्त महासमुद्रमें जब चित्तरूपी वायु शान्त हो जाती है तब जीवरूपी व्यापारीके दुर्भाग्यसे यह संसाररूपी जहाज ठहरकर नष्ट हो जाता है॥ २४॥
मय्यनन्तमहाम्भोधावाश्चर्यं जीववीचयः।
उद्यन्ति घ्नन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावतः॥ २५॥
बड़े आश्चर्य कि बात है कि मुझ अनन्त महासमुद्रमें बहुत-सी जीवरूपी तरंगें स्वभावसे ही उठती हैं। वे आपसमें टकराती हैं, लहराती हैं और विलीन हो जाती हैं॥ २५॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शिष्येणोक्तमात्मानुभवोल्लास-
पञ्चविंशतिकं नाम द्वितीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥ २ ॥
४८२ * गीता-संग्रह *
तीसरा प्रकरण
मनुष्यकी अज्ञानता
अविनाशिनमात्मानमेकं विज्ञाय तत्त्वतः।
तवात्मज्ञस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः ॥ १ ॥
तुमने अद्वितीय अविनाशी आत्माको तत्त्वतः (अभेद रूपसे) जान लिया है; तुम आत्मज्ञ हो, धीर हो; फिर धन कमानेमें तुम्हारी प्रीति क्यों है?॥ १ ॥
आत्माज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभ्रमगोचरे।
शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे ॥ २ ॥
जैसे सीपको न जाननेसे उसे चाँदी समझकर चाँदीका लोभ होता है, वैसे ही अपने स्वरूपको न जाननेसे ही विषयोंमें उन्हें सच समझनेके कारण प्रीति होती है॥ २ ॥
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे।
सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि ॥ ३ ॥
जिस अधिष्ठान चैतन्यमें यह सम्पूर्ण विश्व सागरमें तरंगोंके समान स्फुरित हो रहा है, वह मैं ही हूँ—ऐसा जानकर भी तुम दीन-हीनके समान क्यों दौड़-धूप कर रहे हो?॥ ३ ॥
श्रुत्वापि शुद्धचैतन्यमात्मानमतिसुन्दरम्।
उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति ॥ ४ ॥
मैं अत्यन्त सुन्दर शुद्ध चैतन्य हूँ—ऐसा गुरु एवं शास्त्रसे श्रवण करके भी जो काम-भोगमें अत्यन्त आसक्त है, उसे मलिनताकी प्राप्ति होती है॥ ४ ॥
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते ॥ ५ ॥
यह बड़े आश्चर्य बात है कि सम्पूर्ण दृश्य-पदार्थोंमें अपनेको
- अष्टावक्रगीता * ४८३
और अपनेमें समस्त दृश्य-पदार्थोंको जाननेवाले विवेकशील पुरुषके चित्तमें भी ममता बनी रह जाती है॥५॥
आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः।
आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया॥६॥
परम अद्वैत-वस्तुमें निष्ठा होनेपर एवं आत्माका दृढ़ निश्चय हो जानेपर भी बड़े आश्चर्यकी बात है कि पूर्वाभ्यासके कारण तुम कामके अधीन होकर विकल हो जाते हो॥६॥
उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः।
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत्कालमन्तमनुश्रितः॥७॥
बड़े आश्चर्यकी बात है कि ज्ञानके शत्रु—कामसे ग्रस्त होकर तुम कमजोर हो जाते हो और समय पाकर नष्ट हो जानेवाले भोगकी आकांक्षा करते हो॥७॥
इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः।
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षादेव विभीषिका॥८॥
नित्यानित्य-वस्तु-विवेकी, लौकिक-पारलौकिक भोगोंसे विरक्त एवं मुमुक्षु पुरुष भी मोक्षसे (संसारके छूट जानेसे) डरता है, यह बड़े आश्चर्यकी बात है॥८॥
धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा।
आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति॥९॥
धीर पुरुष भोग अथवा पीड़ा पाकर भी सर्वदा केवल आत्म-दृष्टि रखता है। वह न तुष्ट होता है, न रुष्ट होता है॥९॥
चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत्।
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येन्महाशयः॥१०॥
महापुरुष तो कर्ममें लगे हुए अपने शरीरको दूसरेके शरीरके समान
४८४ * गीता-संग्रह *
समझता है। स्तुति या निन्दासे उसे क्षोभ क्यों होगा ? ॥ १० ॥
मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः ।
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः ॥ ११ ॥
स्थितप्रज्ञ एवं आश्चर्यरहित पुरुष इस विश्वको जादूका खेल समझता है। मौतको सामने देखकर भी भला वह क्यों डरेगा ? ॥ ११ ॥
निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः ।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ १२ ॥
जिस महात्मा पुरुषका चित्त मोक्षपदके लिये भी विचलित नहीं होता; उस आत्मज्ञान-तृप्तकी समता भला किसके साथ की जा सकती है ? ॥ १२ ॥
स्वभावादेव जानानो दृश्यमेतन्न किञ्चन ।
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः ॥ १३ ॥
जो सहज ही यह जानता है कि यह सम्पूर्ण दृश्य वस्तुतः कुछ नहीं है, वह स्थितप्रज्ञ भला यह क्यों देखने लगा कि यह ग्राह्य है और यह त्याज्य है ? ॥ १३ ॥
अन्तस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ।
यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये ॥ १४ ॥
जिसने अपने अन्तःकरणसे वासनाओंका रंग धो दिया है, सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंको भगा दिया है और आशा-तृष्णाको नष्ट कर दिया है, उसके सामने प्रारब्धवश जो भोग आते हैं, उससे उसे न सुख होता है, न दुःख ॥ १४ ॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामाक्षेपद्वारोपदेशकं नाम तृतीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ३ ॥
- अष्टावक्रगीता * ४८५
चौथा प्रकरण
आत्मज्ञानीकी स्थिति
हन्तात्मज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।
न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता॥ १॥
यह सम्भव है कि स्थितप्रज्ञ आत्मज्ञानी पुरुष भी लीलापूर्वक भोगके खेल खेले, परंतु संसारका भार ढोनेवाले मूढ़ोंके साथ उसकी कोई तुलना नहीं है॥ १॥
यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥ २॥
इन्द्रादि सारे देवता जिस पदकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त दीन रहते हैं, बड़े आश्चर्यकी बात है कि उसी पदपर स्थित होकर भी तत्त्वज्ञानी योगीको हर्षरूप विकार नहीं प्राप्त होता॥ २॥
तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।
न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः॥ ३॥
यद्यपि धुएँसे आकाश धूमिल-सा मालूम पड़ता है; परंतु वास्तवमें धुआँ उसे स्पर्श नहीं करता, ऐसे ही तत्त्वज्ञ पुरुषका पुण्य-पापसे (बाहरी सम्बन्ध दीखनेपर भी) भीतर किसी प्रकारका संस्पर्श नहीं होता॥ ३॥
आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।
यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः॥ ४॥
जिस महापुरुषने इस तत्त्वका साक्षात्कार कर लिया है कि यह सम्पूर्ण जगत् आत्मस्वरूप ही है, फिर यदि वह (प्रारब्धसे) स्वेच्छानुसार बर्ताव करे तो उसे भला कौन रोक सकता है?॥ ४॥
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।
विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने॥ ५॥
ब्रह्मासे तिनकेतक चार प्रकारके प्राणियोंमें एकमात्र तत्त्वज्ञ पुरुषकी