गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in contextअष्टावक्रगीता
[ महर्षि अष्टावक्रद्वारा प्रणीत यह गीता अत्यन्त प्राचीनकालसे वेदान्त-मार्गी मुमुक्षु-साधकोंके लिये चिन्तामणिके सदृश प्रकाशमान है। महाभारतके वनपर्वमें प्राप्त अष्टावक्रगीतासे यह सर्वथा भिन्न एक स्वतन्त्र स्तरीय ग्रन्थ है। राजर्षि जनक और अष्टावक्रजीके संवादरूपमें निबद्ध प्रस्तुत गीता अत्यन्त उत्कृष्ट मनोभूमिमें प्रकट हुई है। इसके एक-एक श्लोकमें चिन्तनकी गहराईकी मनोहारी छाप दृष्टिगोचर होती है। अद्वैतज्ञानका निरूपण, उसकी प्राप्तिके चरणबद्ध उपाय तथा ब्रह्मज्ञानीके लक्षण इसमें स्पष्ट रूपसे वर्णित हैं। आत्मकल्याणके इच्छुक साधकोंके लिये परमोपयोगी तथा इक्कीस प्रकरणोंमें विभक्त यह गीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत है— ]
पहला प्रकरण
महर्षि अष्टावक्रका राजा जनकको 'तुम देह नहीं, आत्मा हो'—यह उपदेश देना
जनक उवाच
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् ब्रूहि मम प्रभो॥ १॥
**जनकजी बोले—**हे प्रभो! ज्ञानप्राप्तिका क्या उपाय है? मेरी मुक्ति किस प्रकार होगी? वैराग्य कैसे प्राप्त होता है? आप (कृपा करके) मुझे बतलाइये॥ १॥
अष्टावक्र उवाच
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज।
क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद्भज॥ २॥
**अष्टावक्रजीने कहा—**हे तात! यदि तुम मुक्ति चाहते हो तो विषयोंको विषके समान छोड़ दो और क्षमा, सरलता, दया, सन्तोष एवं सत्यका अमृतके समान सेवन करो॥ २॥