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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 479

४७८ * गीता-संग्रह *


आत्मज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्न भासते।
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद्भासते न हि॥७॥
अपने-आपको न जाननेसे ही जगत्‌की सत्यताकी प्रतीति होती है। अपने-आपको जान लेनेपर नहीं होती। रस्सीको न जाननेसे साँपकी प्रतीति होती है, जाननेपर नहीं॥७॥

प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः।
यदा प्रकाशते विश्वं तदाहंभास एव हि॥८॥
प्रकाश मेरा निज स्वरूप है। मैं उससे पृथक् नहीं हूँ। जब-जब यह विश्व प्रकाशित होता है, तब-तब ऐसा मेरे प्रकाशसे ही होता है॥८॥

अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते।
रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा॥९॥
आश्चर्य है कि जैसे सीपमें चाँदी, रस्सीमें साँप एवं सूर्यकी किरणोंमें जलकी प्रतीति होती है, वैसे ही यह अज्ञानसे कल्पित विश्व मुझमें भास रहा है॥९॥

मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति।
मृदि कुम्भो जले वीचिः कनके कटकं यथा॥१०॥
जैसे मिट्टीमें घड़ा, जलमें तरंग और स्वर्णमें कंकण समा जाता है, वैसे ही मुझसे प्रकाशित यह विश्व मुझमें ही समा जायगा॥१०॥

अहो अहं नमो मह्यं विनाशो यस्य नास्ति मे।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगन्नाशेऽपि तिष्ठतः॥११॥
मैं आश्चर्यस्वरूप हूँ, मुझे नमस्कार है; क्योंकि मेरा कभी विनाश नहीं है। ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक सम्पूर्ण विश्वका नाश होनेपर भी मैं स्थित रहता हूँ॥११॥