Skip to content
SarvaKosh
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

Page 478 of 675

Read in context
Page 478

* अष्टावक्रगीता *
४७७

यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत्।
अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किञ्चन॥ २॥
जैसे मैं अकेला ही इस शरीरको प्रकाशित करता हूँ, वैसे ही सम्पूर्ण जगत्‌को भी प्रकाशित करता हूँ। एकमात्र मैं प्रकाशक हूँ, इसलिये सम्पूर्ण जगत् मेरा है अथवा कुछ भी मेरा नहीं है॥ २॥

सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाधुना।
कुतश्चित्कौशलादेव परमात्मा विलोक्यते॥ ३॥
बड़े आश्चर्यकी बात है कि मैं शरीर और सम्पूर्ण दृश्यजगत्का परित्याग करके किसी अनिर्वचनीय कौशलसे वर्तमान क्षणमें ही परमात्माका दर्शन कर रहा हूँ॥ ३॥

यथा न तोयतो भिन्नास्तरङ्गा फेनबुद्बुदाः।
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम्॥ ४॥
जैसे तरंग, फेन और बुद्बुदे जलसे भिन्न नहीं हैं, वैसे ही यह दृश्यमान प्रपंच भी आत्मसत्तासे पृथक् नहीं है; क्योंकि यह अपना ही बनाया हुआ है॥ ४॥

तन्तुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारतः।
आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम्॥ ५॥
जैसे विचार करनेपर वस्त्र तन्तुमात्र ही है, वैसे ही विचार करनेपर यह सम्पूर्ण विश्व आत्म-सत्तामात्र ही है॥ ५॥

यथैवेक्षुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा।
तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम्॥ ६॥
जैसे शर्करा गन्नेके रससे बनी है और उससे व्याप्त ही है, वैसे ही यह सम्पूर्ण विश्व मुझसे बना है और मुझसे ही व्याप्त है॥ ६॥