गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
About this granth
Beyond the Bhagavad Gita, the epics and Puranas contain many other dialogues called 'Gitas'. Gita Sangraha (गीता-संग्रह, Gita Press book no. 1958) gathers twenty-five of them, each with its original text and a Hindi translation.
The contents show the range: the Ganesha Gita from the Ganesha Purana; the Bhikshu, Paramahamsa, Hamsa and Avadhuta Gitas from the Bhagavata; from the Mahabharata the Shadja, Pingala, Shampaka, Manki, Ajagara, Harita, Vritra, Putra, Kama and Narada Gitas, a second Hamsa Gita and the Uttara Gita; two Yama Gitas from the Vishnu and Agni Puranas; two Rama Gitas from the Adhyatma and Adbhuta Ramayanas; the Bhagavati (Parvati) Gita from the Devi Purana; and the Ashtavakra Gita and Dattatreya's Avadhuta Gita.
Many of these are short teachings on detachment, contentment, self-knowledge and devotion, such as the courtesan Pingala's awakening or the sage who lives like a python. The copy here is the sixth reprint, of Samvat 2074, and its 675 pages bring these scattered texts together in one volume.
३९० * गीता-संग्रह *
यस्मात्प्रसुप्तौ तदभावतः परः
सुखस्वरूपेण विभाव्यते हि नः ॥ ३७ ॥
सबके साक्षी आत्मामें इच्छा, अनिच्छा, राग-द्वेष और सुख-दुःखादिरूप बुद्धिकी वृत्तियाँ ही जन्म-मरणरूप संसारकी कारण हैं; क्योंकि सुषुप्तिमें इनका अभाव हो जानेपर हमें आत्माका सुखरूपसे भान होता है ॥ ३७ ॥
अनाद्यविद्योद्भवबुद्धिबिम्बितो
जीवः प्रकाशोऽयमितीर्यते चितः।
आत्मा धियः साक्षितया पृथक् स्थितो
बुद्ध्यापरिच्छिन्नपरः स एव हि ॥ ३८ ॥
अनादि अविद्यासे उत्पन्न हुई बुद्धिमें प्रतिबिम्बित यह चेतनका प्रकाश ही 'जीव' कहलाता है। बुद्धिके साक्षीरूपसे आत्मा उससे पृथक् है, वह परात्मा तो बुद्धिसे अपरिच्छिन्न है ॥ ३८ ॥
चिद्बिम्बसाक्ष्यात्मधियां प्रसङ्गत-
स्त्वेकत्र वासादनलाक्तलोहवत्।
अन्योन्यमध्यासवशात्प्रतीयते
जडाजडत्वं च चिदात्मचेतसोः ॥ ३९ ॥
अग्निसे तपे हुए लोहेके समान चिदाभास, साक्षी आत्मा तथा बुद्धिके एकत्र रहनेसे परस्पर अन्योन्याध्यास होनेके कारण क्रमशः उनकी चेतनता और जडता प्रतीत होती है। (अर्थात् जिस प्रकार अग्निसे तपे हुए लोहपिण्डमें अग्नि और लोहेका तादात्म्य हो जानेसे लोहेका आकार अग्निमें और अग्निकी उष्णता लोहेमें दिखायी देने लगती है, उसी प्रकार बुद्धि और आत्माका तादात्म्य हो जानेसे आत्माकी चेतनता बुद्धि आदिमें और बुद्धि आदिकी जडता आत्मामें प्रतीत होने लगती है। इसलिये अध्यासवश बुद्धिसे लेकर शरीरपर्यन्त अनात्म-वस्तुओंको ही आत्मा मानने लगते हैं) ॥ ३९ ॥
* रामगीता ( १ ) * ३९१
गुरोः सकाशादपि वेदवाक्यतः
सञ्जातविद्यानुभवो निरीक्ष्य तम्।
स्वात्मानमात्मस्थमुपाधिवर्जितं
त्यजेदशेषं जडमात्मगोचरम्॥ ४०॥
गुरुके समीप रहनेसे और वेदवाक्योंसे आत्मज्ञानका अनुभव होनेपर अपने हृदयस्थ उपाधिरहित आत्माका साक्षात्कार करके आत्मारूपसे प्रतीत होनेवाले देहादि सम्पूर्ण जडपदार्थोंका त्याग कर देना चाहिये॥ ४०॥
प्रकाशरूपोऽहमजोऽहमद्वयोऽ-
सकृद्विभातोऽहमतीव निर्मलः।
विशुद्धविज्ञानघनो निरामयः
सम्पूर्ण आनन्दमयोऽहमक्रियः॥ ४१॥
मैं प्रकाशस्वरूप, अजन्मा, अद्वितीय, निरन्तर, भासमान, अत्यन्त निर्मल, विशुद्ध विज्ञानघन, निरामय, क्रियारहित और एकमात्र आनन्द-स्वरूप हूँ॥ ४१॥
सदैव मुक्तोऽहमचिन्त्यशक्तिमा-
नतीन्द्रियज्ञानमविक्रियात्मकः ।
अनन्तपारोऽहमहर्निशं बुधै-
र्विभावितोऽहं हृदि वेदवादिभिः॥ ४२॥
मैं सदा ही मुक्त, अचिन्त्यशक्ति, अतीन्द्रिय, ज्ञानस्वरूप, अविकृतरूप और अनन्त-पार हूँ। वेदवादी पण्डितजन अहर्निश मेरा हृदयमें चिन्तन करते हैं॥ ४२॥
एवं सदात्मानमखण्डितात्मना
विचारमाणस्य विशुद्धभावना।
हन्यादविद्यामचिरेण कारकै
रसायनं यद्वदुपासितं रुजः॥ ४३॥
इस प्रकार सदा आत्माका अखण्डवृत्तिसे चिन्तन करनेवाले पुरुषके
३९२ * गीता-संग्रह *
अन्तःकरणमें उत्पन्न हुई विशुद्ध भावना तुरन्त ही कारकादिके सहित अविद्याका नाश कर देती है, जिस प्रकार नियमानुसार सेवन की हुई ओषधि रोगको नष्ट कर डालती है॥ ४३ ॥
विविक्त आसीन उपारतेन्द्रियो
विनिर्जितात्मा विमलान्तराशयः।
विभावयेदेकमनन्यसाधनो
विज्ञानदृक्केवल आत्मसंस्थितः ॥ ४४ ॥
(आत्मचिन्तन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि) एकान्त देशमें इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे हटाकर और अन्तःकरणको अपने अधीन करके बैठे तथा आत्मामें स्थित होकर और किसी साधनका आश्रय न लेकर शुद्धचित्त हुआ केवल ज्ञानदृष्टिद्वारा एक आत्माकी ही भावना करे॥ ४४ ॥
विश्वं यदेतत्परमात्मदर्शनं
विलापयेदात्मनि सर्वकारणे।
पूर्णश्चिदानन्दमयोऽवतिष्ठते
न वेद बाह्यं न च किञ्चिदान्तरम् ॥ ४५ ॥
यह विश्व परमात्मस्वरूप है, ऐसा समझकर इसे सबके कारणरूप आत्मामें लीन करे; इस प्रकार जो पूर्ण चिदानन्दस्वरूपसे स्थित हो जाता है, उसे बाह्य अथवा आन्तरिक किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं रहता॥ ४५ ॥
पूर्वं समाधेरखिलं विचिन्तये-
दोङ्कारमात्रं सचराचरं जगत्।
तदेव वाच्यं प्रणवो हि वाचको
विभाव्यतेऽज्ञानवशान्न बोधतः ॥ ४६ ॥
समाधि प्राप्त होनेके पूर्व ऐसा चिन्तन करे कि सम्पूर्ण चराचर
* रामगीता ( १ ) * ३१३
जगत् केवल ओंकारमात्र है। यह संसार वाच्य है और ओंकार इसका वाचक है। अज्ञानके कारण ही इसकी प्रतीति होती है। ज्ञान होनेपर इसका कुछ भी नहीं रहता ॥ ४६ ॥
अकारसंज्ञः पुरुषो हि विश्वको
ह्युकारकस्तैजस ईर्यते क्रमात्।
प्राज्ञो मकारः परिपठ्यतेऽखिलैः
समाधिपूर्वं न तु तत्त्वतो भवेत्॥ ४७॥
(ओंकारमें अ, उ और म—ये तीन वर्ण हैं; इनमेंसे) अकार विश्व (जागृतिके अभिमानी)-का वाचक है, उकार तैजस (स्वप्नका अभिमानी) कहलाता है और मकार प्राज्ञ (सुषुप्तिके अभिमानी)-को कहते हैं; यह व्यवस्था समाधिलाभसे पहलेकी है, तत्त्वदृष्टिसे ऐसा कोई भेद नहीं है॥ ४७॥
विश्वं त्वकारं पुरुषं विलापये-
दुकारमध्ये बहुधा व्यवस्थितम्।
ततो मकारे प्रविलाप्य तैजसं
द्वितीयवर्णं प्रणवस्य चान्तिमे॥ ४८॥
नाना प्रकारसे स्थित अकाररूप विश्व-पुरुषको उकारमें लीन करे और ओंकारके द्वितीय वर्ण तैजसरूप उकारको उसके अन्तिम वर्ण मकारमें लीन करे॥ ४८॥
मकारमप्यात्मनि चिद्घने परे
विलापयेत्प्राज्ञमपीह कारणम्।
सोऽहं परं ब्रह्म सदा विमुक्तिमद्-
विज्ञानदृङ्मुक्त उपाधितोऽमलः॥ ४९॥
फिर कारणात्मा प्राज्ञरूप मकारको भी चिद्घनरूप परमात्मामें लीन करे; (और ऐसी भावना करे कि) वह नित्यमुक्त विज्ञानस्वरूप
३९४
- गीता-संग्रह *
उपाधिहीन निर्मल परब्रह्म मैं ही हूँ॥ ४९॥
एवं सदा जातपरात्मभावनः
स्वानन्दतुष्टः परिविस्मृताखिलः।
आस्ते स नित्यात्मसुखप्रकाशकः
साक्षाद्विमुक्तोऽचलवारिसिन्धुवत् ॥५०॥
इस प्रकार निरन्तर परमात्मभावना करते-करते जो आत्मानन्दमें मग्न हो गया है तथा जिसे सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच विस्मृत हो गया है, वह नित्य आत्मानन्दका अनुभव करनेवाला जीवन्मुक्त योगी निस्तरंग समुद्रके समान साक्षात् मुक्तस्वरूप हो जाता है॥५०॥
एवं सदाभ्यस्तसमाधियोगिनो
निवृत्तसर्वेन्द्रियगोचरस्य हि।
विनिर्जिताशेषरिपोरहं सदा
दृश्यो भवेयं जितषड्गुणात्मनः॥५१॥
इस प्रकार जो निरन्तर समाधियोगका अभ्यास करता है, जिसके सम्पूर्ण इन्द्रियगोचर विषय निवृत्त हो गये हैं तथा जिसने काम-क्रोधादि सम्पूर्ण शत्रुओंको परास्त कर दिया है, उस छहों इन्द्रियों (मन और पाँचों ज्ञानेन्द्रियों)-को जीतनेवाले महात्माको मेरा निरन्तर साक्षात्कार होता है॥५१॥
ध्यात्वैवमात्मानमहर्निशं मुनि-
स्तिष्ठेत्सदा मुक्तसमस्तबन्धनः।
प्रारब्धमश्नन्नभिमानवर्जितो
मय्येव साक्षात्प्रविलीयते ततः॥५२॥
इस प्रकार अहर्निश आत्माका ही चिन्तन करता हुआ मुनि सर्वदा समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर रहे तथा (कर्ता-भोक्तापनके) अभिमानको छोड़कर प्रारब्धफल भोगता रहे। इससे वह अन्तमें साक्षात् मुझहीमें
* रामगीता ( १ ) * ३९५
लीन हो जाता है॥ ५२॥
आदौ च मध्ये च तथैव चान्ततो
भवं विदित्वा भयशोककारणम्।
हित्वा समस्तं विधिवादचोदितं
भजेत्स्वमात्मानमथाखिलात्मनाम् ॥ ५३ ॥
संसारको आदि, अन्त और मध्यमें सब प्रकार भय और शोकका ही कारण जानकर समस्त वेदविहित कर्मोंको त्याग दे तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मारूप अपने आत्माका भजन करे॥ ५३॥
आत्मन्यभेदेन विभावयन्निदं
भवत्यभेदेन मयात्मना तदा।
यथा जलं वारिनिधौ यथा पयः
क्षीरे वियद्व्योमन्यनिले यथानिलः॥ ५४॥
जिस प्रकार समुद्रमें जल, दूधमें दूध, महाकाशमें घटाकाशादि और वायुमें वायु मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार इस सम्पूर्ण प्रपंचको अपने आत्माके साथ अभिन्नरूपसे चिन्तन करनेसे जीव मुझ परमात्माके साथ अभिन्न भावसे स्थित हो जाता है॥ ५४॥
इत्थं यदीक्षेत हि लोकसंस्थितो
जगन्मृषैवेति विभावयन्मुनिः।
निराकृतत्वाच्छ्रुतियुक्तिमानतो
यथेन्दुभेदो दिशि दिग्भ्रमादयः॥ ५५॥
यह जो जगत् है वह श्रुति, युक्ति और प्रमाणसे बाधित होनेके कारण चन्द्रभेद और दिशाओंमें होनेवाले दिग्भ्रमके समान मिथ्या ही है—ऐसी भावना करता हुआ लोक (व्यवहार)-में स्थित मुनि इसे देखे॥ ५५॥
३९६ * गीता-संग्रह *
यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं
तावन्मदाराधनतत्परो भवेत्।
श्रद्धालुरत्यूर्जितभक्तिलक्षणो
यस्तस्य दृश्योऽहमहर्निशं हृदि॥ ५६ ॥
जबतक सारा संसार मेरा ही रूप दिखलायी न दे, तबतक निरन्तर मेरी आराधना करता रहे। जो श्रद्धालु और उत्कट भक्त होता है, उसे अपने हृदयमें सर्वदा मेरा ही साक्षात्कार होता है॥ ५६॥
रहस्यमेतच्छ्रुतिसारसङ्ग्रहं
मया विनिश्चित्य तवोदितं प्रिय।
यस्त्वेतदालोचयतीह बुद्धिमान्
स मुच्यते पातकराशिभिः क्षणात्॥ ५७॥
हे प्रिय! सम्पूर्ण श्रुतियोंके साररूप इस गुप्त रहस्यको मैंने निश्चय करके तुमसे कहा है। जो बुद्धिमान् इसका मनन करेगा, वह तत्काल समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ ५७॥
भ्रातर्यदीदं परिदृश्यते जग-
न्मायैव सर्वं परिहृत्य चेतसा।
मद्भावनाभावितशुद्धमानसः
सुखी भवानन्दमयो निरामयः॥ ५८ ॥
भाई! यह जो कुछ जगत् दिखायी देता है, वह सब माया है। इसे अपने चित्तसे निकालकर मेरी भावनासे शुद्धचित्त और सुखी होकर आनन्दपूर्ण और क्लेशशून्य हो जाओ॥ ५८॥
यः सेवते मामगुणं गुणात्परं
हृदा कदा वा यदि वा गुणात्मकम्।
सोऽहं स्वपादाञ्चितरेणुभिः स्पृशन्
पुनाति लोकत्रितयं यथा रविः॥ ५९ ॥
जो पुरुष अपने चित्तसे मुझ गुणातीत निर्गुणका अथवा कभी-
२०- रामगीता (२) (अद्भुत रामायण)
- रामगीता ( १ ) * ३९७
कभी मेरे सगुण स्वरूपका भी सेवन करता है, वह मेरा ही रूप है। वह अपनी चरण-रजके स्पर्शसे सूर्यके समान सम्पूर्ण त्रिलोकीको पवित्र कर देता है॥ ५९॥
विज्ञानमेतदखिलं श्रुतिसारमेकं
वेदान्तवेद्यचरणेन मयैव गीतम्।
यः श्रद्धया परिपठेद् गुरुभक्तियुक्तो
मद्रूपमेति यदि मद्वचनेषु भक्तिः॥६०॥
यह अद्वितीय ज्ञान समस्त श्रुतियोंका एकमात्र सार है। इसे वेदान्तवेद्य भगवत्पाद मैंने ही कहा है। जो गुरुभक्तिसम्पन्न पुरुष इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा, उसकी यदि मेरे वचनोंमें प्रीति होगी तो वह मेरा ही रूप हो जायगा॥ ६०॥
।। इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे श्रीरामगीता सम्पूर्णा।।
रामगीता ( २ )
भगवान् श्रीरामद्वारा हनुमान्जीको उपदेश
रामगीता-( २ )
[एक रामगीता अद्भुतरामायणके अन्तर्गत भी प्राप्त होती है, वहाँ इसका विस्तार अध्याय ११ से अध्याय १४ तक है। सीताहरणके पश्चात् ऋष्यमूकपर्वतपर विराजमान भगवान् श्रीराम हनुमान्जीके द्वारा जिज्ञासा करनेपर अपने तात्त्विक स्वरूपका जो उन्हें उपदेश देते हैं, वही रामगीताके नामसे विख्यात है, इसीके साथ ही इसमें सांख्य, योग एवं वेदान्ततत्त्वका प्रतिपादन करनेके बाद भक्तियोगका विवेचन किया गया है। अन्तिम अध्यायमें भगवान्ने अपनी विभूतियोंका प्रभावी वर्णन किया है। इस रामगीताको भी यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है—]
पहला अध्याय
भगवान् श्रीरामद्वारा हनुमान्जीको सांख्ययोगका उपदेश
रामः प्राह हनूमन्तमात्मानं पुरुषोत्तमः ।
वत्स वत्स हनूमंस्त्वं भक्तो यत्पृष्टवानसि ॥ १ ॥
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहितो मम ।
अवाच्यमेतद्विज्ञानमात्मगुह्यं सनातनम् ॥ २ ॥
पुरुषोत्तम श्रीरामने अपने भक्त हनुमान्से कहा—हे वत्स हनुमान्! तुम मेरे भक्त हो, अतः जो तुमने पूछा है, उसे मैं बता रहा हूँ। मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो। यह सनातन विज्ञान अपनेमें गोपनीय और यत्र-तत्र कहनेयोग्य नहीं है ॥ १-२ ॥
यन्न देवा विजानन्ति यतन्तोऽपि द्विजातयः ।
इदं ज्ञानं समाश्रित्य ब्रह्मभूता द्विजोत्तमाः ॥ ३ ॥
इस विज्ञानको देवता और प्रयत्नशील द्विज साधक भी नहीं जानते। इसी ज्ञानका आश्रय लेकर श्रेष्ठ ब्राह्मण ब्रह्मस्वरूप हो गये ॥ ३ ॥
४०० * गीता-संग्रह *
न संसारं प्रपश्यन्ति पूर्वेऽपि ब्रह्मवादिनः ।
गुह्याद् गुह्यतमं साक्षाद् गोपनीयं प्रयत्नतः ।
वंशे भक्तिमतो ह्यस्य भवन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ ४ ॥
वे पुरातन ब्रह्मज्ञानी संसारको (सत्य) नहीं देखते। यह ज्ञान गुह्यसे भी परम गुह्य है और प्रयत्नपूर्वक गोपनीय है। इस (विज्ञानवेत्ता)-के वंशमें जन्म लेनेवाले भी भक्तिमान् ब्रह्मवादी होते हैं॥ ४ ॥
आत्मा यः केवलः स्वच्छः शान्तः सूक्ष्मः सनातनः ॥ ५ ॥
अस्ति सर्वान्तरः साक्षाच्चिन्मात्रस्तमसः परः ।
सोऽन्तर्यामी स पुरुषः स प्राणः स महेश्वरः ॥ ६ ॥
आत्मा केवल, स्वच्छ, शान्त, सूक्ष्म और सनातन है। वह (आत्मा) सबके अन्दर स्पष्ट, प्रकाशमान और चिन्मय रूपसे स्थित है। वही अन्तर्यामी पुरुष है, वही प्राण है और वही परमेश्वर है॥ ५-६ ॥
स कालाग्निस्तद्व्यक्तं सद्यो वेदयति श्रुतिः ।
अस्माद्विजायते विश्वमत्रैव प्रविलीयते ॥ ७ ॥
वह कालाग्नि है, वही अव्यक्त है और श्रुति (शब्दप्रमाणसे) उसका ज्ञान कराती है। संसारकी उत्पत्ति और लय उसीमें होता है ॥ ७ ॥
मायावी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः ।
न चाप्ययं संसरति न च संसारयेत्प्रभुः ॥ ८ ॥
वह सर्वसमर्थ मायावी अपनी मायासे अनेक रूप (शरीर) धारण करता है। यह कहीं आता-जाता नहीं और न किसीको संचालित करता है ॥ ८ ॥
नायं पृथ्वी न सलिलं न तेजः पवनो नभः ।
न प्राणो न मनो व्यक्तं न शब्दः स्पर्श एव च ॥ ९ ॥
* रामगीता (२) * ४०१
न रूपरसगन्धाश्च नाहङ्कर्ता न वागपि।
न पाणिपादौ नो पायुर्न चोपस्थं प्लवङ्गम॥ १०॥
हे वानरश्रेष्ठ! न तो यह पृथ्वी है, न जल, न तेज, न वायु अथवा आकाश है। निश्चय ही न यह प्राण है, न मन और न शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध है। यह न अहंकार है, न वाणी-हाथ-पैर-पायु-उपस्थ आदि (कर्मेन्द्रियरूप) है॥ ९-१०॥
न कर्ता न च भोक्ता च न प्रकृतिपूरुषौ।
न माया नैव च प्राणश्चैतन्यं परमार्थतः॥ ११॥
यह न कर्ता है न भोक्ता है, न यह प्रकृति-पुरुष ही है। यह न माया है, न प्राण है। यह यथार्थमें (शुद्ध) चैतन्यमात्र है॥ ११॥
तथा प्रकाशतमसो सम्बन्धो नोपपद्यते।
तद्वदेव न सम्बन्धः प्रपञ्चपरमात्मनोः॥ १२॥
जैसे प्रकाश और अन्धकारका परस्पर सम्बन्ध सम्भव नहीं होता, उसी प्रकार परमात्मा और (सांसारिक) प्रपंचका भी परस्पर सम्बन्ध सम्भव नहीं है॥ १२॥
छायातरू यथा लोके परस्परविलक्षणौ।
तद्वत्प्रपञ्चपुरुषौ विभिन्नौ परमार्थतः॥ १३॥
जैसे संसारमें वृक्ष और उसकी छाया—ये दो भिन्न पदार्थ हैं, उसी प्रकार परमात्मा और प्रपंच परस्पर सर्वथा भिन्न हैं॥ १३॥
यद्यात्मा मलिनोऽस्वस्थो विकारी स्यात्स्वभावतः।
नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मान्तरशतैरपि॥ १४॥
यदि आत्मा स्वभावतः मलिन, अस्वस्थ और विकारवान् हो तो उसकी मुक्ति सैकड़ों जन्मोंमें भी सम्भव नहीं होगी॥ १४॥
पश्यन्ति मुनयो मुक्ताः स्वात्मानं परमार्थतः।
विकारहीनं निर्दुःखमानन्दात्मानमव्ययम्॥ १५॥
किंतु जीवन्मुक्त मुनिजन तो अपनी आत्माको यथार्थतः विकारहीन,
४०२ * गीता-संग्रह *
दुःखरहित, अव्यय और आनन्दस्वरूप देखते हैं॥ १५॥
अहं कर्ता सुखी दुःखी कृशः स्थूलेति या मतिः।
साप्यहङ्कृतिसम्बन्धादात्मन्यारोप्यते जनैः॥ १६॥
मैं कर्ता हूँ, सुखी-दुःखी हूँ, दुबला-मोटा हूँ—इस प्रकारका जो भाव बनता है, उसे अहंकारके सम्बन्धसे लोग आत्मापर आरोपित कर लेते हैं॥ १६॥
वदन्ति वेदविद्वांसः साक्षिणं प्रकृतेः परम्।
भोक्तारमक्षयं बुद्ध्वा सर्वत्र समवस्थितम्॥ १७॥
वेदके तत्त्वज्ञ उस अनश्वर भोक्ताको सर्वत्र व्याप्त जानकर उस साक्षी (आत्मा)-को प्रकृतिसे परे कहते हैं॥ १७॥
तस्मादज्ञानमूलोऽयं संसारः सर्वदेहिनाम्।
अज्ञानादन्यथा ज्ञातं तच्च प्रकृतिसङ्गतम्॥ १८॥
इसलिये सभी देहधारियोंके लिये यह संसार अज्ञानमूलक ही है। प्रकृतिके संसर्गसे अज्ञानके कारण यह (संसार) अन्यथा प्रतीत होता है॥ १८॥
नित्योदितः स्वयंज्योतिः सर्वगः पुरुषः परः।
अहङ्काराविवेकेन कर्ताहमिति मन्यते॥ १९॥
आत्मा तो नित्य जाग्रत्, स्वयंप्रकाश, सर्वत्र व्याप्त, परम पुरुष है। अहंकारके अज्ञानके कारण यह (जीव) अपनेको कर्ता मान बैठता है॥ १९॥
पश्यन्ति ऋषयो व्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिं बुद्ध्वा कारणं ब्रह्मवादिनः॥ २०॥
तेनात्र सङ्गतो ह्यात्मा कूटस्थोऽपि निरञ्जनः।
आत्मानमक्षरं ब्रह्म नावबुद्ध्यन्ति तत्त्वतः॥ २१॥
ऋषिगण सत् और असत् रूप नित्य आत्मतत्त्वका निश्चय ही अनुभव करते हैं। वे ब्रह्मवादी प्रधान प्रकृतिको कारणरूप जानकर
* रामगीता (२) * ४०३
उससे सम्बद्ध होनेके कारण कूटस्थ, निरंजन, अक्षरब्रह्मको तत्त्वतः नहीं जान पाते॥ २०-२१ ॥
अनात्मन्यात्मविज्ञानं तस्माद्दुःखं तथेतरत्।
रागद्वेषादयो दोषाः सर्वभ्रान्तिनिबन्धनाः॥ २२॥
अनात्मतत्त्वमें आत्माकी (भ्रान्ति) बुद्धि होनेसे ही दुःख और सुख होते हैं। राग-द्वेष आदि दोष भी उसी भ्रान्तिसे जुड़े रहते हैं॥ २२॥
कार्ये ह्यस्य भवेदेषा पुण्यापुण्यमिति श्रुतिः।
तद्वशादेव सर्वेषां सर्वदेहसमुद्भवः॥ २३॥
इसी कारण कर्ममें पाप-पुण्यका समावेश शास्त्रानुसार हो जाता है और उसके वशीभूत सभीको देह धारण करना पड़ता है॥ २३॥
नित्यः सर्वत्रगो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः।
एकः स भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः॥ २४॥
आत्मा तो नित्य, सर्वव्यापी, कूटस्थ, दोषरहित और एक (अद्वितीय) है, किंतु मायाकी शक्तिसे उसमें भेद प्रतीत होता है, स्वभावतः नहीं॥ २४॥
तस्मादद्वैतमेवाहुर्मुनयः परमार्थतः।
भेदोऽव्यक्तस्वभावेन सा च मायात्मसंश्रया॥ २५॥
इसलिये ज्ञानीजन यथार्थमें अद्वैतकी ही सत्ता कहते हैं, किंतु माया आत्माके साथ लगी रहनेके कारण वह अव्यक्त आत्मा भी स्वभावतः भेदवाली प्रतीत होती है॥ २५॥
यथा हि धूमसम्पर्कान्नाकाशो मलिनो भवेत्।
अन्तःकरणजैर्भावैरात्मा तद्वन्न लिप्यते॥ २६॥
जैसे धुएँके सम्पर्कसे आकाश मलिन नहीं हो जाता (स्वभावतः स्वच्छ बना रहता है), उसी प्रकार अन्तःकरणमें उठनेवाले (राग-द्वेषादि) भावोंसे आत्मा लिप्त नहीं होता॥ २६॥
४०४ * गीता-संग्रह *
यथा स्वप्रभया भाति केवलः स्फटिकोपलः।
उपाधिहीनो विमलस्तथैवात्मा प्रकाशते ॥ २७ ॥
जैसे स्फटिक-मणि अपनी (स्वच्छ) प्रभासे प्रकाशित रहती है, उसी प्रकार उपाधिरहित निर्मल आत्मा भी स्वयंप्रकाशित रहता है ॥ २७ ॥
ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतद्विचक्षणाः ।
अर्थस्वरूपमेवाज्ञाः पश्यन्त्यन्ये कुबुद्धयः ॥ २८ ॥
बुद्धिमान् लोग इस संसारको ज्ञान-स्वरूप (आभासमात्र) कहते हैं, किंतु मंदबुद्धि (मूर्ख) इसे यथार्थ (सच्चा) समझते हैं ॥ २८ ॥
कूटस्थो निर्गुणो व्यापी चैतन्यात्मा स्वभावतः।
दृश्यते ह्यर्थरूपेण पुरुषैर्भ्रान्तदृष्टिभिः ॥ २९ ॥
यथा संलक्ष्यते व्यक्तः केवलः स्फटिको जनैः।
रक्तिकाव्यवधानेन तद्वत्परमपूरुषः ॥ ३० ॥
भ्रान्तचित्त लोगोंको कूटस्थ, निर्गुण, सर्वव्यापी, स्वभावतः चैतन्यरूप आत्मतत्त्व भी पदार्थ-जैसा प्रतीत होता है। जैसे लोग शुद्ध स्फटिक मणिको भी लाल पदार्थके संसर्गसे लाल ही देखते हैं, उसी प्रकार परमात्मतत्त्वके प्रति भी भ्रान्ति रहती है ॥ २९-३० ॥
तस्मादात्माक्षरः शुद्धो नित्यः सर्वगतोऽव्ययः।
उपासितव्यो मन्तव्यः श्रोतव्यश्च मुमुक्षुभिः ॥ ३१ ॥
इसलिये मुमुक्षु लोगोंको अक्षर, शुद्ध, सनातन, सर्वव्यापी, अव्यय, आत्मतत्त्वका ही चिन्तन, मनन, श्रवण तथा अनुसन्धान करना चाहिये ॥ ३१ ॥
यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा।
योगिनोऽव्यवधानेन तदा सम्पद्यते स्वयम् ॥ ३२ ॥
जब योगसाधकके मनमें सदा सर्वव्यापी चैतन्यका प्रकाश निरन्तर
* रामगीता (२) * ४०५
बना रहता है, तब उसे आत्मतत्त्वकी उपलब्धि होती है॥ ३२॥
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म सम्पद्यते स्वयम्॥ ३३॥
जब वह (योगी) सभी प्राणी-पदार्थोंको स्वयं अपने भीतर और स्वयंको सभीमें देखने लगता है, तब वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है॥ ३३॥
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभि पश्यति।
एकीभूतः परेणासौ तदा भवति केवलः॥ ३४॥
जब वह अन्य प्राणी-पदार्थोंको अपने भीतर ही देखता, तब अन्य की सत्तासे रहित परमात्मासे एकीभूत हुआ वह योगी केवलीभावको प्राप्त हो जाता है॥ ३४॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः।
तदासाममृतीभूतः क्षेमं गच्छति पण्डितः॥ ३५॥
जब उस योगीके हृदयसे सम्पूर्ण कामनाओंका लोप हो जाता है, तब वह प्रज्ञासम्पन्न अमृतत्वको प्राप्त होकर परम कल्याणका भागी हो जाता है॥ ३५॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥ ३६॥
जब विभिन्न भूत-पदार्थोंमें योगीकी एकत्व दृष्टि हो जाती है, तब उसी (दृष्टि)-का विस्तार होकर उसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो जाती है॥ ३६॥
यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः।
मायामात्रं जगत्कृत्स्नं तदा भवति निर्वृतः॥ ३७॥
जब वह योगी यथार्थ रूपमें केवल आत्माके अस्तित्वको देखने लगता है और सम्पूर्ण (बाह्य) जगत्को मायामात्र जान लेता है, तब उसे परमशान्ति प्राप्त होती है॥ ३७॥
४०६ * गीता-संग्रह *
यदा जन्मजरादुःखव्याधीनामेकभेषजम्।
केवलं ब्रह्मविज्ञानं जायतेऽसौ तदा शिवः॥ ३८॥
जब उसे जन्म, बुढ़ापा, दुःख, रोग आदिकी एकमात्र औषधि ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है, तब वह योगी साक्षात् शिवस्वरूप हो जाता है॥ ३८॥
यथा नदी नदा लोके सागरेणैकतां ययुः।
तद्वदात्माक्षरेणासौ निष्कलेनैकतां व्रजेत्॥ ३९॥
जैसे संसारके (विभिन्न) नदियाँ और नद सागरमें जाकर एकरूप हो जाते हैं, उसी प्रकार आत्मा उस अक्षर, निष्कल परमात्मतत्त्वमें मिलकर एक हो जाता है॥ ३९॥
तस्माद्विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न संस्थितिः।
अज्ञानेनावृतं लोके विज्ञानं तेन मुह्यति॥ ४०॥
इसलिये (यथार्थमें) ज्ञानकी ही सत्ता है, न तो प्रपंचकी और न सृष्टिकी कोई स्थिति है। संसारमें अज्ञानसे ज्ञान ढका रहता है, इस कारण लोगोंमें मोह उत्पन्न हो जाता है॥ ४०॥
तज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम्।
अज्ञानमिति तत्सर्वं विज्ञानमिति मे मतम्॥ ४१॥
वह ज्ञान निर्मल, सूक्ष्म, निर्विकल्प और अविनाशी है, शेष सभी (दृश्यमान प्रपंच) अज्ञानमात्र है। मूल सत्ता ज्ञानकी ही है—ऐसा मेरा मत है॥ ४१॥
एतत्ते परमं सांख्यं भाषितं ज्ञानमुत्तमम्।
सर्ववेदान्तसारं हि योगस्तत्रैकचित्तता॥ ४२॥
मैंने यह उत्तम सांख्यरूप परम ज्ञान तुम्हें बताया है। यह समस्त वेदान्तका सार है और इसमें एकनिष्ठ चित्तवृत्ति होना ही योग है॥ ४२॥
- रामगीता (२) * ४०७
योगात्सञ्जायते ज्ञानं ज्ञानाद्योगः प्रजायते।
योगज्ञानाभियुक्तस्य नावाप्यं विद्यते क्वचित्॥ ४३॥
योगसे ज्ञानकी प्राप्ति होती है और ज्ञानसे योग परिपुष्ट होता है। योग और ज्ञानसे युक्त साधकके लिये कुछ भी अप्राप्त नहीं रहता॥ ४३॥
यदेव योगिनो याति सांख्यं तदभिगम्यते।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित्॥ ४४॥
जिस परमपदको योगीजन प्राप्त करते हैं, ज्ञानी भी वही प्राप्त करते हैं। जो योग और सांख्यको एकरूप देखते हैं, वे ही तत्त्वज्ञानी हैं॥ ४४॥
अन्ये च योगिनो वत्स ऐश्वर्यासक्तचेतसः।
मज्जन्ति तत्र तत्रैव सत्वात्मैक्यमिति श्रुतिः॥ ४५॥
[श्रीरामजी बोले—] हे वत्स! अन्य (दिखावटी) योगीजन तो धन-सम्पत्तिमें आसक्त-चित्तवाले होते हैं और वे उसीमें नष्ट हो जाते हैं। श्रुतिका कथन है कि आत्माकी एकताका बोध ही वास्तवमें प्राप्य परमपद है॥ ४५॥
यत्तत्सर्वगतं दिव्यमैश्वर्यमचलं महत्।
ज्ञानयोगाभियुक्तस्तु देहान्ते तदवाप्नुयात्॥ ४६॥
ज्ञानयोगसे युक्त साधक देहान्त होनेपर उस सर्वव्यापी, दिव्य, महान्, अचल परमैश्वर्य पदको प्राप्त करते हैं॥ ४६॥
एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः।
कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः॥ ४७॥
सर्वकामः सर्वरसः सर्वगन्धोऽजरोऽमरः।
सर्वतः पाणिपादोऽहमन्तर्यामी सनातनः॥ ४८॥
मैं अव्यक्त आत्मा हूँ, मैं मायापति परमेश्वर हूँ, मैं सर्वव्यापी और सबकी आत्मा हूँ—ऐसा सभी शास्त्रोंमें कहा गया है। मैं ही
४०८ * गीता-संग्रह *
सम्पूर्ण कामनाओं, रसों और गन्धादि विषयोंका परमाधार, अजर-
अमर, अन्तर्यामी, सनातन और सर्वत्र हाथ-पैरोंसे स्थित आत्मस्वरूप
हूँ॥ ४७-४८॥
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता हृदि संस्थितः।
अचक्षुरपि पश्यामि तथाकर्णः शृणोम्यहम्॥ ४९॥
वेदाहं सर्वमेवेदं न मां जानाति कश्चन।
प्राहुर्महान्तं पुरुषं मामेकं तत्त्वदर्शिनः ॥ ५० ॥
बिना हाथ-पैरोंवाला होकर भी मैं शीघ्रगामी हूँ और सब कुछ
ग्रहण करता हूँ, (सबके) हृदयमें रहता हूँ। मैं बिना आँखोंके देख
सकता हूँ और बिना कानके सुन सकता हूँ। मैं यह सब जानता
हूँ, पर मुझे कोई नहीं जानता। तत्त्वदर्शी मुझे एकमात्र महान् पुरुष
(सत्ता) कहते हैं॥ ४९-५०॥
निर्गुणामलरूपस्य यत्तदैश्वर्यमुत्तमम्।
यन्न देवा विजानन्ति मोहिता मायया मम॥ ५१॥
मेरे निर्गुण, निर्मल स्वरूप और उत्तम ऐश्वर्यको देवता भी नहीं
जान पाते; क्योंकि वे मेरी मायासे मोहित रहते हैं॥ ५१॥
यन्मे गुह्यतमं देहं सर्वगं तत्त्वदर्शिनः।
प्रविष्टा मम सायुज्यं लभन्ते योगिनोऽव्ययम् ॥ ५२ ॥
मेरा जो सर्वव्यापी परम गुह्य अव्यय स्वरूप है, उसमें तत्त्वदर्शी
योगीजन सायुज्य मुक्ति प्राप्त करके प्रविष्ट होते हैं॥ ५२॥
येषां हि न समापन्ना माया वै विश्वरूपिणी।
लभन्ते परमं शुद्धं निर्वाणं ते मया सह॥ ५३॥
जिन्हें यह विश्वव्यापी माया नहीं छूती, वे योगीजन परम पवित्र
निर्वाणपदको मेरे साथ प्राप्त करते हैं॥ ५३॥
- रामगीता (२) * ४०९
न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि।
प्रसादान्मम ते वत्स एतद्वेदानुशासनम्॥ ५४॥
नापुत्रशिष्ययोगिभ्यो दातव्यं हनुमन्क्वचित्।
यदुक्तमेतद्विज्ञानं सांख्ययोगसमाश्रयम्॥ ५५॥
उनका सौ करोड़ कल्पोंमें भी पुनर्जन्म नहीं होता। हे वत्स! मेरी प्रसन्नतासे तुम्हें (यह ज्ञान) प्राप्त हुआ है। यही वेदोंका भी अनुशासन है। हे हनुमान्! सांख्ययोगका आश्रयभूत यह विज्ञान जो मैंने कहा है, उसे कभी अपुत्र, अशिष्य और अयोगी (कुपात्र)-को नहीं बताना चाहिये॥ ५४-५५॥
॥ इति श्रीअद्भुतरामायणे रामगीतायां प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
दूसरा अध्याय
भगवान् श्रीरामद्वारा उपनिषत्-सिद्धान्तका निरूपण
पुना रामः प्रवचनमुवाच द्विजपुङ्गव।
अव्यक्तादभवत्कालः प्रधानं पुरुषः परः॥ १॥
पुनः प्रवचन करते हुए श्रीरामने कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! मुझ अव्यक्तसे कालकी उत्पत्ति होती है और उससे प्रधान नामक तत्त्व और परम पुरुषकी॥ १॥
तेभ्यः सर्वमिदं जातं तस्मात्सर्वमहं जगत्।
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्॥ २॥
उन्हींसे यह सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है। इसलिये मैं ही सारा संसार हूँ। मेरे हाथ-पैर सब ओर हैं और मेरी आँखें, सिर तथा मुख सर्वत्र व्याप्त हैं॥ २॥
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्॥ ३॥
उस परमात्माके कान सभी ओर हैं। वह सबको व्याप्त करके