छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
by कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल
के स्वामी होने वाले पर कोई इस तरह कीचड़ उछालता है क्या। वह भी महाराज के
राजमहल के ठीक सामने। चारों ओर से भीड़ बढ़ गयी। भीड़ को देखकर
त्र्यम्बकराव और निवासराव ने और जोर से दहाड़ें मारना शुरू किया। अपने मुँह पर
स्वयं थप्पड़ मारते हुए त्र्यम्बकराव चिल्लाए, “लोगो देखो न्याय के घर में ही ऐसा
अन्याय होगा तो हम गरीब कहाँ जाएँगे। अमीर उमरावों की नजर से बचाने के लिए
क्या हमें अपनी बहू बेटियों को कत्ल कर देना होगा।
“ऐ बुड्ढे तुमको तोप के गोले खाकर मरना है क्या?” एक सिपाही ने
सामने आकर पूछा।
“तुम्हारे पास क्या सबूत है?” दूसरे ने पूछा।
“उल्टे मुझसे क्या सबूत पूछते हो; जाओ युवराज के महल की ओर,
दरवाजा खोलो और देखो अपनी आँखों से कि किस तरह वहाँ मेरी बहू को बन्दी
बनाया है। हे भगवान अब मैं कहाँ जाऊँ!”
कुछ समय पश्चात् भीड़ के पीछे कुछ हलचल हुई। एक विशेष पालकी
लेकर पालकी वाले शीघ्रता से वहाँ आये। शिवाजी महाराज के अष्टप्रधान मंडल में
से एक न्यायाधीश प्रहलाद निराजी पालकी से उतरे। वाड़कर पिता पुत्र का तमाशा
वहाँ चालू था। ‘सु’ कहते ही सुरहुरपुर समझ लेने वाले प्रहलाद निराजी के ध्यान में
सारी बात आ गयी। उन्हें भी बहुत दुःख हुआ। उन्होंने बाहर के अशोभनीय प्रकरण
को महाराज को बताया। इसके बाद हिन्दवी स्वराज्य के विद्वान काजी मुल्ला साबही
वहाँ पर पहुँचे। वे भी घबराई निगाह से महाराज की ओर देखने लगे। महाराज ने
तुरन्त निर्णय लिया। उन्होंने पिता पुत्र को अन्दर बुलाया। महाराज के चरणों पर
अपना सिर जोर जोर से पटकते हुए चिल्लाकर बोला, “महाराज स्वयं युवराज
ऐसी गलती करते रहेंगे तो हम जिन्दा कैसे रह सकेंगे? मुगलों के शासन में कहते हैं
कि यदि कोई सुन्दर औरत रास्ते में दिखती है तो उसे अपने जनानखाने में खींच ले
जाते हैं और यहाँ!”
“खामोशऽऽ,” महाराज ऊँची और तीखी आवाज में बोले, “अपनी जबान
सँभालो, अब तक बहुत बोल चुके हो।”
शिवाजी महाराज की मुद्रा बहुत गम्भीर दिखाई देने लगी। सच बात यह थी
कि भोर में भगवान की पूजा करके कीमती वस्त्रों को पहन कर महाराज रंगपंचमी
मनाने के लिए बाहर निकलने वाले थे। इसकी तो उन्हें कल्पना तक न थी कि आज
त्योहार मुहूर्त पर रंग के बदले उनके ऊपर बदनामी का अबीर फेंका जाएगा। युवराज
शम्भूराजा की सौतेली माँ पुतलीबाई त्योहार के अवसर पर नीचे पाचाड़ गाँव के घर
से किले पर आयी थीं। उन्होंने पोलादपुर के जौहरी से विशेष प्रकार के रत्नों की
एक कंठमाला बनवायी थी। होली के विशेष अवसर पर वह अपने प्रिय युवराज
शम्भूराजा को यह कंठमाला उपहारस्वरूप देना चाहती थी। किन्तु यहाँ पर यह
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प्रकरण देखकर माँ पुतलीबाई आश्चर्य से हतवाक हो गयीं।
बड़े महाराज के साथ पूजा के लिए सोयराबाई बाहर निकलने वाली थीं। गले
में रत्नहार, सोने की करधनी पहनकर, जरीदार शाल ओढ़े वे पूरी तरह तैयार खड़ी
थीं। पर बाहर के इस अप्रत्याशित प्रकरण को देखकर वे भी आश्चर्य से ठगी-सी रह
गयीं। वे प्रयत्न कर रही थीं कि उनके चेहरे पर उभरने वाले भावों को कोई
समझ न पाये।
कुछ दिन पहले अण्णाजी दत्तो की पुत्री हंसा और शम्भूराजा के सम्बन्ध में
कुछ ऐसी ही अफवाहें फैली थीं। शम्भूराजा के साथ ऐसा क्यों होता है? त्योहार के
मांगलिक अवसर पर ऐसी बदनामी का प्रसंग क्यों आता है। यह सोचकर महाराज
को दुःख हो रहा था। औरंगजेब के साथ अन्य शत्रुओं के सामने सदैव उन्नत रहने
वाला उनका सिर आज शर्म से झुका हुआ था। किन्तु उनके भीतर एक समझदार
राजा बैठा था। उन्होंने भावना की बाढ़ को भीतर-ही भीतर नियन्त्रित कर लिया
महाराज के मन में शम्भूराजा के लिए ममता का प्रवाह सूखने लगा था। कर्तव्य
पालन वाला राजदंड महाराज ने अपने हाथ में कसकर पकड़ रखा था। वे शान्त भाव
और धीमी आवाज में केवल इतना ही बोले, "देखा त्र्यम्बकराव। बाहर पालकी का
उत्सव समाप्त होने दीजिए। तब तक तुम यहीं पर निश्चिन्त होकर बैठे रहो।
गुनहगार चाहे जितना भी महान हो, उसकी पूछताछ ठीक ठीक करवाई जाएगी।
तुमको न्याय अवश्य मिलेगा।"
बाहर निकलते हुए महाराज के कदम डगमगाये। उन्होंने काजी मुल्ला साहब
को अपने पास बुलाया। उनकी सफेद लम्बी दाढ़ी पर महाराज को अत्यधिक
विश्वास था। राज्य के एक नेक न्यायदाता के रूप में मुल्ला साहब मुसलमानों से भी
अधिक मराठी प्रजा में लोकप्रिय थे। महाराज ने उन्हें कुछ सूचनाएँ दीं। मुल्ला
साहब ने महाराज को बड़े आदर से कोर्निस की और अगली कार्यवाही के लिए
तुरन्त बाहर निकल गये।
राजदरबार से बाहर निकलते हुए पुतलीबाई ने शम्भूराजा के महल पर एक
नजर डाली, उनकी आँखों से गर्म आँसू ढल पड़े।
रायगढ़ की यह रंगपंचमी बदरंग हो गयी थी। आज की शोभायात्रा में हाथियों के
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हौद, पालकी, ढोल-तेजिम की आवाज आदि की ओर लोगों का ध्यान अधिक
नहीं गया। उत्सव के दर्शक और रिश्तेदार तरह-तरह की बातें कर रहे थे। आपस में
बड़बड़ा रहे थे।
"कैसा है यह युवराज का साहस! देखा दूसरे की स्त्री को घोड़े पर बिठाया
और खींच लाये अपने राजमहल में और वह भी दिन दहाड़े।"
रंगपंचमी का उत्सव किसी प्रकार समाप्त हो गया। सूर्य पश्चिम दिशा में ढल
गया। शिवाजी महाराज बैठे थे। उनकी मुखमुद्रा अत्यन्त तनावपूर्ण थी। ऐसा लगता
था वे किसी बड़े बोझ के दबाव से बेचैन हो रहे हैं।
"शम्भूराजा को तुरन्त उपस्थित होना है।" ऐसे सन्देश नहीं बल्कि सख्त
आदेश उन्होंने भेजा था। बैठक के सामने नीचे की गद्दी पर त्र्यम्बकराव और
निवासराव अल्लाह की गाय की तरह असहाय की तरह उदाम बैठे थे। वे अब भी
इसी अभियोग की मुद्रा में थे कि उनके साथ बड़ा अन्याय हुआ था। इसी समय
बाहर किसी के आने की आहट सुनाई पड़ी। अपने गले में पड़ी पाँच लड़ की माला
के साथ खेलते हुए धीमी गति से किन्तु बड़े आत्मविश्वास के साथ शम्भूराजा वहाँ
पर आ पहुँचे। एक दम गोरा रंग हल्की लाल मुद्रा, उन्नत भाल, कमानीदार भौंहें,
काली-काली गहरी और बोलती हुई आँखें। राजकुमारों के बीच सभी से अलग
दिखाई देनेवाला शम्भूराजा का व्यक्तित्व अत्यन्त आकर्षक था। उन्होंने महाराज की
नजर से नजर मिलायी। किन्तु बड़े महाराज की आँखों में उमड़ते दुख के सागर को
देखकर युवराज की आँखें नीचे झुक गयीं। पिता-पुत्र की उपस्थिति में उनकी शोभा
से पूरा महल दमक रहा था। दोनों को ही विधाता ने अपार सौन्दर्य का उपहार दिया
था। दोनों को एकत्र देखकर ऐसा लगता था मानो सूर्य से मिलने के लिए चाँद आकर
खड़ा हो।
बैठक में तनाव बहुत बढ़ गया था। युवराज पर लगाये इस आरोप से उनके
यार दोस्त भी हैरान थे। उनका बचपन का दोस्त रायप्पा महार और जोत्याजी
केसकर महल के बाहर दुखी मन से मुँह लटकाए खड़े थे। युवराज के पीछे पीछे
उनकी पत्नी येसूबाई भीतर आयीं। उनके अचानक वहाँ आने से बड़े महाराज
आश्चर्यचकित हो गये। महाराज ने देखा कि येसूबाई के पीछे साफ सुथरे कपड़ों में
एक अपरिचित नवयुवती खड़ी थी। उस नवयुवती की ओर वाड़कर पिता पुत्र की
भी नजरें गयीं। महाराज ने अनुमान लगाया कि शम्भूराजा के अन्याय की शिकार
यही अपरिचित युवती होगी। किन्तु येसुबाई जैसी समझदार पुत्रवधू की वहाँ
उपस्थिति से महाराज की हैरानी बढ़ गयी थी। उन्होंने कहा-
"ध्यान से सुनो, बहूरानी ! शम्भूराजा के अपराध और उनकी बढ़ती जा रही
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हरकतों को पिता के रूप में एक बार नजरअन्दाज कर दूँ तो भी राजा को अपना राज
दंड ममता के गहरे पानी में फेंक देना सम्भव नहीं।"
गम्भीर मन्त्रघोष की तरह महाराज की आवाज गूँजने लगी।
येसूबाई एक भी शब्द बोल नहीं सकी। युवराज संभाजी के चेहरे पर अपमान
का भाव झलकने लगा। असाधारण तनाव के कारण उनकी गर्दन नीचे झुक गयी।
इस स्थिति के कारण ऐसा लगा कि त्र्यम्बकराव और निवासराव का साहस कुछ बढ़
गया है। पिता-पुत्र साहस के साथ खड़े हो गये। त्र्यम्बकराव ने अपना उत्तरीय झटक
दिया। वह पीपल के पत्ते की तरह काँप रहा था। उसने कहा, "महाराज मुझे अपनी
पुत्रवधू चाहिए।"
"महाराज मुझ गरीब की पत्नी मुझे वापस दे दो न।" निवासराव ने
गिड़गिड़ाते हुए कहा।
महाराज ने एक तीखी नजर संभाजी राजा की ओर घुमायी—"दुर्भाग्य केवल
दुर्भाग्य। आज इस स्वराज में किसी भी स्त्री की इज्जत सुरक्षित नहीं है। हमारी प्रजा
यदि खुलकर ऐसा बोलने लगी तो हम किसका मुँह देखेंगे।"
महल में पूरी स्तब्धता छा गयी। महाराज की कठोर वाणी से युवराज और
युवराज्ञी की वाणी कुंठित हो गयी। वाड़कर पिता पुत्र के झूठ को बढ़ावा मिला
किन्तु गोदू की साँस अटक गयी। इससे आगे उससे चुप न रहा गया। वह सीधे
आकर महाराज के पैरों पर गिर पड़ी और व्याकुल होकर कहने लगी—
"महाराज, मैं माँ भवानी की कसम खाकर कहती हूँ कि ये दोनों स्वराज्य के
दुश्मन और धोखेबाज हैं। आज रंगपंचमी की भीड़ का लाभ उठाकर रायगढ़ किले
पर ही महाराज की हत्या का षड्यन्त्र इन दुष्टों ने रचा था।"
हमारे ऊपर शस्त्र उठाना ! वह भी यहाँ रायगढ़ में, यहाँ आकर हमारे ऊपर ?
उस गम्भीर परिस्थिति में भी महाराज अपनी हँसी नहीं रोक सके। राजा के नौकर
और पहरेदार भी हँस पड़े। त्र्यम्बकराव का साहस इससे और बढ़ गया। वह हाथ
जोड़कर दीनता से बोला, "देखा न महाराज, आपके युवराज ने इस गरीब की
पुत्रवधू पर कैसा जादू डाला है। महाराज ! युवराज तो रंग उठाते हैं किन्तु इस गरीब
की इज्जत तो धूल में मिल गयी।"
महाराज ऊपर से थोड़ा ही विचलित दिखायी पड़ रहे थे किन्तु भीतर से
उनका धैर्य छूट चुका था। महाराज को शम्भुराजा के पराक्रम के सम्बन्ध में तनिक भी
सन्देह नहीं था किन्तु उनके चरित्र में आजकल उनका विश्वास डगमगा गया था।
अष्टप्रधान ने, नौकरों ने, सरदारों ने महाराज को अनेक बार यह संकेत दिया था कि
किसी सुन्दर स्त्री पर निगाह पड़ जाने पर युवराज किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।
22 . सम्भाजी
इन्हीं सूचनाओं के कारण महाराज बहुत खिन्न थे।
इसी बीच दरवाजे के बाहर कुछ गड़बड़ी की आहट मिली। अपना जरी के
किनारे वाला उत्तरीय सँभालते हुए, ऊँचे कद, मजबूत हड्डियों वाले अण्णाजी
अचानक अन्दर आये। उनकी घनी मूँछें, बोलती आँखें, कानों के हिलते कुंडल,
तेजस्वी साँवला रंग आदि अहंकारी व्यक्तित्व का प्रमाण दे रहे थे। पैंसठ वर्ष के
अण्णाजी ने महाराज के साथ अनेक ग्रीष्म और वर्षा ऋतुएँ देखी थीं।
पन्त कुछ रुके। आगे का शब्द बोलने से पहले अण्णाजी दत्तो ने संभाजी राजा
को गौर से देखा। युवराज ने भी क्रुद्ध होकर उनकी आँख से आँख मिलायी। युवराज
की चमकती पुतलियाँ पन्त को बरछी के नोक जैसी धारदार और चमकदार दिखायी
पड़ीं। ये दोनों एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते थे। अण्णाजी पन्त ने अपने
माथे का पसीना उत्तरीय से पोंछ दिया। अपनी बात सँवारते हुए वे बोले, "महाराज
यह बेचारी गोदू मेरी पत्नी की बहन की बेटी है। ये त्र्यम्बक मेरे करीबी रिश्तेदार
हैं, महाराज!''
कहते कहते अण्णाजी की नजर गोदू के निश्छल निष्पाप चेहरे पर पड़ी और
उनका मन फूट फूट कर रोने लगा। उनकी इकलौती बेटी हंसा की छवि उनकी
कल्पना में नाचने लगी। हंसा वस्तुतः एक जीती-जागती जीवन-लीला थी। पंछियों
की तरह क्रीड़ाशील, मोर की तरह नाचने वाली, तितली की तरह पन्त के इर्द-गिर्द
घूमने वाली हंसा और उसकी स्मृतियाँ अण्णाजी का पीछा छोड़ने को तैयार न थीं।
रायगढ़ के परिसर में होने वाली बारिश और वर्षा के पानी से पग पग पर बहने वाले
झरने और इन्हीं पवित्र झरनों की तरह हंसा यौवन के उत्सव में सदैव नाचती रहती
थी। अण्णाजी पन्त ने हंसा की शादी कुछ जल्दीबाजी में रचा दी थी। वह अपनी
ससुराल पेण से पहली बार मायके आयी थी। एक दिन मंगला गौर के बहाने हंसा
राजमहल में गयी। वहाँ से दुखी नहीं घायल होकर वापस लौटी। दो तीन दिन के
बाद पाचाड़ के एक भरे हुए कुएँ में लोगों ने उसका तैरता हुआ शव देखा। उसके
इस तरह अचानक जाने से सारा परिसर व्यथित हो गया।
इस घटना के सम्बन्ध में जितने लोग उतनी बातें कर रहे थे। कोई कहता था
कि हंसा पर बलात्कार हुआ। कोई कहता था कि उसके मन पर कोई गहरा आघात
हुआ जिसके कारण उसने स्वयं ही मृत्यु को गले लगा लिया। किन्तु अण्णाजी पन्त
तो अभी भी अपनी लाड़ली बेटी की याद में पागल हो जाते थे।
पन्त के आगमन से वातावरण और भी गम्भीर हो गया न्यायाधीश प्रह्लाद
निगजी घबरा गये। त्र्यम्बकराव ने अपनी पगड़ी उतारकर शिवाजी महाराज के पैरों पर
रख दी। वह दुखी स्वर में चिल्लाया—"महाराज! गरीब की बहू को वापस उसे
करो।"
सम्भाजी :. 23
अण्णाजी दत्तो ने लज्जा से अपना सिर झुका लिया। महाराज भी बहुत
शर्मिन्दा दिखाई दे रहे थे। उन्होंने क्रोध से येसूबाई की ओर नजर घुमायी। येसूबाई
पर इस घटना का कोई भी प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा था। बल्कि एक तरह के
अभिमान और आत्मविश्वास से वह अधिक तेजस्विनी प्रतीत हो रही थी। येसूबाई
ने पन्त की बात काटते हुए सीधा प्रश्न किया—‘‘बिना प्रमाण के उल्टा-सीधा कोई
भी आरोप लगाने का अधिकार किसी को भी नहीं है। जहाँ तक इज्जत का सवाल
है, वह जैसे प्रजा को प्रिय होती है वैसे ही युवराज को भी।’’
येसूबाई के इस अचानक आक्रमण से पन्त कुछ लज्जित हुए। परन्तु महाराज
ने बीच में हस्तक्षेप करके येसूबाई को रोक दिया—‘‘बहूरानी ! हो सकता है कि तुम
पर पतिप्रेम का जादू चढ़ गया हो किन्तु पिता होने के नाते युवराज को हम तुमसे
अधिक अच्छी तरह पहचानते हैं।’’
पहले से जिनके चारों ओर आरोपों की आँधी घूम रही थी। शम्भूराजा चुप थे।
केवल सुन रहे थे। अब और अधिक उनसे चुप नहीं रहा गया। दुखी स्वर में
शम्भूराजा बोले—
‘‘पिताजी दुख इसी बात का है कि हमसे कोई अपराध नहीं हुआ है फिर भी
हमें अपराधी ठहराया जा रहा है। यह बहुत बड़ा अन्याय है पिताजी। आज की
घटना की जाँच पड़ताल आप अवश्य कीजिए। जाँच के बाद आपको भी विश्वास
हो जाएगा कि आज होली मनाने की जगह पर, ठीक शोभा यात्रा के समय तोपों से
पटाखों की बारूद के बदले असली बारूद के गोले दागे जाने वाले थे। षड्यन्त्रकारी
आपकी जान लेने पर तुले हुए थे, पिताजी। यही सूचना देने के लिए यह निष्पाप
गोदू दौड़ी-भागती आयी। वह मूर्ख मान ली गयी और मैं बदनाम हुआ।
‘‘शम्भूराजा ! केवल काल्पनिक कथाओं के आधार पर राज काज नहीं
चलाया जाता। उसके लिए ठोस सबूत की आवश्यकता होती है।’’
अण्णाजी पन्त का दबा हुआ गुस्सा भड़क उठा था। अपने उत्तराधिकारी पर
खुलेआम आरोप लगाये जाने से बड़े महाराज भी बेचैन हो गये थे। इसी समय
मुल्ला हैदर वहाँ आये। महाराज ने उन्हें बड़ी आशा भरी दृष्टि से देखा। उनकी
न्यायबुद्धि पर महाराज को बहुत विश्वास था। साठ वर्ष के मुल्ला साहब अपनी
पलकों को झपकाते हुए बोले, ‘‘महाराज ! आपकी आज्ञा के अनुसार बाघ दरवाजे
की ओर पहुँचाये गये बारूद की हमने बारीकी से जाँच की। पता चला कि उसमें
पटाखे की बारूद थी ही नहीं।’’
वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। हिन्दवी स्वराज की
राजधानी में इस प्रकार का घातक षड्यन्त्र चिन्ता का विषय था। मुल्ला हैदर ने
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अपनी जाँच का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत कर दिया था। किले के ऊपर के बारूदखाने से
तोप के गोले बाघ दरवाजे पर ही नहीं कहीं भी नहीं भेजे गये थे। उसी दोपहर में
काले हौज के पास सन्दिग्ध अवस्था में देखे गये छः-सात लोगों को गड़करी
कान्होंजी भांडवलकर की बटालियन ने रोका था। ये चोर अपने को बचाने के लिए
भवानी कड़ा की ओर भागे। उन्होंने उस भयानक कड़े के ऊपर से नीचे की करौंदों
की झाड़ियों में छलाँग लगायी। उस जगह पर अभी भी उनकी तलाश जारी है।
थोड़ी देर में कान्होंजी राव स्वयं दरबार में उपस्थित हुए। उन्होंने शिवाजी
महाराज को बताया—"महाराज! उन सन्दिग्ध लोगों में से चार जनों के शव मिले
हैं। लिबास को देखने से वे बाहर से आये हुए पठान दिखाई पड़ते हैं। इससे पहले
इन्हें इस क्षेत्र में किसी ने नहीं देखा।"
शिवाजी महाराज के चेहरे पर उभरी तनाव की रेखायें ढीली पड़ गयीं!
उन्होंने अपनी चमकती आँखों से गोदू की ओर कृतज्ञता से देखा। महाराज को
विश्वास हो गया था कि शत्रुओं ने एक बहुत बड़ी साजिश का जाल बुना था।
महाराज शम्भूराजा की ओर रुख करके बोले, "इतनी जरूरी खबर थी तो
बाघ दरवाजे की ओर दौड़ने से पहले आपने मुझे क्यों नहीं सूचित किया?"
"वहाँ दौड़कर पहुँचना और तोपों को नाकाम करके मराठों के प्राणों की रक्षा
करना मेरा प्रथम कर्तव्य था, पिताजी।" शम्भूराज ने उत्तर दिया।
शिवाजी महाराज की तीखी नजर वाड़कर पिता-पुत्र पर पड़ी। वे दोनों बहुत
घबरा रहे थे। वे हकलाते हुए महाराज की ओर देख रहे थे। सारा प्रसंग बता रहा था
कि दाल में कुछ काला था। दाल में काले का अनुमान अण्णाजी को भी हो गया था।
उनकी शुरू में चढ़ी हुई त्योरी अपने आप ढीली हो गयी। सभी की नजर महाराज
की ओर उठी। बड़े महाराज की नीर-क्षीर विवेकीवाणी फूटी—
"अण्णाजी पन्त! यह घटना जटिल होती जा रही है। इसकी पूरी जाँच करना
आवश्यक है। कान्होंजी! जाँच पड़ताल पूरा होने तक इन पिता-पुत्र को सामान्य कैद
में रखो।"
त्र्यम्बकराव और निवामराव को ऐसा लगा जैसे उनकी पीठ में भाले की नोक
चुभ गयी हो। उन्हें कैदखाने की ओर ले जाया गया। अण्णाजी उनकी कोई सहायता
नहीं कर सके।
गोदू पहले की तरह ही सहमी खड़ी थी। अण्णाजी उसके पास गये और
उसके सिर पर हाथ रखकर बोले, "चल बेटी! कल से तुम्हें बहुत परेशानी उठानी
पड़ी है। चल अपनी मौसी के पास।"
गोदू ने अण्णाजी का हाथ झटक दिया। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। वह
महाराज से इतना ही बोली, "महाराज! मुझे किसी रिश्तेदार के पास नहीं जाना है।
सम्भाजी :: 25
जो हो गया वही बहुत है। "
शिवाजी महाराज बड़े संकट में पड़ गये। गोदू के प्रति महाराज के मन में
बड़ी दया उमड़ रही थी। यदि दूसरा अवसर होता तो महाराज उसकी बहादुरी के
लिए अपने गले का रत्नहार उसे पहना देते। किन्तु वाड़कर पिता पुत्र के अपराधी
सिद्ध होने पर भी वे अण्णाजी के रिश्तेदार थे। पूछताछ पूरी होने तक अपने
अष्टप्रधानों में से किसी का भी अपमान होना महाराज की नीति के विरुद्ध था। वे
किसी भी अधिकारी को अपमानित नहीं होने देते थे।
किन्तु गोदू का क्या किया जाय ! महाराज इस बात को लेकर बहुत चिन्तित
थे। अण्णाजी गोदू को अपने घर ले जाना चाहते थे। किन्तु उनके घर के लिए तैयार
न थी।
महाराज ने अन्त में निर्णय सुनाते हुए कहा, "गोदू छोटी बच्ची नहीं है। वह
अपने बारे में स्वयं निर्णय ले लेगी।"
महाराज अपना निर्णय सुनाकर मुक्त हो गये। किन्तु गोदू की समझ में कुछ
नहीं आ रहा था कि वो कहाँ जाय ?
हवा की चपेट में आकर जिस तरह कोई सूखा पत्ता अटक जाता है उसी तरह
गोदू भी कुछ समय तक खड़ी रही। उसने पहले शम्भुराजा की प्रशान्त और गम्भीर
मुद्रा की ओर देखा। उसकी दृष्टि युवराज की बगल में खड़ी येसूबाई पर पड़ी।
येसूबाई भगवान की मूर्ति के सामने जलती दीप शिखा की तरह तेजस्विनी, ममता
की मूर्ति, स्वभाव से शीतल और कोमल मन की दिखाई पड़ रही थी। गोदू एकाएक
भाव विभोर हो उठी। वह दौड़कर येसूबाई की बाँहों में समा गयी। वह व्याकुल
होकर बोली, "युवराज्ञी आप ही मुझे अपने आँचल में सम्भाल लो। आपकी दासी
बनकर मैं आपकी हर आज्ञा मानने और हर काम करने के लिए तैयार हूँ।"
जिसके कारण येसू के पति पर लांछन लगाया था वही उसके गले पड़ रही
थी। अचानक घटित इस प्रसंग से सभी संकट का अनुभव कर रहे थे। गोदू का शरीर
सहायता प्रतीक्षा में थर थर काँप रहा था। येसू ने गोदू के चेहरे पर ममता से इस तरह
हाथ फेरा मानो मक्खन के पिंड को सहला रही हों। युवराज्ञी ने बड़ी बहादुरी से
कहा, "ठीक है गोदू! जब तक तेरी कोई समुचित व्यवस्था नहीं हो जाती तू हमारे
अन्तःपुर में रह सकती है।"
एक नौकर को आदेश देते हुए येसूबाई ने कहा, "इसको लेकर मेरे महल में
जाओ। मैं भी पीछे आ रही हूँ।" पन्त का विचार था कि शिवाजी महाराज येसूबाई
के इस व्यवहार में हस्तक्षेप करेंगे किन्तु महाराज ने उस ओर ध्यान ही नहीं दिया।
इसके विपरीत उन्होंने मुल्ला हैदर को बाघ दरवाजे के पास घटी घटना अच्छी तरह
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जाँच करने का आदेश दिया। अपने प्रति महाराज की बेरुखी और उपेक्षा से लज्जित
हुए। अपनी नाराजगी को व्यक्त न करते हुए अपना उत्तरीय झटककर क्रोध से दरबार
से बाहर चले गये।
अब महल में बड़े महाराज, सम्भाजी राजा और येसूबाई के अतिरिक्त और
कोई नहीं था। महाराज बड़ी दुख भरी नजरों से युवराज को देख रहे थे। युवराज की
मुख मुद्रा में अनेक प्रकार की भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था। सम्भाजी राजा के
धीरज का बाँध टूट गया। वे बड़ी विनम्रता से बोले, "पिताजी! क्षमा करें! मैंने
आपको बड़ा कष्ट दिया है। किन्तु...।"
"पिताजी! कोई अपराध न करने पर भी किसी को अपराधी ठहराकर दंडित
करना कहाँ का न्याय है? पिताजी थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाय कि आपका
युवराज चरित्रहीन है। परन्तु रायगढ़ की सुरक्षा में इतनी शिथिलता कब से होने
लगी?"
"मतलब?"
"चितदरवाजों के फौलादी किवाड़ आजकल कभी भी रात बिगत कैसे खोल
दिये जाते हैं। स्वयं छत्रपति इस किले पर रहते हैं, तब भी?"
शिवाजी महाराज व्यंग्यपूर्वक हँसे और बोले, "पागल हो गये हो क्या बेटा?
अरे, शाम को जब एकबार चितदरवाजा बन्द हो जाता है तो दूसरे दिन सुबह तक
आदमी तो क्या कोई कीड़ा भी ऊपर नीचे नहीं हो सकता।"
महाराज की बात सुनकर संभाजी राजा ने कहा, "यदि ऐसी बात है तो उसी
दरवाजे से, जैसा कि अण्णाजी पन्त और दूसरे लोग कहते हैं, भोर में आदमी जाते
कैसे और सुबह होने से पहले वाड़कर की बहू, को भगाकर कैसे ले आते हैं?"
शम्भुराजा के इस प्रश्न पर शिवाजी महाराज बहुत विचलित हो गये। युवराज
के ऊपर बदनामी के कीचड़ उछाले जाने और घटित हो रही घटनाओं के बीच
निश्चय ही कुछ गड़बड़ है। यह महाराज भी अनुभव कर रहे थे। युवराज के शब्दों
ने महाराज के हृदय के टुकड़े टुकड़े कर दिये—"पिताजी! आजकल हमारे दिन
इतने बुरे हैं कि महाराज ने अपने दिल के दरवाजे शम्भू के लिए बन्द कर लिए हैं।
और चोर डाकू कभी भी आ जा सकें इसलिए चितदरवाजे के किवाड़ों को पैर लग
गये हैं।"
युवराज की बातें सुनकर महाराज के हृदय में ममता का बाँध टूट पड़ा। उन्होंने
शम्भुराजा के कंधे पर हाथ रखकर बड़े प्यार से कहा, "मन को इतना खट्टा न करो
बेटा! कहीं पर कुछ गड़बड़ी जरूर है। हम इसका पता अवश्य लगाएँगे।"
पिताजी! स्पष्ट रूप से बताता हूँ। आपको अपने प्यारे पुत्र से अलग करने के
लिए सारी अच्छी बुरी ताकतें एकजुट हो गयी हैं।"
सम्भाजी · 27
महाराज ने बड़े प्यार से शम्भूराजा को अपने समीप बिठाया। उनकी पीठ पर
अपना ममता भरा हाथ फेरते हुए बोले, "हमारे कर्मचारियों से यदि कुछ त्रुटियाँ हुई
होंगी तो निश्चय ही हम उनकी जाँच पड़ताल करेंगे। परन्तु बेटा, एक बात ध्यान
रखना कि हमारे अष्ट प्रधान, हमारे सरदार, स्वराज्य का प्रासाद खड़ा करने में विगत
चालीस वर्षों से रात-दिन, एक करने वाले हमारे प्राणों से भी प्रिय साथी रहे हैं।
उनकी मान-मर्यादा उनके सम्मान का ध्यान रखना युवराज होने के नाते आपका भी
कर्तव्य है। आप अपना व्यवहार सुधारें। नहीं तो...।"
"नहीं तो क्या?" शम्भूराजा की आँखों ने प्रश्न किया, "आपसे अलग
अकेले में जीने की हमें आदत डालनी होगी।"
महाराज के इन कठोर शब्द को सुनते ही शम्भूराजा ने ऐसा अनुभव किया
जैसे बाढ़ के बहाव में कोई बड़ा पेड़ उखड़ कर गिर गया हो। युवराज की आँखों में
आँसू आ गये। उन्होंने कहा-
"पिताजी! आपसे अलग रहने की कल्पना भी हमारे हृदय को चिथड़े
चिथड़े कर देती है। एक बार इस संभाजी को हाथी के पाँव के नीचे कुचलकर मार
डालने की सजा भले दे दीजिए। वह सजा मैं खुशी-खुशी स्वीकार कर लूँगा। किन्तु
आपसे अलग रहने की कल्पना से मेरा हृदय विकल हो उठता है।
अचानक शम्भूराजा को अपनी दादी जीजा माता का स्मरण हो आया। उन्होंने
युवराज के कान में एक ही मन्त्र दिया था-"मेरे बच्चे शम्भू तू सदैव ही शिवाजी
की छाया में रहना।" लेकिन अब समय बदल गया था। पूरी दुनिया को ममता की
छाया देने वाले महाराज को शम्भू के लिए समय ही नहीं था। शम्भूराजा अचानक
गद्गद स्वर में बोल पड़े-"पिताजी! कभी इस पागल संभाजी के बिना शिवाजी
महाराज जीवित रह सकेंगे किन्तु आपकी छाया से दूर होकर इस संभाजी का जीवित
रहना असम्भव है। बस वही हमारा दोष है।"
शिवाजी महाराज ने अनुभव किया कि कहीं कोई भूल हो रही है। शम्भूराजा
ने अपनी जन्मदात्री माँ का मुँह कभी नहीं देखा था। पुत्र के समान प्रेम से पालने
वाली उनकी दादी जीजा माता भी कभी की भगवान को प्यारी हो गयी थीं।
शिवाजी महाराज सोचने लगे, राज्याभिषेक समारोह तक जिसे होनहार पुत्र मानते
थे; जिसने छोटी उम्र में कर्नाटक में कोलार की वतनदारी सम्भाली थी; फ्रांसीसी,
पुर्तगाली, अंग्रेज जैसे अनेक देशों के वकील महाराज से मिलने से पहले जिससे
परामर्श करते थे, जिसकी प्रखर बुद्धि और दिलेरी को देखकर लोग कह उठते थे-
"यह तो भविष्य का सवाई शिवाजी है।" इस प्रकार जिसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा
होती थी वही अपना पुत्र पास होते हुए भी दूर जा रहा है। किसी-न-किसी से
अवश्य चूक हो रही है। यह सोचकर शिवाजी विचलित हो उठे और शम्भूराजा को
बाँहों में भर लेने के लिए आगे बढ़े लेकिन शम्भूराजा तो वहाँ थे ही नहीं। वे और
28 :: सम्भाजी
उनके पीछे येसूबाई राजमहल का आँगन पार करके बाहर निकल रहे थे। शिवाजी
महाराज, आश्चर्यचकित होकर शम्भूराजा को पीछे से देखते रह गये।
तीन
उस दिन महादरवाजे के पहरे पर रायप्पा था। दोपहर में किले पर चहल-पहल कम
होती है। उसी समय एक सजी हुई साँड़नी दरवाजे के सामने आकर खड़ी हुई।
उसके साथ भास्कर ठाकुर और दो फिरंगी सवार थे। उनके आते ही पहरे पर तैनात
सूबेदार ने अन्दर जाने का संकेत किया। वे लोग अन्दर प्रवेश करने ही वाले थे कि
रायप्पा अड़ गया। वह कड़ी आवाज में पूछने लगा—
"कौन हैं आप? कहाँ से आये हैं?"
"जाने दे रे रायप्पा, गोवेकर वकील रामजी ठाकुर के लोग हैं। उनको
अण्णाजी पन्त के बाड़े में जाना है।" ऐसा लगा कि सूबेदार को उनके आने के पहले
से ही उनके बारे में जानकारी थी। रायप्पा कुछ हड़बड़ाया किन्तु तत्काल सँभलते
हुए बोला, "वकील के लोग हैं तो उन्हें महाराज को मिलना चाहिए।"
"परन्तु उनको पन्त सुरनवीस (एक पद) को मिलना होगा तो?"
"पर इस प्रकार का आदेश कहाँ सूबेदार?"
"रायप्पा किसलिए फालतू बखेड़ा करता है? बड़े महाराज आज किले में
नहीं हैं।"
"तब ये लोग युवराज से मिलें।"
सूबेदार रायप्पा को मनाने लगा। इससे रायप्पा और सावधान हो गया। वह
बाहर से भले ही जंगली और मतलबी दिखे लेकिन जंगली पक्षियों की धीमी
आवाज की तरह चोरों की हल्की आवाज को सहज ही पहचानता था। इसलिए
पुर्तगाली वाइसराय के वकील का अण्णाजी पन्त को चोरी से कुछ भेजने में उसे
दाल में काले की शंका हुई। उसने गोवेकर लोगों को वहीं पर रोककर युवराज के
पास सन्देश भेजा। शम्भूराजा का आदेश मिला तो रायप्पा ने सभी को ले जाकर
शम्भूराजा के दरवाजे पर खड़ा किया।
शम्भूराजा ने भास्कर ठाकुर से कड़ी आवाज में पूछा, "सच-सच बताओ,
किसका है यह सामान? क्या है इस सन्दूक में?"
लिपिक गोवेकर हड़बड़ा गया। उसने साफ-साफ बोल दिया—"दो बड़े
सम्भाजी :: 29
रत्नहार हैं। फिरंगियों के वकील रामजी ठाकुर ने गोवा से भेजे हैं।"
"किसके लिए?"
"सुरनवीस अण्णाजी पन्त के लिए।"
"ईनाम के रूप में?"
"वैसे नहीं। पर...।" भास्कर ठाकुर ने 'त...त...प...प' हकलाते हुए सारी
बात साफ कर दी। उसने बताया-"क्या हुआ युवराज कि दो महीने पहले हमारे
वकील स्वयं महाराज से मिलने के लिए रायगढ़ आये थे। तब उन्होंने वाइसराय की
ओर से एक बहुमूल्य उपहार महाराज को दिया था।
"ठीक है। फिर?"
"परन्तु...परन्तु...उस समय सुरनवीस अण्णाजी पन्त और मोरोपन्त पेशवा के
लिए कुछ ले आना भूल गये थे। मोरोपन्त ने तो इस विषय में एक शब्द भी नहीं
कहा किन्तु अण्णाजी ने पिछले तीन महीने में तीन चिट्ठियाँ भेजीं। रामजी पन्त को
बहुत पीड़ित किया। पन्त ने कहा- "राज्य के कार्य व्यापार में कर्मचारी असन्तुष्ट
हो जाय तो बड़े-बड़े काम भी धूल में मिल जाते हैं। इसलिए..."
"आगे?"
"आगे बोले तो उन्होंने दो बड़े रत्नहार खरीद लिये। वही लेकर हम आज
पन्त को मिलने के लिए आये हैं।
"ठीक है। युवराज की हैसियत से हम इसे स्वीकार करते हैं।"
शम्भुराजा ने बगल में देखा। वहाँ पर पीठ पर अपने लम्बे बालों को खुला
छोड़े, ऐंठी मूँछों वाले, गेहुँए रंग के, तीस वर्ष के, बलिष्ठ और लम्बी कद काठी के
कवि कलश खड़े थे। उनकी ओर देखते हुए युवराज ने कहा, "कविराज इन लोगों
को लिखित रसीद दे दीजिए और इन्हें तुरन्त वापस जाने दीजिए।"
गोवेकर दूत चले गये तब हाथ जोड़कर कवि कलश ने युवराज से निवेदन
किया-"राजन! थोड़े संयम से काम लें। रुकना सीखें।"
शम्भुराजा हँसते हुए बोले, "क्यों? अण्णाजी पन्त तो उठते बैठते नाक ऊँची
करके ही बोलते हैं न कि, 'हम किसी लफड़े में पड़ते ही नहीं हैं। चालीस साल से
बहुत ही ईमानदारी के साथ महाराज की सेवा की है। वे ऐसा ही दावा
करते हैं न'?"
"परन्तु राजन! आप इन रत्नहारों का क्या करेंगे?"
"जिनकी चीज है उनको दे देंगे। परन्तु उसे माँगने के लिए उन्हें मुझसे
मिलना चाहिए।" शम्भुराजा ने हँसते हुए कहा।
उसी शाम को अण्णाजी के छोटे भाई सोमाजी बड़ी शीघ्रता से शम्भुराजा के
पास आये और कहने लगे, "युवराज दो महीने पहले बड़े भाई ने गोवा में पैसे भेजे
30 :: सम्भाजी
थे। वहाँ के एक फिरंगी मुनार को दो रत्नहार बनाने का काम दिया था। "
"तो?"
"बाकी कुछ नहीं, परन्तु परन्तु ऐसा मालूम पडा है कि आज वे लोग
आकर भूल से आपसे मिलकर गये।" यह कहते-कहते सोमाजी का गला सूख
गया।
"सोमाजी बाबा! आप जैमा कह रहे हैं उमी तरह से वह चीज यहाँ पहुँच
गयी है। आपकी बात मच है।"
"वाह! बहुत अच्छा।"
"लेकिन वह चीज यहाँ फिरंगी सुनार ने नहीं भेजी है। वह लेकर
पुर्तगालियों के वकील रामजी ठाकुर के आदमी यहाँ आये थे। हमारी समझ में यह
नहीं आ रहा है कि गाँव के सुनार अपनी चीजों को पहुँचाने के लिए वाइसराय के
कर्मचारियों को कब से काम में लगाने लगे।"
शम्भुराजा की कठोर और हृदय को भेद देने वाली पूछताछ से सोमाजी बाबा
हड़बड़ा गये। वे अपने माथे का पसीना उनरीय के छोर से पोंछने लगे। शम्भुराजा
अधिक क्रुद्ध होकर बोले, "जाकर बोलो अण्णाजी चाचा को, बोलो कि सारी बात
हमें मालूम है। स्वराज्य के छत्रपति हमारे पिताजी नियम के अनुसार स्वयं अपने
उपहारों अथवा भेंट वस्तुओं को सरकारी रत्नशाला में जमा कराते हैं। क्योंकि यहाँ
का प्रत्येक कण हिन्दवी स्वराज्य का है, राजा का नहीं है। ऐसी हमारी धारणा है।
आप कर्मचारी लोग जबरदस्ती जो उपहार मँगाते हो उसे कहाँ जमा करते हो। बस
इतना ही हमें बता दो।"
सोमाजी दत्तो बिना कुछ बोले, सिर नीचा किये निकल गये। बाद में
अण्णाजी के यहाँ से वह उपहार माँगने कोई नहीं आया। चार दिनों बाद ही
राजमहल में किसी कारण से बड़े महाराज ने अष्टप्रधान और अन्य कर्मचारियों के
लिए भोजन का आयोजन किया था। भोजन में महाराज के साथ अण्णाजी, शाहूजी,
सोमनाथ, बालाजी और शम्भुराजा थे। बालाजी और आवजी शिवाजी महाराज के
सबसे करीबी थे। महाराज उन्हें बहुत मानते थे। अण्णाजी पन्त साँवले, मजबूत
हड्डियों वाले ही नहीं बहुत हट्टे कट्टे भी थे। मोरोपन्त लम्बे चेहरे और लम्बी
नाक वाले थे। उनकी आँखें छोटी छोटी और मोती जैसी चमकदार थीं। मस्तक पर
चन्दन की ऊँची सीधी रेखा। वाणी कुछ कुछ खरज में। बुढ़ापे की शरीर पर स्पष्ट
छाया। पीठ थोड़ी झुकी हुई दिखती थी। किन्तु उनके शरीर में उत्साह की कमी न
थी। बच्चों जैसे उत्साह से भरे वे दरबार में घूमते थे।
महाराज ने इससे पहले मोरोपन्त और अण्णाजी पर बहुत से जिम्मेदारो के
काम सौंपे थे। दोनों ही महाराज के पुराने बुद्धिमान और कर्तव्यपरायण साथी थे।
किन्तु उन दोनों में मनोमालिन्य और मनमुटाव बहुत था। राज्य के कार्यव्यापार कम-
सम्भाजी :: 31
से-कम बोलने वाले और फूँक-फेंक कर कदम रखने वाले अण्णाजी आज अपनी
भीतरी बेचैनी रोक नहीं पाये। वे शम्भूराजा की ओर देखते हुए शिवाजी महाराज से
बोले, "महाराज फिरंगी गढ़ाई के रत्नहार बहुत सुन्दर होते हैं। इसीलिए पैसे
भेजकर गोवा से मैंने दो हार मँगवाये थे।"
"कुछ तो हम भी सुन चुके हैं।" महाराज ने कहा।
"परन्तु उनकी गढ़ाई इतनी अच्छी निकली, शम्भूराजा को इतनी अच्छी लगी
कि क्या बताऊँ? उन्होंने उन हारों को अपने पास रख लिया।" अण्णाजी ने स्पष्ट
किया।
अण्णाजी के तीरों के निशाने से शम्भूराजा तनिक भी विचलित न हुए।
उन्होंने तत्काल अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की-
"आप इसी क्षण पता करवा सकते हैं। वह चीज मैंने सरकारी रत्नशाला में
जमा की है। उसकी रसीद हमारे पास है।"
अण्णाजी एकदम चुप हो गये। सरकारी लिपिकों के चेहरे भी देखने लायक
हो गये थे।
शम्भूराजा की तरुणाई और उनका चुलबुला स्वभाव उन्हें चुप नहीं बैठने दे
रहे थे। महाराज की ओर देखते हुए उन्होंने कहा-
"पिताजी। आप ही हमेशा सबको बताते रहते हैं कि हमारे कर्मचारियों और
सरदारों को दूसरे राजाओं के वकीलों और दीवानों का एहसानमन्द नहीं होना
चाहिए। इसका परिणाम अपने राज्य के भीतर की कार्यप्रणाली पर होता है, राज्य को
हानि पहुँचती है।"
शम्भूराजा की बात समाप्त होने पर राहुजी सोमनाथ को जोर की खाँसी
आयी। अन्य लोगों की स्थिति भी कुछ विचित्र सी हो गयी। शम्भूराजा की बात पर
बड़े महाराज कुछ नहीं बोले। इससे सभी को बहुत आश्चर्य हुआ।
दूसरे दिन शाम को अण्णाजी के घर पर शतरंज की बाजी खेली जा रही थी।
राहुजी सोमनाथ को खेल के राजा, ऊँट और हाथी के बदले बाहर के गधे की याद
आयी। सामने एक मोहरा रखते हुए वे बोले, "गधे के कान कभी लम्बे होने से कुछ
नहीं बिगड़ता। लेकिन युवराज के कान लम्बे हो गये तो खतरा उत्पन्न करते हैं।
करो रे करो। कुछ दवा दारू करो। वैद्य को बुलाओ।"
इस बात पर अण्णाजी विषादपूर्वक हँसते हुए इतना ही बोले—"चलता है
राहुजी! अनादिकाल से चलता आया है, कर्मचारी और सैनिक अनेक प्रकार की
कठिनाइयाँ उठाकर राज्य को बढ़ाते हैं। किन्तु थोड़े आराम के दिन आने पर वे जब
खुली हवा खाने के मनसूबे बनाते हैं तो मन को मारना पड़ता है। उस समय तक
सरलता से उपलब्ध सुख भोगने के लिए उत्तराधिकारी नाम के गुंडे राजमहल में
तैयार हो ही जाते हैं। अपने भाग्य में ऐसा ही लिखा होगा तो हम क्या करेंगे?"
32 :: सम्भाजी
"नहीं, नहीं! चाहें तो अपने लेख को लपेट लीजिए। किन्तु इस प्रकार
अनधिकारी व्यक्ति से ऐसा अपमान नहीं होना चाहिए।" गहुर्जी सोमनाथ ने स्पष्ट
शब्दों में कह दिया।
चार
सन्ध्या समय की शीतल वायु मन्द मन्द बह रही थी। शम्भुराजा के महल के पीछे
एक छोटा सा बगीचा था। संभाजी और येसूबाई की गृहस्थी के साथ वह भी
फलता फूलता गया। बगीचे में ही एक पुराना गूलर का पेड था और बेंत का वन
था। उस वृक्ष की एक मोटी टहनी पर पीतल की जंजीरों से बना झूला पड़ा था।
उसी झूले पर युवराज और युवराज्ञी बैठे कुछ बातें कर रहे थे। सामने हिरनों के बच्चे
खेल रहे थे। बीच बीच में गूलर के फल नीचे टपक जाते थे।
युवराज और युवराज्ञी को इस प्रकार की शान्ति बहुत दिनों बाद मिली थी।
येसूबाई ने युवराज को टटोलते हुए गम्भीरता से कहा "राजा को सभी प्रकार के
अधिकार होते हैं। राजा की इच्छा ही अन्तिम आदेश बन जाती है। अपने राज्य की
प्रत्येक उत्तम और सुन्दर वस्तु पर उसी का अधिकार होता है। इसीलिए राजा, यदि
राज्य की यदि कोई सुन्दर युवती मन को भा गयी तो गाय बैल की तरह कभी
भी उसे भगाकर अपने जनानखाने में कैद करके रखने का जुर्म भी करता है। ऐसा
नहीं है क्या?"
"येसू! आप यह क्या कह रही हैं? ऐसे निर्लज्ज अत्याचार केवल यवनों
और सुल्तानों के ही राज्य में होते हैं। शिवाजी महाराज के स्वराज्य में नहीं।"
"युवराज! सच बोल रहे हैं आप?" हँसते हँसते येसूबाई की पुतलियाँ
कठोर हो गयीं—"तो फिर युवराज! महाराज के पुत्र संभाजी राजा द्वारा ऐसा
अत्याचार क्यों किया गया?"
"कौन सा अत्याचार?"
"अण्णाजी दत्तो प्रभुणीकर तो शिवाजी महाराज के एक आधारस्तम्भ हैं।
उनकी लाड़ली बेटी हंसा पर अत्याचार करके आपने कौन सी बहादुरी दिखायी?'
संभाजी राजा जैसा शीघ्र क्रुद्ध हो जाने वाला व्यक्ति भी येसूबाई के
अप्रत्याशित हमले से हड़बड़ा गया। रायगढ़ के परिसर में एक समय शिवराजा
सम्भाजी ३३
१. युवराज शम्भु राजे का बाल्यकाल, पुरन्दर सन्धि, आगरा प्रवास एवं विद्याभ्यास
महाराज की माता जीजाबाई के शब्दों का जो आदर और प्रभाव था, वही
उत्तराधिकार येसूबाई के पास अपने आप चला आया था।
शम्भूराजा से वे एक-डेढ़ वर्ष छोटी थीं। किन्तु, उनके ममतांलु, कर्तव्यपरायण
और सर्वसमावेशक व्यक्तित्व ने एक अलग ऊँचाई प्राप्त कर ली थी। कद से ऊँची,
लम्बोतरे चेहरे वाली, देखने में सुन्दर नाक नक्श वाली, तन्वंगिनी, झुमकेदार नथ
पहनने वाली, उत्साही तरुणी येसूबाई रायगढ़ के अन्तःपुर में आकर्षण का केन्द्र थीं।
शम्भ्रूराजा की सोयराबाई जैसी अनेक मातायें वहाँ रह रही थीं। परन्तु येसूबाई जैसी
चमक और आदर किसी के भी व्यक्तित्व को नहीं मिल पाया था।
संगमेश्वर नगर के पास, कुछ ही कोसों की दूरी पर अन्दर पहाड़ियों में
श्रृंगारपुर की बस्ती थी। वहाँ के सूर्यराव सुर्वे स्वयं को श्रृंगारपुर का शाहंशाह मानते
थे। उनका व्यवहार भी उसी तरह निरंकुश था। दाभोल और संगमेश्वर जैसे बड़े दो
बन्दरगाह उनके अधिकार में थे। अनुमानतः सौ सौ से अधिक बड़े जहाज सूर्यराव
ने बनवाये थे या चुराकर प्राप्त किये थे। रत्नागिरी, दाभोल से लेकर हरिहरेश्वर तक
के समुद्र तट पर उनका शासन था। विशेषरूप से मक्का-मदीना जाने वाले यात्रियों
और विदेशी जहाजों को लूटकर सारी सम्पत्ति हड़प लेना सूर्यराव का मुख्य कार्य
था। यही सूर्यराव येसूबाई के नाना थे।
येसूबाई के पिता पिलाजी शिर्के एक प्रमुख सरदार के रूप में सूर्यराव के
दरबार में सेवारत थे। वे वहीं समीप के कुटरे गाँव के निवासी थे। पिलाजी राव
शिर्के भी शिवाजी महाराज के पराक्रम को वर्षों से सुनते आये थे। किन्तु महाराज ने
जब से स्वराज्य की स्थापना की, तभी से महाराष्ट्र के मुसलमान और मुसलमानों का
पक्ष लेने वाले जागीरदार मराठे उनका घोर विरोध कर रहे थे। ये तथाकथित
जागीरदार एक ओर तो विदेशियों के जूते पोंछते थे और दूसरी ओर जाति और कुल
के आधार पर स्वयं को शिवाजी महाराज से श्रेष्ठ मानते थे। सूर्यराव भी उसी जाति
कुल के थे। शिवाजी महाराज के साथ सूर्यराव का द्वेष इतना बढ़ गया था कि वे
महाराज के विरोध में ऐन मौके पर उनके विरोधी जावलीकर मोरे से जा मिले और
महाराज के विरोध में लड़े थे। सिद्धी और जौहर ने जब पन्हाला पर घेरा डाला था
तब भी सूर्यराव जौहर की सहायता के लिए दौड़े थे।
कुछ साल पहले शिवाजी महाराज कोंकण की लड़ाई के लिए गये थे। तभी
उन्होंने सूर्यराव के सारे अपराध क्षमा करके सूर्यराव को सुधरने का एक अवसर दिया
था। किन्तु अपने स्वभाव के अनुसार सूर्यराव साँप के तरह उन्हीं पर उलट पड़ा।
उसने महाराज के सैनिकों को बहुत कष्ट दिया ही, महाराज के बुलाने पर भी
पालवण में उनके सामने हाजिर नहीं हुआ। सूर्यराव के स्वराज्यद्रोह से महाराज
बहुत क्रुद्ध हुए। एक बार इस संकट को मिटा देने का निश्चय करके महाराज ने
34 • सम्भाजी
श्रृंगारपुर पर आक्रमण किया। इस खबर के मिलते ही सूर्यराव अपनी राजधानी
छोड़कर पास के जंगलों में भाग गया।
सूर्यराव की गद्दारी से सन्तप्त शिवाजी महाराज ने उनके सिंहासन को पैर
की ठोकर से गिरा दिया। संयम का बाँध टूट चुका था। महाराज ने श्रृंगारपुर पर छापा
मारा था। सुर्वे की सम्पत्ति जब्त की जा रही थी। तभी छः-सात साल की गोदू कभी
झरोखे से तो कभी पर्दे के पीछे से बड़े महाराज को बड़े आदर से, भयमिश्रित आदर
से देख रही थी। अपने नानाजी का भाग जाना उसे बहुत बुरा लग रहा था। उसके
पिता पिलाजी शिर्के बड़े धैर्य के साथ वहीं पर रुके हुए थे।
सुर्वे की सम्पत्ति की गिनती हो रही थी। कर्मचारी वहाँ के सोने चाँदी के बड़े
बर्तन, सिर तक ऊँचे दीपाधार, नक्काशीदार बड़े बड़े हंडे, कलश आदि सामान बाँधे
जा रहे थे। उसी समय महाराज उन्हें देखने के लिए वहाँ आये। चमकते हुए
दीपाधार और साफ सुथरे सोने चाँदी के बर्तन देखकर महाराज चौंक गये। उन्होंने
कहा, "ऐसी वस्तुएँ राजमहलों में भरी पड़ी मिलती हैं किन्तु ऐसी स्वच्छता,
सफाई, इतना सुन्दर रखरखाव, ऐसी सजावट बिना किसी जानकार और समझदार
स्त्री की देख-रेख असम्भव है।"
"महाराज ! यह जादुई करामात मेरी कन्या येसू की है।"
पिलाजी ने निवेदन किया।
महाराज दूमरे दालान में प्रविष्ट हुए। तभी नौकरों को हिदायत देती हुई छोटी
सी येसू उनको दिखी। वह बड़े आत्मविश्वासपूर्वक खड़ी थी। शीशे के सामान को
बाँधते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए, ऊँचे सामानों को कैसे बाँधना चाहिए,
ऐसी हिदायतें वह नौकरों को दे रही थी।
महाराज धीरे धीरे आगे बढ़े। उन्होंने येसू के मस्तक पर कोमलता से अपना
हाथ रखा। उस हँसमुख, उत्साही, प्रसन्न, स्वच्छता और अनुशासन की आग्रही येसू
को महाराज ने अपनी बाँहों में भर लिया। उन्होंने पिलाजी से कहा, "पिलाजी राव !
आपके ससुर सूर्यराव पर हमें इतना क्रोध आया था कि सारे श्रृंगारपुर को भस्म कर
देने का हमने निश्चय कर लिया था। किन्तु आपकी इस छोटी बच्ची ने हम पर जादू
का असर डाला है। यह सारी सम्पदा तुम अपने पास रख लो। हम तुम्हारे राजमहल
से केवल एक बहुमूल्य चीज लेकर जाने वाले हैं।"
महाराज की बातों से चिन्ताग्रस्त पिलाजी राव को सुखद धक्का लगा।
महाराज ने कृतज्ञता के भाव से पिलाजी राव से कहा, "अपने शम्भूराजा के लिए हमें
एक अच्छी कन्या की तलाश थी। ऐसी सुन्दर और कर्तव्यकुशल लड़की हमें दूसरी
कहाँ मिलेगी ?
पिलाजी राव की आँखों में आँसू उमड़ आये। उन्होंने महाराज के पैर पकड़
सम्भाजी · 35
लिए। उन्होंने कहा, “महाराज! हम पराजित हैं। उससे भी अधिक हम
स्वराज्यद्रोही हैं। आप मेरी बेटी को इतना बड़प्पन क्यों दे रहे हैं? आपके शम्भू के
लिए ऐसी बहुत सी लड़कियाँ मिल जाएँगी।”
“नहीं पिलाजी राव, घर के किसी बर्तन पर जरा सा दाग लगने पर भी
जिसकी जान निकलने लगती है, वही बच्ची कल जब गृहलक्ष्मी बनकर हमारे
महल में आयेगी तो उसके चरण स्पर्श से हमारा राजमन्दिर असली मन्दिर के रूप में
बदल जाएगा।”
उन दो तीन दिनों में बहुत सी घटनाएँ घटीं। शिवाजी महाराज ने येसूबाई
और शम्भूराजा का विवाह तो निश्चित किया ही साथ ही पिलाजी राव और उनके
घर के संस्कार को इतना पसन्द किया कि महाराज ने अपनी कन्या, नानीबाई उर्फ
राजकुँवर की सगाई पिलाजी राव के पुत्र गणेशजी के साथ पक्की कर दी। सूर्यराव
के उद्धत स्वभाव और निरंकुश व्यवहार की छाया पिलाजी राव ने अपने ऊपर नहीं
पड़ने दी थी। पिलाजी राव के नेतृत्व में ही दूर दराज में बसा यह श्रृंगारपुर महाराष्ट्र
की प्रतिष्ठित विद्यानगरी में परिवर्तित हो गया था। तमाम देशों के बहुत से पंडित,
विद्वान, तान्त्रिक, अनेक विद्याशाखाओं के अग्रदूत इस परिसर में अपना मठ बनाकर
या गुफाओं में पनाह लेकर विराजमान थे। पिलाजी राव ने केशव पंडित और रघुनाथ
पंडित जैसे विद्वानों से अपने बच्चों को पढ़ाया था। किन्तु पढ़ाई में गणेशजी की
अपेक्षा येसूबाई की लगन अधिक थी।
कर्तव्यपरायण पिलाजी राव ने येसूबाई के दहेज में हीरे मोतियों से भरी
बोरियाँ रायगढ़ नहीं भेजी थीं। परन्तु केशव पंडित और रघुनाथ पंडित दोनों बन्धुओं
को ससुराल जाती गोद के साथ भेजना नहीं भूले।
रायगढ़ में पाठशाला आरम्भ हो गयी। अन्य बच्चों के साथ छोटी येसू और
शम्भूराजा एक साथ ही पढ़ रहे थे। अपनी धर्मपत्नी समझने के पहले शम्भूराजा ने
येसूबाई को अपनी सहपाठिनी और सहयोगिनी के रूप में मन में बिठा लिया।
आज अचानक येसूबाई ने हंसा की बात छेड़ी तो शम्भूराजा कुछ हड़बड़ा
गये। येसूबाई का राजमहल और शम्भूराजा के हृदय में कुछ विशिष्ट स्थान था।
इसीलिए शम्भूराजा उठ खड़े हुए और बेचैनी से इधर उधर घूमते हुए, हाथ
हिलाकर बोले-
“युवराज्ञी! आप यह कैसे भूल रही हैं कि हम युवराज हैं। यदि कोई युवती
हमारे मन में बैठ गयी तो हम उसके साथ सीधे सीधे विवाह करेंगे और एक रानी
के लिए महल बनवाने के लिए रायगढ़ में जगह की कमी है क्या?”
“मगर युवराज हंसा अण्णाजी पन्त की कन्या थी।”
“किसी की भी होने दो। परन्तु यहाँ तो सुन्दर स्त्रियों का नाम मेरे साथ
36 · सम्भाजी
चिपकाने का सभी को शौक चढ़ा है।"
येसूबाई हल्के से हँसी। अपनी हँसी को दबाते हुए किन्तु बड़े आत्मविश्वास
के साथ कहने लगी—"स्वामीजी के सौन्दर्य की प्रशंसा और वाहवाही की एक से
बढ़कर एक कहानियाँ आजकल सुनने को मिलती हैं। परसों रायप्पा और जोत्याजी
बता रहे थे..."
"क्या?"
"...स्वामी पर भगवान ने सौन्दर्य का सारा वैभव, सब कुछ इस तरह
निछावर कर दिया है कि आजकल स्वामी कहीं शिकार खेलने जाते हैं तो नदी में या
किसी खुली जगह पर स्नान नहीं करते। क्योंकि युवराज का कम कपड़ों में गोरा
चिट्टा शरीर जादू का असर करने लगता है। कलशे लेकर पानी भरने आने वाली
युवतियाँ वहीं पर बेहोश होकर गिर पड़ती हैं। ऐसा चार पाँच बार हो चुका है।"
"युवराज्ञी ! ऐसा लगता है कि आपका भी अपने पति राजा पर पूरा ध्यान
रहता है।"
"मेरे स्वामी में कितने विलक्षण गुणों का समन्वय है। तलवार हो या कलम
दोनों ही स्वामी के वश में हैं। दोनों ही तेजी से चलती हैं। दोनों से संगी-साथी
और शत्रु-मित्र डरते हैं। सौन्दर्य के बारे में तो कहना ही क्या ? एक बार भूल से भी
स्वामी मदन के महल के सामने से गुजरें तो मदनदेवता अपने आसन से तुरन्त खड़े
हो जाएँगे और स्वामी का हाथ पकड़कर अपने साथ भोजन पर बिठाकर सम्मानित
करेंगे।"
"परन्तु येसू, प्रेम करने की ठान लेने पर राजा को कोई कमी रहती है क्या ?
सत्ताधीश से अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले ऐसे दुष्ट नामर्दों की कमी है क्या जो
अपनी पत्नियों, जवान बहू-बेटियों का हाथ पकड़कर पीछे के दरवाजे से आ जाते
हैं।
परन्तु एकतरफा प्रेम करके कोई हंसा मेरे लिए पागल हो जाय तो इसमें मेरा
क्या दोष है?"
येसूबाई शम्भूराजा को एकटक देखने लगी। पवन की गति तेज हो गयी।
झूले में लगी जंजीरों की कड़ियाँ करकराने लगीं। उसी समय किसी जरूरी काम से
गोदू पीछे के दरवाजे से आयी। हंसा नाम जब उसके कान में पड़ा तो वह वहीं
दीवार के साथ छिपकली-सी चिपककर अपने प्राण को कानों में रोककर सुनने
लगी।
शम्भूराजा उसी वेग से आगे कहने लगे, "येसू! वह हंसा हर जगह मेरा
पीछा करती थी। देखने में वह चित्र जैसी सुन्दर थी। बहुत ही सात्विक स्वभाव की।
अण्णाजी काका की पुत्री होने के कारण वह छोटी उम्र से ही राजमहल में खेलती-
सम्भाजी :: 37
कूदती थी। बचपन में कभी हमारी पीठ पर भी बैठती थी। लड़कियाँ जवान होने
लगती हैं तो तीन-चार सालों में ही बहुत बड़ी दिखने लगती हैं। एक कीट का
रूपान्तर तितली के रूप में कब हो जाता है, पता ही नहीं चलता। बड़ी होने पर हंसा
को मैं टालने लगा। अण्णाजी पन्त तो हमारे पिताजी के बड़े भाई जैसे हैं।"
"इसका मतलब भविष्य के परिणामों की कल्पना स्वामी को थी?"
"हमें ही नहीं अण्णाजी पन्त को भी हंसा के पागलपन का अनुमान हो गया
था। इसीलिए उन्होंने आनन-फानन में उसकी शादी निश्चित कर दी। शादी के बाद
वह पहली बार पाचाड़ अपने मायके आयी थी।"
उसी समय वसंत पंचमी का दुर्भाग्यपूर्ण त्योहार आया। दोपहर के समय उस
पार के महल में महिलाओं और लड़कियों की हुड़दंग मची थी। उस समय येसू
आप भी वहीं पर थीं। यह पागल लड़की उस भीड़ से बाहर निकल आयी। मैं उस
समय अपने महल में कविताएँ रचने में विभोर था। मैंने पहरेदारों को आदेश दिया था
कि वे किसी को भी अन्दर न आने दें। परन्तु हंसा यह झूठ बोलकर मेरे महल मे
घुस आयी कि मैंने ही उसे बुलाया है। प्रेम के ज्वर ने उसे इतना उन्मत्त कर दिया था
कि पीछे से आकर उसने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। वह अपने प्यासे ओठों से
मेरे मस्तक को चूमने लगी। हमने उसके कान के नीचे एक जोर का तमाचा मारा
और चिल्लाकर कहा, "शर्म नहीं आती तुम्हें? पन्त काका की बेटी हो तुम! किसी
की विवाहिता पत्नी हो तुम!" मेरी बात सुनकर वह पागल की तरह हँसी और
घायल पंछी की तरह हमारे पास आकर मेरा हाथ पकड़कर बोली, "हमारी देह से
जवानी फूटी पड़ रही है। उसका अभिषेक तुम पर कराने के लिए मैं आयी हूँ,
राजा।" मैंने उसको दूर धकेल दिया और उससे कहा, "मूर्ख लड़की! तेरी इस
मूर्खतापूर्ण हरकत से महल में सुरंग लग जाएगी।" तब भी वह जाने को तैयार न
थी, हटने का नाम ही नहीं ले रही थी। तब मैंने उसे दो तीन तमाचे लगाये। हमने
उससे पूछा, "तुम पागल हो गयी हो क्या?" वह जोर हँसी और बोली, "राजा
प्रेम में जो पंछी अन्धा हो जाता है उसे तो कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। इसीलिए तो
परवाना शमा पर झपट पड़ता है और आग में मिट जाता है।"
अन्त में मैंने हंसा को समझाते हुए पूछा, "तुमको क्या चाहिए?" वह फिर से
हँसने लगी। उसकी हँसी बहुत ही रहस्यमयी और भयानक थी। वह बोली,
"आपकी पौरुषेय सुन्दरता के सामने मुझे मेरा पति एकदम लल्लू लगता है, राजा।
पिछले तीन सालों से मैं आपके लिए मशाल की तरह दिन-रात जल रही हूँ सिर्फ
एक बार मुझे अपनी बाँहों में ले लो।"
वह किसी भी तरह मुझे छोड़ने को तैयार न थी। मेरी कमर को उसने
मगरमच्छ की तरह लपेट रखा था। उसके इस पागलपन और पन्त के महल के साथ
38 :: सम्भाजी