गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- अष्टावक्रगीता * ४७९
अहो अहं नमो मह्यमेकोऽहं देहवानपि।
क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः ॥ १२ ॥
मैं आश्चर्यस्वरूप हूँ, मुझे नमस्कार है; क्योंकि मैं देहधारी होनेपर भी अद्वितीय हूँ। मैं न कहीं जाता हूँ, न आता हूँ। मैं तो सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त होकर स्थित हूँ॥ १२॥
अहो अहं नमो मह्यं दक्षो नास्तीह मत्समः।
असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम् ॥ १३ ॥
मैं आश्चर्यस्वरूप हूँ, मुझे नमस्कार है। मेरे समान चतुर और कोई नहीं है; क्योंकि मैं तो शरीरका स्पर्श भी नहीं करता फिर भी चिरकालसे विश्वको धारण किये हुए हूँ॥ १३॥
अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किञ्चन।
अथवा यस्य मे सर्वं यद्वाङ्मनसगोचरम् ॥ १४ ॥
मैं आश्चर्यस्वरूप हूँ, मुझे नमस्कार है; क्योंकि मेरा कुछ नहीं है अथवा जो कुछ वाणी और मनका विषय है, वह सब मेरा ही है॥ १४॥
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम्।
अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरञ्जनः ॥ १५ ॥
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता वास्तवमें तीनों नहीं हैं। जिस अधिष्ठानमें अज्ञानसे ये तीनों प्रतीत होते हैं, वह मायामलसे रहित शुद्ध ब्रह्म मैं हूँ॥ १५॥
द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्यास्ति भेषजम्।
दृश्यमेतन्मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोऽमलः ॥ १६ ॥
आश्चर्य है कि समस्त दुःखका कारण एकमात्र द्वैत ही है। उसकी कोई दूसरी दवा नहीं है। बस, ऐसा ज्ञान ही उसकी दवा है कि यह सम्पूर्ण दृश्य मिथ्या है और मैं अद्वितीय, शुद्ध एवं चिदान्दस्वरूप हूँ॥ १६॥