छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 32, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंरत्नहार हैं। फिरंगियों के वकील रामजी ठाकुर ने गोवा से भेजे हैं।"
"किसके लिए?"
"सुरनवीस अण्णाजी पन्त के लिए।"
"ईनाम के रूप में?"
"वैसे नहीं। पर...।" भास्कर ठाकुर ने 'त...त...प...प' हकलाते हुए सारी
बात साफ कर दी। उसने बताया-"क्या हुआ युवराज कि दो महीने पहले हमारे
वकील स्वयं महाराज से मिलने के लिए रायगढ़ आये थे। तब उन्होंने वाइसराय की
ओर से एक बहुमूल्य उपहार महाराज को दिया था।
"ठीक है। फिर?"
"परन्तु...परन्तु...उस समय सुरनवीस अण्णाजी पन्त और मोरोपन्त पेशवा के
लिए कुछ ले आना भूल गये थे। मोरोपन्त ने तो इस विषय में एक शब्द भी नहीं
कहा किन्तु अण्णाजी ने पिछले तीन महीने में तीन चिट्ठियाँ भेजीं। रामजी पन्त को
बहुत पीड़ित किया। पन्त ने कहा- "राज्य के कार्य व्यापार में कर्मचारी असन्तुष्ट
हो जाय तो बड़े-बड़े काम भी धूल में मिल जाते हैं। इसलिए..."
"आगे?"
"आगे बोले तो उन्होंने दो बड़े रत्नहार खरीद लिये। वही लेकर हम आज
पन्त को मिलने के लिए आये हैं।
"ठीक है। युवराज की हैसियत से हम इसे स्वीकार करते हैं।"
शम्भुराजा ने बगल में देखा। वहाँ पर पीठ पर अपने लम्बे बालों को खुला
छोड़े, ऐंठी मूँछों वाले, गेहुँए रंग के, तीस वर्ष के, बलिष्ठ और लम्बी कद काठी के
कवि कलश खड़े थे। उनकी ओर देखते हुए युवराज ने कहा, "कविराज इन लोगों
को लिखित रसीद दे दीजिए और इन्हें तुरन्त वापस जाने दीजिए।"
गोवेकर दूत चले गये तब हाथ जोड़कर कवि कलश ने युवराज से निवेदन
किया-"राजन! थोड़े संयम से काम लें। रुकना सीखें।"
शम्भुराजा हँसते हुए बोले, "क्यों? अण्णाजी पन्त तो उठते बैठते नाक ऊँची
करके ही बोलते हैं न कि, 'हम किसी लफड़े में पड़ते ही नहीं हैं। चालीस साल से
बहुत ही ईमानदारी के साथ महाराज की सेवा की है। वे ऐसा ही दावा
करते हैं न'?"
"परन्तु राजन! आप इन रत्नहारों का क्या करेंगे?"
"जिनकी चीज है उनको दे देंगे। परन्तु उसे माँगने के लिए उन्हें मुझसे
मिलना चाहिए।" शम्भुराजा ने हँसते हुए कहा।
उसी शाम को अण्णाजी के छोटे भाई सोमाजी बड़ी शीघ्रता से शम्भुराजा के
पास आये और कहने लगे, "युवराज दो महीने पहले बड़े भाई ने गोवा में पैसे भेजे
30 :: सम्भाजी